आम आदमी पार्टी,
कहां हो तुम
गुम सुम गुम सुम
चलो उठो
समेट लो
बिखरा है जो
एक कुर्सी तक न थम जाएँ कदम
चलो उठो
भरो दम
सालों बाद जुड़ता है विश्वास
मत तोड़ आम की आस
मत बनो नेता तुम खास
मिट्टी में मिले हैं कई सिकंदर
चलो उठो
भरो उड़ान
दूर है मंजिल
मत करो तित्तर बित्तर कारवां
रूठे हैं जो
मना लो
एक बार फिर कारवाँ बना लो
मार दो
मैं तू को
और
जिन्दा कर दो
आम को
अच्छा लगेगा
अवाम को
कुछ तुम से हुई
कुछ उन से हुई
चलो उठो
डालो मिट्टी
करो मुआफ़
जिंदाबाद आप
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Thursday, March 26, 2015
Sunday, February 15, 2015
न 'मोदी लहर' थी, न 'केजरीवाल लहर' है
लोक सभा चुनावों में नरेंद्र मोदी की अगुवाई में भारतीय जनता पार्टी ने शानदार प्रदर्शन किया तो मोदी लहर शब्द को जन्म दिया गया। ठीक नौ महीनों के बाद जब दिल्ली विधान सभा चुनावों में अरविंद केजरीवाल के नेतृत्व में आम आदमी पार्टी को रिकॉर्ड तोड़ बहुमत मिला तो मोदी लहर पर विराम लगा दिया गया।
हालांकि, यदि इसके बाद बीजेपी किसी क्षेत्र में शानदार प्रदर्शन करती है तो मोदी लहर में जान आ जाएगी। यह केवल शब्दावली के जरिये ख़बरों को मसालेदार बनाने की युक्त होती है। निर्देशक रितेश बत्रा की 'द लंचबॉक्स' नामक शानदार फिल्म में शेख हर बात से कहने से पहले, अम्मी कहती है, का इस्तेमाल करता है। उसकी बात पर साजन फर्नांडिस कहता है, तू तो अनाथ है ना, तो शेख कहता है, 'अम्मी कहती है' लगाने से बात में वजन आ जाता है।
बस, हर किसी को बात में वजन लाने की सूझती है। 'शब्द' जितना वजनदार होगा, स्टोरी या बात उतनी वजन दार होगी। तुम अपनी ओर से 'कुछ' कहो और बाद में, उसी 'कुछ' को तुम महात्मा गांधी या मार्टिन लूथर किंग के नाम से जोड़कर कहो। तुम महसूस करोगे कि बात में वजन आ रहा है।
शब्दों में वजन काम करता है। मोदी लहर भी इसी बीमारी की उपज है। इसको हम रचनात्मकता का नाम दे सकते हैं। जब कोई इस लहर को रोकेगा, तो उसका कद लहर वाले से यकीनन बड़ा हो जाएगा। जब आदमी बड़ा है तो कवरेज भी बड़ी होनी चाहिए। सिकंदर को रोकने वाला पोरस छोटा कैसे हो सकता है ? भले ही, पोरस ने सिकंदर पर जीत हासिल न की हो, लेकिन सिकंदर को रोकना भी कम नहीं हो सकता।
अगर, दिल्ली में 'मोदी लहर' की हवा निकली है, तो चिंता का विषय है। मगर, चिंता केवल बीजेपी के लिए नहीं, बल्कि तमाम राजनीतिक दलों के लिए। मोदी लहर को दरकिनार कर दो। अगर, आप कहते हैं, नहीं नहीं मोदी लहर तो थी, तो मैं कहता हूं, लहर अगर थी तो सत्ता विरोधी। जिस पर सवार होकर नरेंद्र मोदी दिल्ली सिंहासन तक पहुंचे। अगर हवाएं उस तरफ हों, जिस तरफ आपकी नौका को किनारा चाहिए, तो आपको अपने हुनर पर गुमान नहीं करना चाहिए बल्कि परिस्थितियों का शुक्रगुजार होना चाहिए कि वे इस समय आपके पक्ष में हैं।
'मोदी लहर' ने वर्ष 2014 में जन्म लिया, मगर, दिल्ली की जनता ने आम आदमी पार्टी के जरिये कांग्रेस के चारे खाने वर्ष 2013 में चित कर दिए थे। जो सीधे सीधे संकेत हैं कि लहर सत्ता विरोधी थी। कांग्रेस के भ्रष्टाचार से लोग तंग आ चुके थे। देश के पास विकल्प के तौर पर बीजेपी के अलावा दूसरा कोई था भी नहीं। बाकी सभी नेता क्षेत्रीय पार्टियों से आते हैं, जो या तो जनता परिवार से टूटकर बनी हैं, या कांग्रेस से।
अगर, मोदी लहर होती तो इसका असर उड़ीसा, पश्चिमी बंगाल, तमिलनाडू में जरूर दिखाई पड़ता। वहीं, नवोदित आम आदमी पार्टी अकाली दल बीजेपी के गढ़ पंजाब से चार सांसद लाने में कामयाब न होती। हालांकि, अन्य राज्यों में परिस्थितियां पूर्ण रूप से भारतीय जनता पार्टी के पक्ष में थी। फिलहाल, आम आदमी पार्टी पर विश्वास करना मुश्किल था, क्योंकि लोग नए थे, रातोंरात उम्मीदवार मिले थे। बीजेपी के पीछे तमाम आध्यात्मिक, धार्मिक संस्थान, आरएसएस समेत अन्य हिंदू संगठन थे।
अगर, लोक सभा चुनावों के बाद के चुनावों पर नजर मारे तो देखेंगे कि बीजेपी ने महाराष्ट्र चुनाव जीता, मगर, सरकार अल्पमत में है यदि शिव सेना विरोध पर उतर आए, तो बीजेपी को एनसीपी का सहारा लेना होगा, जिसको नरेंद्र मोदी चुनावों के दिनों में नेचुरल करप्ट पार्टी या चाचे भतीजे की पार्टी कहते थे।
हरियाणा में सफलता का मुख्य कारण डेरे का समर्थन, वाड्रा डीएलएफ जमीन घोटाले का हरियाणा से जुड़े होना, हुड्डा सरकार का दस वर्षीय कार्यकाल, गोपाल कांडा का मामला, कांग्रेस के अंदर दरार, केंद्र में कांग्रेस का सफाया, भ्रष्टाचार की छवि हैं। मगर, जम्मू कश्मीर में बिखराव के नतीजे मिले, जिसके कारण वहां सरकार नहीं बन पाई। झारखंड को बदलाव की जरूरत थी एवं बाहरी दलों से आए नेताओं को टिकट देना अच्छा साबित हुआ।
देश बदलाव के मुहाने पर खड़ा है। लोगों के बीच अब राजनीति को लेकर चर्चा होने लगी है। कल तक जनता किसी मुद्दे पर अधिक माथा मच्ची नहीं करती थी। केंद्र में भारतीय जनता पार्टी की सरकार देने के बाद दिल्ली की जनता ने नई पार्टी आम आदमी पार्टी को प्रचंड बहुमत देकर कहीं न कहीं अपनी समझ का परिचय दिया है। और लहर की धुन में रहने वाले नेताओं को सचेत किया है, 'लहर' वजन बढ़ाने के लिए अच्छा शब्द है, वरना जनादेश से बढ़कर कुछ नहीं है। लोक सभा में बीजेपी को बहुमत मिला क्योंकि क्षेत्रीय पार्टियों को अधिक सांसद देने का मतलब था, कांग्रेस की सरकार या खिचड़ी सरकार, जिससे देश को नुकसान होता।
अब न मोदी लहर काम करती है, न केजरीवाल लहर। केवल मुद्दे काम करते हैं, यदि आप मुद्दों की डिलिवरी देने में सफल रहते हैं, तो आपको बहुमत मिल सकता है। जो अन्य दलों ने लोक सभा चुनावों में गलती की थी, उसी तरह की गलती बीजेपी ने दिल्ली विधान सभा चुनावों में की। व्यक्तिगत हमले, मुद्दों से हटकर भाषणबाजी।
हालांकि, यदि इसके बाद बीजेपी किसी क्षेत्र में शानदार प्रदर्शन करती है तो मोदी लहर में जान आ जाएगी। यह केवल शब्दावली के जरिये ख़बरों को मसालेदार बनाने की युक्त होती है। निर्देशक रितेश बत्रा की 'द लंचबॉक्स' नामक शानदार फिल्म में शेख हर बात से कहने से पहले, अम्मी कहती है, का इस्तेमाल करता है। उसकी बात पर साजन फर्नांडिस कहता है, तू तो अनाथ है ना, तो शेख कहता है, 'अम्मी कहती है' लगाने से बात में वजन आ जाता है।
बस, हर किसी को बात में वजन लाने की सूझती है। 'शब्द' जितना वजनदार होगा, स्टोरी या बात उतनी वजन दार होगी। तुम अपनी ओर से 'कुछ' कहो और बाद में, उसी 'कुछ' को तुम महात्मा गांधी या मार्टिन लूथर किंग के नाम से जोड़कर कहो। तुम महसूस करोगे कि बात में वजन आ रहा है।
शब्दों में वजन काम करता है। मोदी लहर भी इसी बीमारी की उपज है। इसको हम रचनात्मकता का नाम दे सकते हैं। जब कोई इस लहर को रोकेगा, तो उसका कद लहर वाले से यकीनन बड़ा हो जाएगा। जब आदमी बड़ा है तो कवरेज भी बड़ी होनी चाहिए। सिकंदर को रोकने वाला पोरस छोटा कैसे हो सकता है ? भले ही, पोरस ने सिकंदर पर जीत हासिल न की हो, लेकिन सिकंदर को रोकना भी कम नहीं हो सकता।
अगर, दिल्ली में 'मोदी लहर' की हवा निकली है, तो चिंता का विषय है। मगर, चिंता केवल बीजेपी के लिए नहीं, बल्कि तमाम राजनीतिक दलों के लिए। मोदी लहर को दरकिनार कर दो। अगर, आप कहते हैं, नहीं नहीं मोदी लहर तो थी, तो मैं कहता हूं, लहर अगर थी तो सत्ता विरोधी। जिस पर सवार होकर नरेंद्र मोदी दिल्ली सिंहासन तक पहुंचे। अगर हवाएं उस तरफ हों, जिस तरफ आपकी नौका को किनारा चाहिए, तो आपको अपने हुनर पर गुमान नहीं करना चाहिए बल्कि परिस्थितियों का शुक्रगुजार होना चाहिए कि वे इस समय आपके पक्ष में हैं।
'मोदी लहर' ने वर्ष 2014 में जन्म लिया, मगर, दिल्ली की जनता ने आम आदमी पार्टी के जरिये कांग्रेस के चारे खाने वर्ष 2013 में चित कर दिए थे। जो सीधे सीधे संकेत हैं कि लहर सत्ता विरोधी थी। कांग्रेस के भ्रष्टाचार से लोग तंग आ चुके थे। देश के पास विकल्प के तौर पर बीजेपी के अलावा दूसरा कोई था भी नहीं। बाकी सभी नेता क्षेत्रीय पार्टियों से आते हैं, जो या तो जनता परिवार से टूटकर बनी हैं, या कांग्रेस से।
अगर, मोदी लहर होती तो इसका असर उड़ीसा, पश्चिमी बंगाल, तमिलनाडू में जरूर दिखाई पड़ता। वहीं, नवोदित आम आदमी पार्टी अकाली दल बीजेपी के गढ़ पंजाब से चार सांसद लाने में कामयाब न होती। हालांकि, अन्य राज्यों में परिस्थितियां पूर्ण रूप से भारतीय जनता पार्टी के पक्ष में थी। फिलहाल, आम आदमी पार्टी पर विश्वास करना मुश्किल था, क्योंकि लोग नए थे, रातोंरात उम्मीदवार मिले थे। बीजेपी के पीछे तमाम आध्यात्मिक, धार्मिक संस्थान, आरएसएस समेत अन्य हिंदू संगठन थे।
अगर, लोक सभा चुनावों के बाद के चुनावों पर नजर मारे तो देखेंगे कि बीजेपी ने महाराष्ट्र चुनाव जीता, मगर, सरकार अल्पमत में है यदि शिव सेना विरोध पर उतर आए, तो बीजेपी को एनसीपी का सहारा लेना होगा, जिसको नरेंद्र मोदी चुनावों के दिनों में नेचुरल करप्ट पार्टी या चाचे भतीजे की पार्टी कहते थे।
हरियाणा में सफलता का मुख्य कारण डेरे का समर्थन, वाड्रा डीएलएफ जमीन घोटाले का हरियाणा से जुड़े होना, हुड्डा सरकार का दस वर्षीय कार्यकाल, गोपाल कांडा का मामला, कांग्रेस के अंदर दरार, केंद्र में कांग्रेस का सफाया, भ्रष्टाचार की छवि हैं। मगर, जम्मू कश्मीर में बिखराव के नतीजे मिले, जिसके कारण वहां सरकार नहीं बन पाई। झारखंड को बदलाव की जरूरत थी एवं बाहरी दलों से आए नेताओं को टिकट देना अच्छा साबित हुआ।
देश बदलाव के मुहाने पर खड़ा है। लोगों के बीच अब राजनीति को लेकर चर्चा होने लगी है। कल तक जनता किसी मुद्दे पर अधिक माथा मच्ची नहीं करती थी। केंद्र में भारतीय जनता पार्टी की सरकार देने के बाद दिल्ली की जनता ने नई पार्टी आम आदमी पार्टी को प्रचंड बहुमत देकर कहीं न कहीं अपनी समझ का परिचय दिया है। और लहर की धुन में रहने वाले नेताओं को सचेत किया है, 'लहर' वजन बढ़ाने के लिए अच्छा शब्द है, वरना जनादेश से बढ़कर कुछ नहीं है। लोक सभा में बीजेपी को बहुमत मिला क्योंकि क्षेत्रीय पार्टियों को अधिक सांसद देने का मतलब था, कांग्रेस की सरकार या खिचड़ी सरकार, जिससे देश को नुकसान होता।
अब न मोदी लहर काम करती है, न केजरीवाल लहर। केवल मुद्दे काम करते हैं, यदि आप मुद्दों की डिलिवरी देने में सफल रहते हैं, तो आपको बहुमत मिल सकता है। जो अन्य दलों ने लोक सभा चुनावों में गलती की थी, उसी तरह की गलती बीजेपी ने दिल्ली विधान सभा चुनावों में की। व्यक्तिगत हमले, मुद्दों से हटकर भाषणबाजी।
Sunday, February 8, 2015
अरविंद केजरीवाल के नाम खुला बधाई पत्र
नमस्कार,
अरविंद केजरीवाल,
संयोजक, आम आदमी पार्टी,
नई दिल्ली।
शानदार प्रदर्शन के लिए बधाई हो। एग्जिट पोल के आधार पर तो आप बधाई के हकदार है हीं। यदि एग्जिट पोल चूक भी जाएं, तो भी आप बधाई के हकदार हैं क्योंकि आप ने अपने जांबाज स्वयंसेवक के साथ जी जान लगाकर चुनावी युद्ध लड़ा है। कभी कभी खेल इतना रोचक हो जाता है कि उसमें हार जीत से अधिक खिलाड़ियों का व्यवहार और जज्बा महत्व रखने लगता है। मुझे क्रिकेट देखने का अधिक शौक नहीं, मगर, क्रिकेट के मैदान पर वसीम अकरम और अजय जाडेजा का जज्बा व व्यवहार देखना पसंद था। मैच हारे या जीते, वो मुस्कराते हुए नजर आते थे। अब आप जीत रहे हैं। आपकी बहुमत वाली सरकार दिल्ली में बनती नजर आ रही है। मैं आम आदमी पार्टी का समर्थक हूं। शायद इससे बेहतर यह कहना होगा कि मैं आम लोगों का समर्थक हूं, जो कुछ बदलाव लाना चाहते हैं। मैं आपकी पार्टी का समर्थन भी इसी सोच के साथ किया।
सबसे दिलचस्प बात तो यह है कि विकास और बदलाव के दावे करने वाले दो शख्स दिल्ली में होंगे। एक छोटी दिल्ली देखेगा, तो दूसरा बड़ी दिल्ली अर्थात क्रमश: आधा अधूरा राज्य एवं संपूर्ण राष्ट्र। दिल्ली को आम आदमी पार्टी की गंगोत्री कहूंगा क्योंकि इसका उदय दिल्ली से हुआ है। यदि आम आदमी पार्टी अपने वादे पूरे करने में सफल होती है तो गंगोत्री गंगा का रूप धारण कर लेगी। मगर, ध्यान रखने वाली बात यह है कि गंगा में बहुत सारे गंदे नाले भी आकर गिरने लगते हैं। यदि गंगा को साफ रखना है तो गंदे नालों को इसमें गिरने से रोकना होगा।
मुझे खुशी है कि आम आदमी पार्टी ने नरेंद्र मोदी की उस रणनीति के तहत विरोधियों का सामना किया, जो नरेंद्र मोदी ने लोक सभा चुनावों के दौरान अपनाई थी। लोक सभा चुनावों में जब नरेंद्र मोदी पर विरोधी निजी हमले कर रहे थे तो नरेंद्र मोदी स्वयं विकास के मुद्दे पर आगे बढ़ रहे थे। जिस तरह नरेंद्र मोदी ने प्रियंका वाड्रा के शब्द 'नीच राजनीति' को 'नीच जाति की राजनीति' से जोड़कर पिछड़ी जाति से होने का परिचय दिया। उसी तरह 'उपद्रवी गोत्र' की आड़ में अरविंद केजरीवाल जी आप भी अपना 'गोत्र अग्रवाल' बताने से चूके नहीं। जब बीजेपी आप पर निजी हमले बोल रही थी तो आप दिल्ली की जनता से मुद्दों की बात कर रहे थे।
जिस तरह नरेंद्र मोदी ने देश के तमाम राजनीतिक दलों को स्वयं के खिलाफ बताकर स्वयं के कद को ऊंचा किया, उस तरह आप ने बीजेपी एवं केंद्र सरकार को एक साथ दिखाकर स्वयं के कद को ऊंचा किया। आप ने केंद्र सरकार बनाम अरविंद केजरीवाल कर पूरा मामला अपनी तरफ खींच लिया। जब बीजेपी आप पर कीचड़ उछालने का प्रयास कर रही थी तो आप नरेंद्र मोदी की तरह चतुराई से काम लेते हुए बीजेपी सरकार को चुनौती देते हुए दिखे। आप ने कहा, ''सरकार आपकी है, जांच करवा लो, जेल में डाल दो।'' जब कांग्रेस नरेंद्र मोदी के खिलाफ बोलती थी तो नरेंद्र मोदी का जवाब भी इस तरह का होता था।
अब एग्जिट पोल कह रहे हैं कि नरेंद्र मोदी की तरह आप भी विजयी होने जा रहे हैं। दिल्ली की जनता आपको बहुमत देने जा रही है। मेरा तो इतना निवेदन है कि आप अपना घोषणा पत्र अब अपने सामने रखें। और उसके हिसाब से जल्द से जल्द रणनीति बनाएं। जब अतिआशावाद जन्म लेता है, तो उतावलापन भी तेजी के साथ पनपने लगता है। अब सवाल आपकी तरफ भी उछलेंगे। आप केवल 'जुमला था' कहकर नहीं बच सकते क्योंकि आप से जवाब विरोधी पार्टियां नहीं, बल्कि मेरे जैसे युवा भी मांगेंगे, जो गुजरात या देश के अन्य किसी राज्य से बैठकर आपको पुरजोर समर्थन कर रहे थे।
मुझे उम्मीद है कि अरविंद केजरीवाल दिल्ली को एक अच्छी सरकार मुहैया करवाएंगे क्योंकि आपकी पृष्ठभूमि राजनीति से संबंध नहीं रखती है। सबसे अधिक महत्वपूर्ण बात जो मैं अंत में लिखने जा रहा हूं। वो यह है कि आप राजनीति को समझ चुके हैं। आप ने उस समझ के आधार पर एक बड़े प्रवक्ता को मात दे दी। मगर, अब आप शब्दों पर जरूर संयम बरतें। बात वो कहें, जो आप को भविष्य में भी उचित लगे, वो नहीं, जिस पर यूटर्न लेना पड़े।
हालांकि, आपका घोषणा पत्र भी एक राजनीतिक पार्टी सा था, क्योंकि उसमें वादों को पूरा करने की निश्चित समय सीमा नहीं थी। 'पांच साल केजरीवाल' से समझ आ रहा था कि आप पांच साल चाहते हैं। अब जनता ने आपको पांच साल भी दे दिए, यदि मैं एग्जिट पोल को सही मान लूं।
अंत में, फिर से बधाई देते हुए कहना चाहूंगा कि आम आदमी पार्टी के स्वयंसेवकों को खेल दिखा रहे मदारी की तरह नजरिया रखनी चाहिए, जो दे उसका भी भला, जो न दे उसका भी भला। आजकल एक नया ट्रेंड चला है, यदि आप के पक्ष में लिखूं तो आपका समर्थक, विरोध में लिखूं, तो पूछ लिया जाता है, जनाब कितने पैसे मिले हैं। करीब करीब यह हाल सभी पार्टी समर्थकों का है, लेकिन आम आदमी पार्टी से अलग तरह के व्यवहार की उम्मीद रखते हैं क्योंकि इस पार्टी में राजनीतिक लोगों की भीड़ नहीं है। बस अच्छी एवं स्वच्छ राजनीति का परिचय दें।
जय हिंद
अरविंद केजरीवाल,
संयोजक, आम आदमी पार्टी,
नई दिल्ली।
शानदार प्रदर्शन के लिए बधाई हो। एग्जिट पोल के आधार पर तो आप बधाई के हकदार है हीं। यदि एग्जिट पोल चूक भी जाएं, तो भी आप बधाई के हकदार हैं क्योंकि आप ने अपने जांबाज स्वयंसेवक के साथ जी जान लगाकर चुनावी युद्ध लड़ा है। कभी कभी खेल इतना रोचक हो जाता है कि उसमें हार जीत से अधिक खिलाड़ियों का व्यवहार और जज्बा महत्व रखने लगता है। मुझे क्रिकेट देखने का अधिक शौक नहीं, मगर, क्रिकेट के मैदान पर वसीम अकरम और अजय जाडेजा का जज्बा व व्यवहार देखना पसंद था। मैच हारे या जीते, वो मुस्कराते हुए नजर आते थे। अब आप जीत रहे हैं। आपकी बहुमत वाली सरकार दिल्ली में बनती नजर आ रही है। मैं आम आदमी पार्टी का समर्थक हूं। शायद इससे बेहतर यह कहना होगा कि मैं आम लोगों का समर्थक हूं, जो कुछ बदलाव लाना चाहते हैं। मैं आपकी पार्टी का समर्थन भी इसी सोच के साथ किया।
सबसे दिलचस्प बात तो यह है कि विकास और बदलाव के दावे करने वाले दो शख्स दिल्ली में होंगे। एक छोटी दिल्ली देखेगा, तो दूसरा बड़ी दिल्ली अर्थात क्रमश: आधा अधूरा राज्य एवं संपूर्ण राष्ट्र। दिल्ली को आम आदमी पार्टी की गंगोत्री कहूंगा क्योंकि इसका उदय दिल्ली से हुआ है। यदि आम आदमी पार्टी अपने वादे पूरे करने में सफल होती है तो गंगोत्री गंगा का रूप धारण कर लेगी। मगर, ध्यान रखने वाली बात यह है कि गंगा में बहुत सारे गंदे नाले भी आकर गिरने लगते हैं। यदि गंगा को साफ रखना है तो गंदे नालों को इसमें गिरने से रोकना होगा।
मुझे खुशी है कि आम आदमी पार्टी ने नरेंद्र मोदी की उस रणनीति के तहत विरोधियों का सामना किया, जो नरेंद्र मोदी ने लोक सभा चुनावों के दौरान अपनाई थी। लोक सभा चुनावों में जब नरेंद्र मोदी पर विरोधी निजी हमले कर रहे थे तो नरेंद्र मोदी स्वयं विकास के मुद्दे पर आगे बढ़ रहे थे। जिस तरह नरेंद्र मोदी ने प्रियंका वाड्रा के शब्द 'नीच राजनीति' को 'नीच जाति की राजनीति' से जोड़कर पिछड़ी जाति से होने का परिचय दिया। उसी तरह 'उपद्रवी गोत्र' की आड़ में अरविंद केजरीवाल जी आप भी अपना 'गोत्र अग्रवाल' बताने से चूके नहीं। जब बीजेपी आप पर निजी हमले बोल रही थी तो आप दिल्ली की जनता से मुद्दों की बात कर रहे थे।
जिस तरह नरेंद्र मोदी ने देश के तमाम राजनीतिक दलों को स्वयं के खिलाफ बताकर स्वयं के कद को ऊंचा किया, उस तरह आप ने बीजेपी एवं केंद्र सरकार को एक साथ दिखाकर स्वयं के कद को ऊंचा किया। आप ने केंद्र सरकार बनाम अरविंद केजरीवाल कर पूरा मामला अपनी तरफ खींच लिया। जब बीजेपी आप पर कीचड़ उछालने का प्रयास कर रही थी तो आप नरेंद्र मोदी की तरह चतुराई से काम लेते हुए बीजेपी सरकार को चुनौती देते हुए दिखे। आप ने कहा, ''सरकार आपकी है, जांच करवा लो, जेल में डाल दो।'' जब कांग्रेस नरेंद्र मोदी के खिलाफ बोलती थी तो नरेंद्र मोदी का जवाब भी इस तरह का होता था।
अब एग्जिट पोल कह रहे हैं कि नरेंद्र मोदी की तरह आप भी विजयी होने जा रहे हैं। दिल्ली की जनता आपको बहुमत देने जा रही है। मेरा तो इतना निवेदन है कि आप अपना घोषणा पत्र अब अपने सामने रखें। और उसके हिसाब से जल्द से जल्द रणनीति बनाएं। जब अतिआशावाद जन्म लेता है, तो उतावलापन भी तेजी के साथ पनपने लगता है। अब सवाल आपकी तरफ भी उछलेंगे। आप केवल 'जुमला था' कहकर नहीं बच सकते क्योंकि आप से जवाब विरोधी पार्टियां नहीं, बल्कि मेरे जैसे युवा भी मांगेंगे, जो गुजरात या देश के अन्य किसी राज्य से बैठकर आपको पुरजोर समर्थन कर रहे थे।
मुझे उम्मीद है कि अरविंद केजरीवाल दिल्ली को एक अच्छी सरकार मुहैया करवाएंगे क्योंकि आपकी पृष्ठभूमि राजनीति से संबंध नहीं रखती है। सबसे अधिक महत्वपूर्ण बात जो मैं अंत में लिखने जा रहा हूं। वो यह है कि आप राजनीति को समझ चुके हैं। आप ने उस समझ के आधार पर एक बड़े प्रवक्ता को मात दे दी। मगर, अब आप शब्दों पर जरूर संयम बरतें। बात वो कहें, जो आप को भविष्य में भी उचित लगे, वो नहीं, जिस पर यूटर्न लेना पड़े।
हालांकि, आपका घोषणा पत्र भी एक राजनीतिक पार्टी सा था, क्योंकि उसमें वादों को पूरा करने की निश्चित समय सीमा नहीं थी। 'पांच साल केजरीवाल' से समझ आ रहा था कि आप पांच साल चाहते हैं। अब जनता ने आपको पांच साल भी दे दिए, यदि मैं एग्जिट पोल को सही मान लूं।
अंत में, फिर से बधाई देते हुए कहना चाहूंगा कि आम आदमी पार्टी के स्वयंसेवकों को खेल दिखा रहे मदारी की तरह नजरिया रखनी चाहिए, जो दे उसका भी भला, जो न दे उसका भी भला। आजकल एक नया ट्रेंड चला है, यदि आप के पक्ष में लिखूं तो आपका समर्थक, विरोध में लिखूं, तो पूछ लिया जाता है, जनाब कितने पैसे मिले हैं। करीब करीब यह हाल सभी पार्टी समर्थकों का है, लेकिन आम आदमी पार्टी से अलग तरह के व्यवहार की उम्मीद रखते हैं क्योंकि इस पार्टी में राजनीतिक लोगों की भीड़ नहीं है। बस अच्छी एवं स्वच्छ राजनीति का परिचय दें।
जय हिंद
दिल्ली विस चुनाव - बीजेपी की बड़ी गलतियां
एग्जिट पोल के नतीजों को सही मान लिया जाए तो दिल्ली विधान सभा चुनाव में आम आदमी पार्टी जीत का परचम लहराने जा रही है। यदि बीजेपी नेताओं के मुताबिक इसको नकारा भी दिया जाए तो भी भाजपा के लिए अति उल्लास की बात नहीं होगी क्योंकि भाजपा ने जितनी जान दिल्ली विधान सभा चुनावों में लगाई, उतनी कहीं और नहीं।
नतीजा यह हुआ कि एक सामान्य विधान सभा का चुनाव केंद्रीय सरकार बनाम एक आम आदमी बन गया। कांग्रेस ने स्वयं को रिंग से बाहर रखा। इससे कांग्रेस को फायदा होगा या नहीं, यह बात को 10 फरवरी 2015 शाम तक स्पष्ट हो जाएगी। यदि एग्जिट पोल के नतीजों के विपरीत परिणाम आ भी जाते हैं तो भी भाजपा को इस चुनाव से बहुत कुछ सीखने की जरूरत रहेगी।
अति आत्मविश्वास - लोक सभा चुनावों में नरेंद्र मोदी की अगुवाई में भाजपा को मिले बहुमत ने भाजपा के शीर्ष नेतृत्व को अति आत्मविश्वासी एवं अहंकारी बना दिया। इस बात को नहीं भूलना चाहिए कि अहंकार और अति आत्मविश्वास हमेशा संगठन को कमजोर करता है। अहंकार के कारण संगठन टूटने लगता है एवं अति आत्मविश्वास के कारण पार्टी कार्यकर्ता जीत को लेकर आश्वस्त हो जाते हैं।
किरण बेदी प्रवेश - भारतीय जनता पार्टी ने दिल्ली में किरण बेदी को अरविंद केजरीवाल के तोड़ के रूप में उतारा। मगर, बीजेपी के इस कदम से दिल्ली इकाई के शीर्ष नेता नाराज हो गए। वर्षों से जुड़े लोग अपने संगठन को छोड़ तो नहीं सकते, लेकिन शीर्ष नेताओं को सबक जरूर दे सकते हैं, जो एग्जिट पोल में साफ दिखाई दे रहा है, हालांकि, नतीजों तक इंतजार रहेगा।
प्रधानमंत्री की रैलियां - भाजपा ने नरेंद्र मोदी की छवि को भुनाने की पुरजोर कोशिश की। इस कोशिश में बीजेपी ने इस बात को नजरअंदाज कर दिया कि इससे नरेंद्र मोदी की छवि को अधिक फर्क नहीं पड़ेगा, लेकिन इससे स्थानीय नेताओं का कद और कम हो जाएगा एवं एक नई पार्टी यानी कि आम आदमी पार्टी को बैठे बिठाए एक ऊंचाई मिल जाएगी। इसका आम आदमी पार्टी ने पुरजोर फायदा उठाया। आम आदमी पार्टी ने दिल्ली चुनावों में केंद्र सरकार के वादों को घसीटा, जो आज तक पूरे नहीं हुए।
पूरी पार्टी को उतारना - भाजपा ने केंद्रीय मंत्रियों समेत अपने सभी मुख्यमंत्रियों से लेकर सांसदों तक को चुनाव प्रचार में उतारकर अपने पांव पर कुल्हाड़ी मारने का काम किया। जनता की पूरी हमदर्दी आम आदमी पार्टी के पक्ष में चली गई। जनता में भ्रम तेजी से फैलने लगा कि आम आदमी पार्टी को रोकने के लिए भारतीय जनता पार्टी कुछ भी कर सकती है।
व्यक्तिगत हमले - अरविंद केजरीवाल पर लंबे समय से बीजेपी समर्थकों की तरफ से व्यक्तिगत हमले किए जा रहे हैं। जनता भी इससे ऊब चुकी है। भाजपा ने इसको दोहराकर साबित किया कि केजरीवाल के खिलाफ भाजपा के पास ठोस बातें नहीं हैं। बीजेपी के विज्ञापन बीजेपी पर भारी पड़ने लगे। चाहे उपद्रवी गोत्र हो या अन्ना को माला पहनाकर मृत घोषित करना हो। बीजेपी केजरीवाल को निशाना बनाने के चक्कर में अन्ना को उस समय माला पहना रही है, जब वो स्वयं अन्ना टीम की सदस्य रही किरण बेदी को मुख्यमंत्री पद की दावेदार घोषित कर रही है।
अवाम का खुलासा - चुनाव से ठीक कुछ दिन पहले अवाम का जिन्न का बोतल से निकलना। और खुलासे के अगले दिन नरेंद्र मोदी का आम आदमी पार्टी पर निशाना साधना पीछे की तस्वीर को साफ कर रहा था। अवाम की बात में सच्चाई हो सकती है, मगर चुनावों के दौरान इसको केवल हथकंडे से अधिक कुछ नहीं माना जा सकता। खासकर, उस समय जब सरकार बीजेपी की हो।
बाहरी लोगों को टिकट - भारतीय जनता पार्टी ने अपने वरिष्ठ नेताओं को नाराज कर बाहर से आए नेताओं को धड़ाधड़ टिकट दिए, ताकि भाजपा को दिल्ली की सत्ता मिल जाए। मगर, उन वरिष्ठ नेताओं की मेहनत का क्या, जो वो सालों से करते आ रहे थे। इसका मतलब तो यह हुआ कि यदि किसी पार्टी को केंद्र में सत्ता किसी व्यक्ति की लोकप्रियता से मिल रही हो तो पार्टी के सभी नेताओं को दरकिनार किया जा सकता है।
मुद्दों की बात छूट गई - भाजपा ने लोक सभा चुनाव मुद्दों पर लड़े थे। बीजेपी स्वयं मानती है कि उसको विकास के नाम पर बहुमत मिला है। आज देश का हर नागरिक विकास चाहता है। जहां उसको एक उम्मीद की किरण नजर आती है, उसकी तरफ चल देता है। भाजपा ने दिल्ली में विकास के मुद्दों पर बात न करते हुए अपना पूरा चुनाव प्रचार केवल अरविंद केजरीवाल को रोकने तक सीमित कर दिया। जो एक राष्ट्रीय प्रतिष्ठा रखने वाली पार्टी को नहीं करना चाहिए था।
अंत में
भारतीय जनता पार्टी को इस बार दिल्ली विधान सभा चुनावों में लगभग 55 सीटों पर जीत दर्ज करनी चाहिए थी, क्योंकि केंद्र में भारतीय जनता पार्टी की सरकार है, और साथ में विकास पुरुष की लोकप्रियता।
नतीजा यह हुआ कि एक सामान्य विधान सभा का चुनाव केंद्रीय सरकार बनाम एक आम आदमी बन गया। कांग्रेस ने स्वयं को रिंग से बाहर रखा। इससे कांग्रेस को फायदा होगा या नहीं, यह बात को 10 फरवरी 2015 शाम तक स्पष्ट हो जाएगी। यदि एग्जिट पोल के नतीजों के विपरीत परिणाम आ भी जाते हैं तो भी भाजपा को इस चुनाव से बहुत कुछ सीखने की जरूरत रहेगी।
अति आत्मविश्वास - लोक सभा चुनावों में नरेंद्र मोदी की अगुवाई में भाजपा को मिले बहुमत ने भाजपा के शीर्ष नेतृत्व को अति आत्मविश्वासी एवं अहंकारी बना दिया। इस बात को नहीं भूलना चाहिए कि अहंकार और अति आत्मविश्वास हमेशा संगठन को कमजोर करता है। अहंकार के कारण संगठन टूटने लगता है एवं अति आत्मविश्वास के कारण पार्टी कार्यकर्ता जीत को लेकर आश्वस्त हो जाते हैं।
किरण बेदी प्रवेश - भारतीय जनता पार्टी ने दिल्ली में किरण बेदी को अरविंद केजरीवाल के तोड़ के रूप में उतारा। मगर, बीजेपी के इस कदम से दिल्ली इकाई के शीर्ष नेता नाराज हो गए। वर्षों से जुड़े लोग अपने संगठन को छोड़ तो नहीं सकते, लेकिन शीर्ष नेताओं को सबक जरूर दे सकते हैं, जो एग्जिट पोल में साफ दिखाई दे रहा है, हालांकि, नतीजों तक इंतजार रहेगा।
प्रधानमंत्री की रैलियां - भाजपा ने नरेंद्र मोदी की छवि को भुनाने की पुरजोर कोशिश की। इस कोशिश में बीजेपी ने इस बात को नजरअंदाज कर दिया कि इससे नरेंद्र मोदी की छवि को अधिक फर्क नहीं पड़ेगा, लेकिन इससे स्थानीय नेताओं का कद और कम हो जाएगा एवं एक नई पार्टी यानी कि आम आदमी पार्टी को बैठे बिठाए एक ऊंचाई मिल जाएगी। इसका आम आदमी पार्टी ने पुरजोर फायदा उठाया। आम आदमी पार्टी ने दिल्ली चुनावों में केंद्र सरकार के वादों को घसीटा, जो आज तक पूरे नहीं हुए।
पूरी पार्टी को उतारना - भाजपा ने केंद्रीय मंत्रियों समेत अपने सभी मुख्यमंत्रियों से लेकर सांसदों तक को चुनाव प्रचार में उतारकर अपने पांव पर कुल्हाड़ी मारने का काम किया। जनता की पूरी हमदर्दी आम आदमी पार्टी के पक्ष में चली गई। जनता में भ्रम तेजी से फैलने लगा कि आम आदमी पार्टी को रोकने के लिए भारतीय जनता पार्टी कुछ भी कर सकती है।
व्यक्तिगत हमले - अरविंद केजरीवाल पर लंबे समय से बीजेपी समर्थकों की तरफ से व्यक्तिगत हमले किए जा रहे हैं। जनता भी इससे ऊब चुकी है। भाजपा ने इसको दोहराकर साबित किया कि केजरीवाल के खिलाफ भाजपा के पास ठोस बातें नहीं हैं। बीजेपी के विज्ञापन बीजेपी पर भारी पड़ने लगे। चाहे उपद्रवी गोत्र हो या अन्ना को माला पहनाकर मृत घोषित करना हो। बीजेपी केजरीवाल को निशाना बनाने के चक्कर में अन्ना को उस समय माला पहना रही है, जब वो स्वयं अन्ना टीम की सदस्य रही किरण बेदी को मुख्यमंत्री पद की दावेदार घोषित कर रही है।
अवाम का खुलासा - चुनाव से ठीक कुछ दिन पहले अवाम का जिन्न का बोतल से निकलना। और खुलासे के अगले दिन नरेंद्र मोदी का आम आदमी पार्टी पर निशाना साधना पीछे की तस्वीर को साफ कर रहा था। अवाम की बात में सच्चाई हो सकती है, मगर चुनावों के दौरान इसको केवल हथकंडे से अधिक कुछ नहीं माना जा सकता। खासकर, उस समय जब सरकार बीजेपी की हो।
बाहरी लोगों को टिकट - भारतीय जनता पार्टी ने अपने वरिष्ठ नेताओं को नाराज कर बाहर से आए नेताओं को धड़ाधड़ टिकट दिए, ताकि भाजपा को दिल्ली की सत्ता मिल जाए। मगर, उन वरिष्ठ नेताओं की मेहनत का क्या, जो वो सालों से करते आ रहे थे। इसका मतलब तो यह हुआ कि यदि किसी पार्टी को केंद्र में सत्ता किसी व्यक्ति की लोकप्रियता से मिल रही हो तो पार्टी के सभी नेताओं को दरकिनार किया जा सकता है।
मुद्दों की बात छूट गई - भाजपा ने लोक सभा चुनाव मुद्दों पर लड़े थे। बीजेपी स्वयं मानती है कि उसको विकास के नाम पर बहुमत मिला है। आज देश का हर नागरिक विकास चाहता है। जहां उसको एक उम्मीद की किरण नजर आती है, उसकी तरफ चल देता है। भाजपा ने दिल्ली में विकास के मुद्दों पर बात न करते हुए अपना पूरा चुनाव प्रचार केवल अरविंद केजरीवाल को रोकने तक सीमित कर दिया। जो एक राष्ट्रीय प्रतिष्ठा रखने वाली पार्टी को नहीं करना चाहिए था।
अंत में
भारतीय जनता पार्टी को इस बार दिल्ली विधान सभा चुनावों में लगभग 55 सीटों पर जीत दर्ज करनी चाहिए थी, क्योंकि केंद्र में भारतीय जनता पार्टी की सरकार है, और साथ में विकास पुरुष की लोकप्रियता।
Saturday, January 10, 2015
'रामलीला' मैदान में 'मोदी लीला'
बाबा रामदेव का काले धन को लेकर अनशन हो या अन्ना हजारे का जन लोकपाल बिल लाने को लेकर शुरू किया गया आंदोलन। दोनों की याद आती है तो याद आता है दिल्ली का रामलीला मैदान। मैदान के नाम से जाहिर होता है कि यहां पर दीवाली से पूर्व रामलीला का आयोजन किया जाता है। यहां आयोजित होने वाली रामलीला में श्रीराम और रावण के बीच छद्म युद्ध होता है, क्योंकि रामलीला में सभी कलाकार एक दूसरे की जान पहचान के होते हैं। उनको पता होता है कि वो केवल कुछ दिनों के लिए किरदार अदा कर रहे हैं। अंत, उनको अपने असल जीवन में ढलना है।
मगर, यहां एक अन्य लीला भी होती है। वो राजनेताओं की होती है। इस लीला में रावण हमेशा विरोधी पार्टियां होती हैं। स्वयं को राम कौन नहीं कहना चाहेगा। राम जो ठहरे मर्यादा पुरुषोत्तम। यहां हर आदमी एक दूसरे से उत्तम होने की दौड़ में है। चुनावों के दिनों में नेता भी हाथी सी फीलिंग लेकर गलियों मोहल्लों से गुजरते हैं। आलोचना करने वालों को कुत्तों से अधिक समझते भी नहीं। इन दिनों हर कोई देश की विकास पैसेंजर को सुपर फास्ट बनाने के दावे करता है। बस! शर्त इतनी सी है कि इंजन उसके नाम का होना चाहिए। महिलाएं संदेही स्वभाव की होती है। भारतीय नेताओं को देखने के बाद यह तर्क झूठा सा मालूम पड़ता है क्योंकि जितना संदेह इनमें पाया जाता है, अन्य किसी प्राणी में नहीं। इनकी लीला ही निराली है।
लीला से याद आया। आज देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी रामलीला मैदान में थे। उनकी मेगा बजट रैली का आयोजन था। हालांकि, उनके होठों तले दबी हंसी बता रही थी कि उनकी स्थिति कुछ इस तरह की है, जैसे इंडिया टीम में खेलने वाला खिलाड़ी रणजी ट्राफी के लिए खेल रहा हो। रैली में दूर दराज से लोग आए होंगे। आख़िर देश के प्रधानमंत्री का लाइव भाषण कौन नहीं सुनना चाहेगा। मीडिया वाले भी अपने घरों से बड़े चौड़े होकर निकले होंगे। आख़िर एक महा रैली के साक्षी जो बनने वाले हैं। कुछ सालों बाद संस्मरण भी तो लिखने होंगे।
मगर, खोदा पहाड़ निकली चूहिया। जब मैंने प्रिय प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी की रैली के बारे में पढ़ा तो सोच में पड़ गया। प्रिय प्रधानमंत्री ने कहा, ''जो देश का मूड है, वही दिल्ली का भी मूड है।'' मैं भी गदगद हो उठा। मेरे अंदर खलबली सी मच गई। मैंने अपने आप से कहा, ''हे प्रिय, यदि आप इतने अंतर्यामी हैं तो प्रभु अपनी लीला का परिचय देते हुए इस रैली में विरोधियों पर हमला करने की जगह दिल्ली वासियों को अग्रिम शुक्रिया कह देते।''
मेरे प्रिय प्रधानमंत्री आप ने नवगठित पार्टी पर हमला बोलते हुए कहा, "जिन लोगों की मास्टरी धरना देने की है उनको वह काम करने दीजिए। हमारी मास्टरी सरकार चलाने में है इसलिए हमें यह काम सौंपिए।" मास्टरी से याद आया कि आप संघ परिवार से तालुक रखते हैं। और मैं जानना चाहूंगा कि उसके पास किस तरह मास्टरी है। हे प्रिय, जरा उसका इतिहास उठाकर बताएं। जरा नए भारत को बताएं कि जब भारत को आजादी मिल रही थी तो पुणे में कौन से ध्वज को लहराकर सलामी दी जा रही थी। जब देश में एक महिला दबंग नेता इंदिरा गांधी राज था तो आपकी पार्टी किस तरह की गतिविधियों का आयोजन कर रही थी। जरा खुलकर बताएंगे। आपको महात्मा गांधी सबसे प्रिय हैं। क्षमा करें! सत्याग्रह करना तो उन्होंने ही पूरे भारत को सिखाया है। आपका भाषण उसी तरह का मालूम पड़ता है, जैसे सनी लियोने कह रही हो, यदि अंग प्रदर्शन करना है तो पॉर्न दुनिया में चली जाएं। बॉलीवुड को मेरी जरूरत है क्योंकि मुझे अभिनय करना आता है।
प्रिय प्रधानमंत्री आपने कहा,'जिन लोगों ने दिल्ली का एक साल बर्बाद किया है। उनको सजा मिलनी चाहिए।' मैं आप से सहमत हूं। शत प्रतिशत सहमत हूं। किंतु, मैं इतना पूछता हूं कि आप दिल से बोल रहे हैं, या किसी पटकथा विशेषज्ञ के लिखे शब्दों को केवल आवाज दे रहे हैं। क्षमा करें, क्योंकि मैं आपको अब जम्मू कश्मीर की तरफ देखने को कहूंगा। जहां भाजपा एवं पीडीपी के कारण जनता का मतदान व्यर्थ जाने वाला है। मुझे पता है कि आप कुछ नहीं कहेंगे। आप बोलने वाले प्रधानमंत्री हैं। क्षमा करें, आप में संवाद क्षमता नहीं है। संवाद दो लोगों के बीच की वार्ता है। एक तरफ से दिया गया व्यक्तव्य संवाद नहीं कहलाता।
आप ने कहा, 'दिल्ली को मैं जनरेटर मुक्त बना दूंगा।' अर्थात 24 घंटे पूर्ण रूप से बिजली उपलब्ध करवाई जाएगी। आप देश के प्रधानमंत्री हैं। यकीनन, आप दिल्ली के मुख्यमंत्री तो बनेंगे नहीं। यदि आपके अधीनस्थ सरकार ऐसा करेगी तो मेरी इतनी सी जिज्ञासा है कि आप एक बार हरियाणा सरकार से जरूर पूछें कि वो अपने वादे 24 घंटे बिजली के अनुसार अब कितने घंटे बिजली हरियाणा के लोगों को उपलब्ध करवा रही है।
आप ने कहा, मेरी सरकार को सात महीने हो गए। भ्रष्टाचार का एक भी मामला सामने नहीं आया। लेकिन, आप ने यह नहीं बताया कि पिछले सात महीनों में आप की सरकार ने कितने अध्यादेश जारी किए। सच कहूं तो अध्यादेश राज आपकी सरकार में ही आया है। यकीन नहीं होता कि उस सरकार ने 15 दिन में सात अध्यादेश पारित कर दिए, जो संप्रग पर अध्यादेश राज लाने का आरोप लगा रही थी। पिछले सात महीनों में देश के आपको अधिक समय विदेश यात्रा पर देखा है। इसके अलावा मीडिया में केवल धर्म परिवर्तन, घर वापसी, बेटी बचाओ बहू लाओ, गीता का राष्ट्रीयकरण, स्कूलों में संस्कृत, चार बच्चे पैदा करो, सूर्य नमस्कार इत्यादि ही आया है।
वैसे दिल्ली में 2022 तक झोपड़ियों की संख्या बढ़कर कितनी हो सकती है ? क्योंकि मोदी जी आपकी घोषणा के बाद अब बेघर लोगों का नारा होगा दिल्ली चलो झुग्गी बनाओ। पक्की तो मोदी जी कर देंगे। हां, पर अहमदाबाद वाले पूछ रहे हैं कि उनकी झुग्गियो में कब तक बिनानी सीमेंट लग जाएगा। सदियों के लिए।
मगर, यहां एक अन्य लीला भी होती है। वो राजनेताओं की होती है। इस लीला में रावण हमेशा विरोधी पार्टियां होती हैं। स्वयं को राम कौन नहीं कहना चाहेगा। राम जो ठहरे मर्यादा पुरुषोत्तम। यहां हर आदमी एक दूसरे से उत्तम होने की दौड़ में है। चुनावों के दिनों में नेता भी हाथी सी फीलिंग लेकर गलियों मोहल्लों से गुजरते हैं। आलोचना करने वालों को कुत्तों से अधिक समझते भी नहीं। इन दिनों हर कोई देश की विकास पैसेंजर को सुपर फास्ट बनाने के दावे करता है। बस! शर्त इतनी सी है कि इंजन उसके नाम का होना चाहिए। महिलाएं संदेही स्वभाव की होती है। भारतीय नेताओं को देखने के बाद यह तर्क झूठा सा मालूम पड़ता है क्योंकि जितना संदेह इनमें पाया जाता है, अन्य किसी प्राणी में नहीं। इनकी लीला ही निराली है।
लीला से याद आया। आज देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी रामलीला मैदान में थे। उनकी मेगा बजट रैली का आयोजन था। हालांकि, उनके होठों तले दबी हंसी बता रही थी कि उनकी स्थिति कुछ इस तरह की है, जैसे इंडिया टीम में खेलने वाला खिलाड़ी रणजी ट्राफी के लिए खेल रहा हो। रैली में दूर दराज से लोग आए होंगे। आख़िर देश के प्रधानमंत्री का लाइव भाषण कौन नहीं सुनना चाहेगा। मीडिया वाले भी अपने घरों से बड़े चौड़े होकर निकले होंगे। आख़िर एक महा रैली के साक्षी जो बनने वाले हैं। कुछ सालों बाद संस्मरण भी तो लिखने होंगे।
मगर, खोदा पहाड़ निकली चूहिया। जब मैंने प्रिय प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी की रैली के बारे में पढ़ा तो सोच में पड़ गया। प्रिय प्रधानमंत्री ने कहा, ''जो देश का मूड है, वही दिल्ली का भी मूड है।'' मैं भी गदगद हो उठा। मेरे अंदर खलबली सी मच गई। मैंने अपने आप से कहा, ''हे प्रिय, यदि आप इतने अंतर्यामी हैं तो प्रभु अपनी लीला का परिचय देते हुए इस रैली में विरोधियों पर हमला करने की जगह दिल्ली वासियों को अग्रिम शुक्रिया कह देते।''
मेरे प्रिय प्रधानमंत्री आप ने नवगठित पार्टी पर हमला बोलते हुए कहा, "जिन लोगों की मास्टरी धरना देने की है उनको वह काम करने दीजिए। हमारी मास्टरी सरकार चलाने में है इसलिए हमें यह काम सौंपिए।" मास्टरी से याद आया कि आप संघ परिवार से तालुक रखते हैं। और मैं जानना चाहूंगा कि उसके पास किस तरह मास्टरी है। हे प्रिय, जरा उसका इतिहास उठाकर बताएं। जरा नए भारत को बताएं कि जब भारत को आजादी मिल रही थी तो पुणे में कौन से ध्वज को लहराकर सलामी दी जा रही थी। जब देश में एक महिला दबंग नेता इंदिरा गांधी राज था तो आपकी पार्टी किस तरह की गतिविधियों का आयोजन कर रही थी। जरा खुलकर बताएंगे। आपको महात्मा गांधी सबसे प्रिय हैं। क्षमा करें! सत्याग्रह करना तो उन्होंने ही पूरे भारत को सिखाया है। आपका भाषण उसी तरह का मालूम पड़ता है, जैसे सनी लियोने कह रही हो, यदि अंग प्रदर्शन करना है तो पॉर्न दुनिया में चली जाएं। बॉलीवुड को मेरी जरूरत है क्योंकि मुझे अभिनय करना आता है।
प्रिय प्रधानमंत्री आपने कहा,'जिन लोगों ने दिल्ली का एक साल बर्बाद किया है। उनको सजा मिलनी चाहिए।' मैं आप से सहमत हूं। शत प्रतिशत सहमत हूं। किंतु, मैं इतना पूछता हूं कि आप दिल से बोल रहे हैं, या किसी पटकथा विशेषज्ञ के लिखे शब्दों को केवल आवाज दे रहे हैं। क्षमा करें, क्योंकि मैं आपको अब जम्मू कश्मीर की तरफ देखने को कहूंगा। जहां भाजपा एवं पीडीपी के कारण जनता का मतदान व्यर्थ जाने वाला है। मुझे पता है कि आप कुछ नहीं कहेंगे। आप बोलने वाले प्रधानमंत्री हैं। क्षमा करें, आप में संवाद क्षमता नहीं है। संवाद दो लोगों के बीच की वार्ता है। एक तरफ से दिया गया व्यक्तव्य संवाद नहीं कहलाता।
आप ने कहा, 'दिल्ली को मैं जनरेटर मुक्त बना दूंगा।' अर्थात 24 घंटे पूर्ण रूप से बिजली उपलब्ध करवाई जाएगी। आप देश के प्रधानमंत्री हैं। यकीनन, आप दिल्ली के मुख्यमंत्री तो बनेंगे नहीं। यदि आपके अधीनस्थ सरकार ऐसा करेगी तो मेरी इतनी सी जिज्ञासा है कि आप एक बार हरियाणा सरकार से जरूर पूछें कि वो अपने वादे 24 घंटे बिजली के अनुसार अब कितने घंटे बिजली हरियाणा के लोगों को उपलब्ध करवा रही है।
आप ने कहा, मेरी सरकार को सात महीने हो गए। भ्रष्टाचार का एक भी मामला सामने नहीं आया। लेकिन, आप ने यह नहीं बताया कि पिछले सात महीनों में आप की सरकार ने कितने अध्यादेश जारी किए। सच कहूं तो अध्यादेश राज आपकी सरकार में ही आया है। यकीन नहीं होता कि उस सरकार ने 15 दिन में सात अध्यादेश पारित कर दिए, जो संप्रग पर अध्यादेश राज लाने का आरोप लगा रही थी। पिछले सात महीनों में देश के आपको अधिक समय विदेश यात्रा पर देखा है। इसके अलावा मीडिया में केवल धर्म परिवर्तन, घर वापसी, बेटी बचाओ बहू लाओ, गीता का राष्ट्रीयकरण, स्कूलों में संस्कृत, चार बच्चे पैदा करो, सूर्य नमस्कार इत्यादि ही आया है।
वैसे दिल्ली में 2022 तक झोपड़ियों की संख्या बढ़कर कितनी हो सकती है ? क्योंकि मोदी जी आपकी घोषणा के बाद अब बेघर लोगों का नारा होगा दिल्ली चलो झुग्गी बनाओ। पक्की तो मोदी जी कर देंगे। हां, पर अहमदाबाद वाले पूछ रहे हैं कि उनकी झुग्गियो में कब तक बिनानी सीमेंट लग जाएगा। सदियों के लिए।
अंत में
एक मफलर वाले को हराने के लिए दिल्ली की भाजपा ईकाई को देश के प्रधानमंत्री सहित अन्य राज्यों के मुख्यमंत्रियों के जमावड़े की जरूरत पड़ रही है। बस इतना कहूंगा कि अरविंद केजरीवाल के पास गंवाने के लिए कुछ नहीं है और पाने के लिए छोड़ी हुई दिल्ली की कुर्सी है। यदि आप हार गए तो...... चल छोड़ो जाने दो। आप नहीं समझेंगे। आप प्रधानमंत्री हैं।
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