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Sunday, February 15, 2015

न 'मोदी लहर' थी, न 'केजरीवाल लहर' है

लोक सभा चुनावों में नरेंद्र मोदी की अगुवाई में भारतीय जनता पार्टी ने शानदार प्रदर्शन किया तो मोदी लहर शब्‍द को जन्‍म दिया गया। ठीक नौ महीनों के बाद जब दिल्‍ली विधान सभा चुनावों में अरविंद केजरीवाल के नेतृत्‍व में आम आदमी पार्टी को रिकॉर्ड तोड़ बहुमत मिला तो मोदी लहर पर विराम लगा दिया गया।

हालांकि, यदि इसके बाद बीजेपी किसी क्षेत्र में शानदार प्रदर्शन करती है तो मोदी लहर में जान आ जाएगी। यह केवल शब्‍दावली के जरिये ख़बरों को मसालेदार बनाने की युक्‍त होती है। निर्देशक रितेश बत्रा की 'द लंचबॉक्‍स' नामक शानदार फिल्‍म में शेख हर बात से कहने से पहले, अम्‍मी कहती है, का इस्‍तेमाल करता है। उसकी बात पर साजन फर्नांडिस कहता है, तू तो अनाथ है ना, तो शेख कहता है, 'अम्‍मी कहती है' लगाने से बात में वजन आ जाता है।

बस, हर किसी को बात में वजन लाने की सूझती है। 'शब्‍द' जितना वजनदार होगा, स्टोरी या बात उतनी वजन दार होगी। तुम अपनी ओर से 'कुछ' कहो और बाद में, उसी 'कुछ' को तुम महात्‍मा गांधी या मार्टिन लूथर किंग के नाम से जोड़कर कहो। तुम महसूस करोगे कि बात में वजन आ रहा है।

शब्‍दों में वजन काम करता है। मोदी लहर भी इसी बीमारी की उपज है। इसको हम रचनात्‍मकता का नाम दे सकते हैं। जब कोई इस लहर को रोकेगा, तो उसका कद लहर वाले से यकीनन बड़ा हो जाएगा। जब आदमी बड़ा है तो कवरेज भी बड़ी होनी चाहिए। सिकंदर को रोकने वाला पोरस छोटा कैसे हो सकता है ? भले ही, पोरस ने सिकंदर पर जीत हासिल न की हो, लेकिन सिकंदर को रोकना भी कम नहीं हो सकता।

अगर, दिल्‍ली में 'मोदी लहर' की हवा निकली है, तो चिंता का विषय है। मगर, चिंता केवल बीजेपी के लिए नहीं, बल्‍कि तमाम राजनीतिक दलों के लिए। मोदी लहर को दरकिनार कर दो। अगर, आप कहते हैं, नहीं नहीं मोदी लहर तो थी, तो मैं कहता हूं, लहर अगर थी तो सत्‍ता विरोधी। जिस पर सवार होकर नरेंद्र मोदी दिल्‍ली सिंहासन तक पहुंचे। अगर हवाएं उस तरफ हों, जिस तरफ आपकी नौका को किनारा चाहिए, तो आपको अपने हुनर पर गुमान नहीं करना चाहिए बल्‍कि परिस्‍थितियों का शुक्रगुजार होना चाहिए कि वे इस समय आपके पक्ष में हैं।

'मोदी लहर' ने वर्ष 2014 में जन्‍म लिया, मगर, दिल्‍ली की जनता ने आम आदमी पार्टी के जरिये कांग्रेस के चारे खाने वर्ष 2013 में चित कर दिए थे। जो सीधे सीधे संकेत हैं कि लहर सत्‍ता विरोधी थी। कांग्रेस के भ्रष्‍टाचार से लोग तंग आ चुके थे। देश के पास विकल्‍प के तौर पर बीजेपी के अलावा दूसरा कोई था भी नहीं। बाकी सभी नेता क्षेत्रीय पार्टियों से आते हैं, जो या तो जनता परिवार से टूटकर बनी हैं, या कांग्रेस से।

अगर, मोदी लहर होती तो इसका असर उड़ीसा, पश्‍चिमी बंगाल, तमिलनाडू में जरूर दिखाई पड़ता। वहीं, नवोदित आम आदमी पार्टी अकाली दल बीजेपी के गढ़ पंजाब से चार सांसद लाने में कामयाब न होती। हालांकि, अन्‍य राज्‍यों में परिस्‍थितियां पूर्ण रूप से भारतीय जनता पार्टी के पक्ष में थी। फिलहाल, आम आदमी पार्टी पर विश्‍वास करना मुश्‍किल था, क्‍योंकि लोग नए थे, रातोंरात उम्‍मीदवार मिले थे। बीजेपी के पीछे तमाम आध्‍यात्‍मिक, धार्मिक संस्‍थान, आरएसएस समेत अन्‍य हिंदू संगठन थे।

अगर, लोक सभा चुनावों के बाद के चुनावों पर नजर मारे तो देखेंगे कि बीजेपी ने महाराष्‍ट्र चुनाव जीता, मगर, सरकार अल्‍पमत में है यदि शिव सेना विरोध पर उतर आए, तो बीजेपी को एनसीपी का सहारा लेना होगा, जिसको नरेंद्र मोदी चुनावों के दिनों में नेचुरल करप्‍ट पार्टी या चाचे भतीजे की पार्टी कहते थे।

हरियाणा में सफलता का मुख्‍य कारण डेरे का समर्थन, वाड्रा डीएलएफ जमीन घोटाले का हरियाणा से जुड़े होना, हुड्डा सरकार का दस वर्षीय कार्यकाल, गोपाल कांडा का मामला, कांग्रेस के अंदर दरार, केंद्र में कांग्रेस का सफाया, भ्रष्‍टाचार की छवि हैं। मगर, जम्‍मू कश्‍मीर में बिखराव के नतीजे मिले, जिसके कारण वहां सरकार नहीं बन पाई। झारखंड को बदलाव की जरूरत थी एवं बाहरी दलों से आए नेताओं को टिकट देना अच्‍छा साबित हुआ।

देश बदलाव के मुहाने पर खड़ा है। लोगों के बीच अब राजनीति को लेकर चर्चा होने लगी है। कल तक जनता किसी मुद्दे पर अधिक माथा मच्‍ची नहीं करती थी। केंद्र में भारतीय जनता पार्टी की सरकार देने के बाद दिल्‍ली की जनता ने नई पार्टी आम आदमी पार्टी को प्रचंड बहुमत देकर कहीं न कहीं अपनी समझ का परिचय दिया है। और लहर की धुन में रहने वाले नेताओं को सचेत किया है, 'लहर' वजन बढ़ाने के लिए अच्‍छा शब्‍द है, वरना जनादेश से बढ़कर कुछ नहीं है। लोक सभा में बीजेपी को बहुमत मिला क्‍योंकि क्षेत्रीय पार्टियों को अधिक सांसद देने का मतलब था, कांग्रेस की सरकार या खिचड़ी सरकार, जिससे देश को नुकसान होता।

अब न मोदी लहर काम करती है, न केजरीवाल लहर। केवल मुद्दे काम करते हैं, यदि आप मुद्दों की डिलिवरी देने में सफल रहते हैं, तो आपको बहुमत मिल सकता है। जो अन्‍य दलों ने लोक सभा चुनावों में गलती की थी, उसी तरह की गलती बीजेपी ने दिल्‍ली विधान सभा चुनावों में की। व्‍यक्‍तिगत हमले, मुद्दों से हटकर भाषणबाजी।

Saturday, December 20, 2014

नीलगाय की हत्‍या करना उचित या अनुचित

ठंड का मौसम था। खेतों में धूप की चिड़िया फुदक रही थी। मैं नहर के किनारे टहल रहा था। मेरी नजर एक काले रंग के जानवर पर पड़ी, जो दौड़ता हुआ हमारी तरफ आ रहा था। इस काले रंग के जानवर के पीछे कुत्‍तों का झुंड था। काला सा दिखने वाला जानवर 'नील गाय' थी, जिसको पंजाबी बोली में 'रोज' भी कहते हैं। हांपते हुए इसकी निगाह हम पर पड़ी और न आयें देखा - न बायें देखा, सीधा नहर में कूद गई। हमने कूत्‍तों को वहां से दौड़ा दिया और नील गाय को बचाने का प्रयास करने लगे। वैसे तो नील गाय स्‍वयं निकल जाती, मगर वो हांप रही थी , और नहर पूरी तरह पक्‍की थी, ऐसे में उसका स्‍वयं निकलना मुश्‍किल था। जैसे ही हमने उसको सही सलामत बाहर निकाला, तो उसने हमारे हाथों में दम तोड़ दिया। मैं हैरान हो गया। मुझे कुछ समझ नहीं आया कि आख़िर यह कैसे हुआ। हालांकि पिता ने यह कहते हुए जिज्ञासा को शांत कर दिया है कि इनका दिल बहुत कमजोर होता है।

यह किस्‍सा आज अचानक 20 साल बाद उस समय उभरकर मन की सतह पर आ गया। जब नीलगाय की समस्‍या को लेकर राजस्‍थान सरकार की तनातनी का मामला सामने आया। एक ख़बर के मुताबिक इस साल की शुरुआत में वसुंधरा राजे रंथमभौर गई थीं, जहां पर उनको किसानों के गुस्से का सामना करना पड़ा था। किसानों ने मुख्यमंत्री को बताया था कि नीलगायों के कारण बड़े पैमाने पर उनकी फसल बर्बाद हो रही है। किसानों की समस्‍या सुनने के बाद मुख्यमंत्री ने किसानों से वादा किया था कि उनकी सरकार नीलगाय की संख्या को कम करने में विशेष कानून अधिकार का इस्‍तेमाल करते हुए उनको राहत प्रदान करेगी।

मगर, अब वसुंधरा राजे के लिए समस्‍या उस समय खड़ी हो गई। जब उनके नेताओं ने यह कहते हुए उनके कदम का विरोध कर दिया कि आप इनकी हत्या कैसे कर सकते हैं, जिनके नाम में 'गाय' है ?। मगर सवाल तो यह भी उठता है कि अगर इस जानवर के नाम के पीछे गाय शब्‍द न आता तो क्‍या इनकी हत्‍या करना उचित होता ? लावारिश पशुओं एवं जानवरों के कारण किसानों की फसलों का नुकसान होता है। इसमें कोई दो राय नहीं। मगर, किसी जानवर को खत्‍म करने संबंधी कानून पास करना आखिर कहां तक उचित है ?

इसके अन्‍य विकल्‍पों पर विचार करना चाहिए। सरकार को चाहिए कि नीलगाय को पकड़कर निकटवर्ती प्राणी संग्रहालयों में छोड़ा जाए। उनकी देखभाल के लिए अलग से आर्थिक मदद मुहैया करवाई जाए। हालांकि, इन प्राणियों से सरकार को किसी तरह का आर्थिक लाभ नहीं होगा। मगर, जरूरी तो नहीं कि हर चीज के साथ आर्थिक लाभ को जोड़कर देखा जाए। यदि ऐसा ही है तो जो लोग दूध पीने के बाद गायों को सड़कों पर या खेतों के आस पास खुले स्‍थानों में छोड़ देते हैं, जो फसलों को नुकसान पहुंचाती हैं, तो नियम उनके लिए भी उसी तरह का होगा।

इस तरह की अक्‍सर कार्रवाईयां शहरों में होती हैं। नगर निगमों ने आवारा कुत्‍तों को शहर से हटाने के लिए आवारा कुत्‍तों के खिलाफ अभियान चलाया। नतीजा, यह हुआ कि आज शहरों की सड़कों पर आवारा कुत्‍तों की संख्‍या कम होगी, जो देसी नसल के हैं, जबकि विदेशी नसल के कुत्‍ते बड़ी शानदार के साथ सड़कों पर घूमते हैं, उनका मालिक, जो कहने को मालिक है, लेकिन वो जाता तो कुत्‍ते के पीछे पीछे है, और कभी मैंने किसी मालिक को पीछे चलते हुए नहीं देखा।

हमने अपने स्‍वार्थों के लिए पहाड़ों का सीना चीरकर बीच में से सड़कें निकाल ली, अब अगर सड़कों पर पहाड़ों कोई जानवर हमारा राह रोकता है तो हमको परेशानी होती है। हमने जंगलों को साफ कर दिया। अब अगर जंगलों में रहने वाली प्राणी हमारे खेतों में घुस रहे हैं, तो हम उनको खत्‍म करने की जिद्द पकड़े हुए हैं।

इस मामले में मेनिका गांधी का रूख किस तरह का होगा। यह भी देखने लायक होगा, क्‍योंकि वो स्‍वयं को वण प्राणियों की सबसे बड़ी रक्षक कहती हैं। और दिलचस्‍प बात तो यह है कि यह मामला अब राजस्‍थान से निकल केंद्र में पहुंच चुका है। उधर, राजस्थान के वन मंत्री राजकुमार रिनवा ने अंग्रेजी समाचार पत्र से कहा, ''राज्य की फसलों के लिए नीलगाय एक गंभीर समस्या बन चुकी हैं। हालांकि, यह अलग किस्म का जानवर है लेकिन ज्यादातर लोग इसको गाय कहते हैं। इसके साथ लोगों की भावना जुड़ी हुई है। मैं ब्राह्मण हूं और किसी जानवर की हत्या होने पर अच्छा महसूस नहीं होता है। फिर भी हम समाधान की तलाश में हैं। इन जानवरों को फसल वाले इलाके से बाहर करने पर विचार किया जा रहा है।'

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