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Saturday, February 21, 2015

तेज प्रताप की शादी, 'समाजवाद' का जनाजा

सैफई में वैभव कार्यक्रम चल रहा है। सैंकड़ों टैंट लगे हैं। लाखों मेहमानों के लिए खाना बन रहा है। खाना बनाने के लिए मुम्‍बई और अन्‍य शहरों से खाना बनाने वाले बुलाए हुए हैं। देश के प्रधानमंत्री समेत अन्‍य राजनीतिक हस्‍तियों ने शादी में शिरकत की। इस शादी में सदी के महानायक अमिताभ बच्‍चन भी जया बच्‍चन के साथ पहुंचे।

यह कार्यक्रम एक समाजवादी परिवार का था। समाजवादी परिवार के मुखिया मुलायम सिंह यादव के पोते तेज प्रताप यादव का तिलक कार्यक्रम था। तेज प्रताप की शादी लालू प्रसाद यादव की बिटिया राजलक्ष्‍मी से हो रही है। कुछ लोग इसको यूपी बिहार का गठबंधन कह रहे हैं। लेकिन, कोई नहीं कह रहा कि यह जंगलराज के राजाओं का मिलन समारोह है।

हालांकि, सोशल मीडिया पर कुछ चुटकियां लेते हुए कह रहे हैं कि सांप्रदायिक ताकतें मजबूत हो रही हैं, नरेंद्र मोदी के सामने 'मुला' यम सिंह के पोते का तिलक करवाया जा रहा है। यह बात तो जगजाहिर है कि समाजवादी परिवार की पूरी राजनीति अल्‍प संख्‍यकों मतलब मुस्‍लिम समुदाय पर आधारित है। हालांकि, आज के मुख्‍यातिथि नरेंद्र मोदी की लहर ने लोक सभा चुनावों में साइकल वालों के पास केवल पांच सांसद छोड़े, जो समाजवादी परिवार सदस्‍य हैं।

हैरान हूं कि मीडिया वाले सैफई का लाइव कवरेज इस तरह दिखा रहे हैं, जैसे भारत आज भी गुलाम हो और एक राज परिवार में शादी चल रही हो। किसी मीडिया चैनल ने इसको लेकर सवाल उठाने की जहमत नहीं की। किसी चैनल ने नहीं कहा कि तेज प्रताप की शादी के साथ समाजवाद का जनाजा भी निकल रहा है।

एक चैनल पर पत्रकार कवरेज के दौरान पीसी देते हुए कहा रहा था, नरेंद्र मोदी ने मेहमानों के साथ तेज प्रताप यादव पर गुलाब की पत्‍तियां बरसाई। सुनते ही अचानक मन से आवाज निकली, तो क्‍या नरेंद्र मोदी बॉम्‍ब फेंकते। शादी में आए हैं, बतौर मुख्‍यातिथि तो कुछ रसमें तो निभानी होंगी।

चैनल वालों को भूल गया, बच्‍चे गलतियां करते हैं। किसी कोने में दफन होगी कि पेड़ पर टंगी लड़कियां। किसी को याद ही नहीं आए नदी में मिले दो सौ से अधिक मानव कंकाल। बस याद था तो सैफई का नजारा। वहां आने वाले मेहमान और उनकी गाड़ियां।

कुछ महीनों बाद बिहार चुनाव हैं, इस बार लालटेन पूरी तरह गूल हो जाए। और वहीं यूपी की जनता भी साइकिल के चक्‍के निकालकर दिल्‍ली के चोर बाजार में बेच दे। समाजवाद की आढ़ में राजवाड़ों की शानो शौकत देखी नहीं जाती, विशेषकर, जब भारत की एक बड़ी आबादी भूखमरी और बेरोजगारी से लड़ रही हो।

क्‍या आपको भी मिला 'सुकन्‍या समृद्धि योजना' का वाट्स एप संदेश ?

वाट्स एप संदेश आया। मीडिया से भी तेज वाट्सएप वाले हैं, लेकिन विश्वसनीय नहीं हैं। चौंकिए मत! मैं ऐसा क्यों कह रहा हूं। मेरे पास ऐसा सैंकड़े संदेश आते हैं, जो भ्रमित जानकारी से भरे होते हैं। आपको भी आते होंगे। कुछ दिन पहले मेरे पास सुकन्या समृद्धि योजना को लेकर संदेश आया। संदेश देखकर झटका लगा क्योंकि इसमें उपलब्ध जानकारी पूर्ण रूप से सही न थी। और संदेश के नीचे लिखा था, जल्द से जल्द लोगों तक पहुंचाएं, ताकि लोगों का भला हो सके।

दरअसल संदेश में लिखा था, 14 साल तक 1000 रुपये जमा करवाएं, और 21साल बाद सरकार आपको 6 लाख रुपये प्रदान करेगी। इसके लिए आपको डाक विभाग से संपर्क करना है। मैंने उसका आदेश मानने की बजाय सत्य को टटोलना शुरू किया। मैंने देखा कि संदेश में उपलब्ध जानकारी भ्रमित करने वाली है।

मेरी खोजबीन के बाद जो बात सामने आई वो कुछ यूं थी। सरकार ने डाक विभाग द्वारा एक सुकन्या समृद्धि खाता योजना शुरू की है। इस खाते को खुलवाने के लिए आपकी बच्ची की उम्र जन्म से लेकर 10 साल तक होनी चाहिए। इस खाते के तहत आपको 14 साल तक 1000 से लेकर डेढ़ लाख रुपये प्रति वर्ष जमा करवाने होंगे एवं इस खाते की परिपक्वता अवधि 21 वर्ष है। इस खाते के अधीन सरकार आपको आपकी जमा पूंजी पर 9.10 फीसद वार्षिक दर से  ब्याज उपलब्ध करवाएगी।

एक अनुमान के तहत यदि आप सलाना 12000 रूपये इस योजना के तहत 14 साल तक जमा करवाते हैं, तो सरकार आपको योजना की अवधि पूर्ण होने पर 6 लाख रुपये प्रदान करती है यदि आप 14 वर्ष तक डेढ़ लाख रुपए जमा करवाते हैं, तो सरकार आपको 72 लाख रूपये उपलब्ध करवाएगी, योजना के संपूर्ण होने के पश्चात।

यदि आप बीच में वार्षिक किश्त का भुगतान करने से चूक जाते हैं, तो आपको बकाया राशि के साथ 50 रुपये की जुर्माना राशि भी जमा करवानी होगी क्योंकि किश्त टूटने की सूरत में आपका खाता निष्क्रिय हो जाता है। यह योजना उन लोगों के लिए काफी बेहतर है, जो पैसा जमा तो करना चाहते हैं, लेकिन उनको तरीकों की जानकारी नहीं।

इस योजना का लाभ लेने के लिए आप अपने नजदीकी डाक घर में जा सकते हैं। हालांकि, वाट्सएप संदेशों को नजर अंदाज करते हुए स्वयं इस योजना की जानकारी संबंधित अधिकारी से लें, ताकि निकट भविष्य में आपको किसी मुश्किल का सामना न करना पड़े।

इसके अलावा यदि कन्या 18 वर्ष की हो जाती है तो उसको इस खाते में जमा 50 फीसद राशि विवाह तथा शिक्षा के लिए निकालने की अनुमति है। इस खाते को 21 वर्ष के बाद बंद किया जा सकता है। एक अन्य बात इसको हम एक सुरक्षित निवेश कह सकते हैं। इस योजना में आप तभी आगे बढ़ें, यदि आप निरंतर रख पाएं अन्यथा डाक विभाग में संचालित अन्य योजनायों के संदर्भ में जानकारी लेकर उनके जरिये लाभ उठाएं।

अंत में, डाक विभाग से अधिक ब्‍याज दर सीनियर सिटीजन खाते पर देता है, और उसके बाद दूसरे पायदान पर सुकन्‍या समृद्धि योजना है। इसको योजना को 80 सी के अंतर्गत ले लिया गया है अर्थात डेढ़ लाख रुपये तक के निवेश के लिए यह अच्छा विकल्प हो सकता है। यदि आपके घर में बच्ची है और आप अन्य सरकारी निवेश योजनाओं में निवेश करते हैं।

Friday, February 20, 2015

21वीं सदी, शुभ अशुभ और मोदी का सूट

रेड सिग्‍नल देखकर रूकें या न रूकें, लेकिन बिल्‍ली के रास्‍ता काटने पर आगे बढ़ने से पहले जरूर सोचते हैं। हाथ में खुजली हो तो दाएं या बाएं हाथ का ख्‍याल आता है, क्‍योंकि एक खर्च का प्रतीक है, तो दूसरा धन आने का। जब आंख फड़फड़ाने लगती है तो मन बेचैन हो जाता है, कुछ अनहोनी का अंदेशा होने लगता है।

सच में, हम 21वीं सदी में जी रहे हैं, जिसको विज्ञान की सदी कहा जाता है या सिर्फ बाहरी रूप से विज्ञान को ओढ़ रहे हैं। जिस तरह हमारे नेता सादगी, ईमानदारी का लिबास ओढ़ते हैं। हालांकि, युवा पीढ़ी उपरोक्‍त बातों को नजरअंदाज कर आगे बढ़ जाती है, मगर, मन में संदेह बना रहता है। संदेह हम को सामाजिक घटनाओं एवं संयोगवश हमारे साथ होने वाले घटनाक्रमों से मिलता है। कभी कभी संदेह पक्‍का हो जाता है तो कभी कभी एक भ्रम बनकर रह जाता है।

आज देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का विवादित लिबास 4.31 करोड़ में नीलाम हो गया। इससे एकत्र होने वाली पूंजी को गंगा की सफाई में लगाया जाएगा, कथन अनुसार, बाकी सब तो भविष्‍य की कोख में है। हम सभी जानते हैं कि नरेंद्र मोदी ने इस सूट को गणतंत्र दिवस के मुख्‍यातिथि बराक ओबामा की मेजबानी के दौरान पहना। उस दिन से विवाद और नरेंद्र मोदी साथ चल रहे हैं। 26 जनवरी के दिन नरेंद्र मोदी ने भूलवश राष्‍ट्रपति प्रणब मुखर्जी के साथ सलामी दे डाली। हालांकि, इस पर किसी की नजर न जाती, यदि मोदी के दीवाने उप राष्‍ट्रपति हामिद अंसारी को नीचा दिखाने के लिए ट्विटर पर हैशटैग न बनाते। उपराष्‍ट्रपति के बचाव में आए विभाग ने बताया कि इस दिन केवल और केवल राष्‍ट्रपति सलामी लेते हैं। इसके साथ ही, विरोधियों की तोपें नरेंद्र मोदी की तरफ तन गई।

इस घटनाक्रम में दूसरा वार मोदी सरकार पर उस समय हुआ, जब जाते जाते अमेरिकी राष्‍ट्रपति बराक ओबामा भारत को धर्म से हटकर विकास की राह पर चलने की नसीहत दे गए। बात यहां ही खत्‍म नहीं हुई, इसके साथ ही नरेंद्र मोदी का महंगा परिधान चर्चा का केंद्र बन गया, हालांकि, इसका भाव आज तक सामने नहीं आया, जबकि उपहार देने वाला मीडिया के सामने आया और उपहार देने की बात कहकर छुप गया।

इसके बाद जब दिल्‍ली विधान सभा चुनावों में बीजेपी बुरी तरह हारी तो नरेंद्र मोदी की लहर के दम तोड़ने की ख़बरें बाजार में आई और इसमें भी महंगे सूट का जिक्र भी था। चुनाव नतीजे आने के कुछ दिनों बाद नरेंद्र मोदी ने अपना महंगा सूट नीलामी के लिए सूरत रवाना कर दिया। बोली कुछ हजार से शुरू हुई, लेकिन देखते ही देखते लाखों में पहुंच गई। और अंतिम दिन अर्थात 20 फरवरी 2015 को सूट 4.31 करोड़ रूपये में नीलाम हो गया।

बीजेपी वालों से पूछो तो यह नरेंद्र मोदी का दानवीर स्‍वभाव है। यदि कांग्रेस समेत अन्‍य दलों से पूछो तो कहते हैं कि नरेंद्र मोदी अपनी गिरती अलोकप्रियता को बचाने का प्रयास कर रहे हैं। हालांकि, मुझे लगता है कि नरेंद्र मोदी इस सूट से पीछा छुड़वाना चाहते थे, क्‍योंकि जब से सूट आया है, तब से अशुभ ही अशुभ हो रहा है। हो सकता है कि उनको भी इस अशुभ का अहसास हो गया हो।

अजीब संयोग है कि आज जहां सूरत में सूट महंगे दाम पर बिक रहा था, वहीं, पटना में मांझी के समर्थन में मत देने आए बीजेपी विधायकों को निराशा का सामना करना पड़ा, क्‍योंकि जीतन राम मांझी ने टेस्‍ट देने से पहले ही अपनी हार स्‍वीकार कर ली थी, और बीजेपी को भनक तक नहीं लगने दी। उस सूट के सामने आने के बाद यह बीजेपी की दूसरी बड़ी हार कह सकते हैं।

आप सोच रहे हैं कि मेरे दिमाग में शुभ और अशुभ का ख्‍याल क्‍यों आ रहा है ? मेरे पास आपकी जिज्ञासा का भी समाधान है। पिछले वर्ष जुलाई में दिल्ली के सिविल लाइन्स क्षेत्र में 33 श्यामनाथ मार्ग पर स्थित बंगले को जल्द ही सरकारी गेस्ट हाउस में तब्दील करने की ख़बर आई थी, क्‍योंकि इस बंगले में कोई अधिकारी या राजनेता रहने के लिए तैयार नहीं हुआ। इस बारे में चर्चा है कि यह अशुभ बंगला है क्‍योंकि पूर्व मुख्‍यमंत्री मदन लाल खुराना को इस्‍तीफा देना पड़ा था, जब उनका नाम हवाला में आया और उनके उत्‍तराधिकारी साहिब सिंह वर्मा को भी अपने पद से हाथ धोना पड़ा था।

वहीं, दूसरी ओर उत्तराखंड के मुख्यमंत्री हरीश रावत भी मुख्‍यमंत्री निवास में जाने से कतरा रहे हैं। उनको डर लग रहा है कि कहीं उनका हश्र भी कुछेक पूर्व मुख्‍यमंत्रियों सा न हो जाए, जो इस निवास स्‍थान में रहकर गए हैं। फिलहाल रावत सीएम सरकारी आवास से सौ मीटर की दूरी पर स्थित बीजापुर राज्य अतिथि गृह में रह रहे हैं। इतना ही नहीं, झारखंड के नए मुख्‍यमंत्री रघुबर दास भी कांके रोड पर स्थित आधिकारिक मुख्यमंत्री आवास में स्थानांतरित नहीं होना चाहते, हालांकि, इसके आधिकारक कारण तो सामने नहीं आए, लेकिन चर्चा जरूर है कि पिछले चौदह सालों में इस घर में जितने भी मुख्‍यमंत्री रहने आए हैं, और उनमें से किसी ने भी अपना कार्यकाल पूरा नहीं किया है।

ऐसे में मेरा संदेह पक्‍का होने लगता है कि आखिर इतनी जल्‍दी नरेंद्र मोदी ने अपने चर्चित परिधान को नीलाम करने के लिए क्‍यों भेज दिया। हालांकि, वो चाहते तो इसको लंबे समय तक रख सकते थे, क्‍योंकि परिधान पर उनका नाम लिखा हुआ था और भारतीय इतिहास में पहली बार हुआ था। सबसे दिलचस्‍प बात तो यह थी कि नरेंद्र मोदी ने यह सूट पहनकर महाशक्‍ति कहे जाने वाले अमेरिका के राष्‍ट्रपति बराक ओबामा के साथ वक्‍त बिताया। बराक ओबामा, उस व्‍हाइट हाउस से आते हैं, जिसको पृष्‍ठभूमि में रखकर कभी नरेंद्र मोदी ने अपने फोटो उतरवाया करते थे।

वैसे आम घरों में ऐसा होता है, जब किसी चीज के आने से समस्‍याएं बढ़ने लगें तो उस चीज से जल्‍द से जल्‍द निजात पा ली जाती है। हालांकि, घटनाएं संयोगवश हो सकती हैं, मगर, संदेह कभी कभी पक्‍का तो कभी कभी केवल भ्रम तक सीमित रह जाता है। यदि संदेह पक्‍का हो जाए तो अशुभ चीज घर से बाहर जाती है, और यदि संदेह केवल भ्रम बना रहे तो चीज पर विचार चलता रहता है, अंतरमन में कहीं न कहीं।

कुछ भी हो, नरेंद्र मोदी ने साबित कर दिया है कि उनके नाम में दम है, तभी तो कुछ हजार का सूट करोड़ों रुपये का हो गया। यह भी अपने आप में एक शक्‍ति प्रदर्शन है, हालांकि, हम इसको चैरिटी के रूप में देखना चाहिए। वैसे, इस सूट की नीलामी पर तंज कसने वाले कह रहे हैं, ''एक सूट के चक्‍कर में दिल्‍ली साफ हो गई, तो गंगा क्‍या चीज है।''

मगर, मेरे संदेह का जवाब भविष्‍य की कोख में छुपा है। यदि इस सूट को खरीदने वाले ने इसको गले से लगाए रखा तो मेरा संदेह भ्रम स्‍थिति में पड़ा रहेगा, सरकारी कार्यों में पड़ी आम आदमी की फाइलों की तरह, यदि उसने भी नरेंद्र मोदी की तरह सूट से जल्‍द निजात पाने की ठान ली तो मेरा संदेह पक्‍का हो जाएगा।

अंत में
देश प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी स्‍वयं को नसीब वाला कहते हैं, जो मुझे शुभ अशुभ के बारे में भी सोचने पर मजबूर करता है, क्‍योंकि जो नसीब में विश्‍वास करता है, वो शुभ अशुभ में भी विश्‍वास करता होगा। 

Sunday, February 15, 2015

बदले बदले हैं 'साहेब'

दिल्‍ली विधान सभा चुनाव के नतीजों के बाद बदले बदले हैं 'साहेब'। कोई शक! यदि आपको शक है, तो सच में मेरे पास शक का कोई इलाज नहीं है। हालांकि, बदले बदले हैं 'साहेब' जुमले को सही साबित करने के लिए परिस्‍थितियां सबूत के रूप में रख सकता हूं। और आप अपर्याप्‍त सबूत कहकर साहेब का बचाव कर सकते हैं क्‍योंकि आपके पास भी पक्ष रखने का अधिकार है। और आपके अधिकार सुरक्षित हैं।

सबसे पहले जम्‍मू कश्‍मीर की बात करते हैं। जम्‍मू कश्‍मीर राज्‍य लगभग पिछले डेढ़ महीने से नई सरकार बनने की राह देख रहा है। हालांकि, अब जम्‍मू कश्‍मीर की जनता का इंतजार खत्‍म होने वाला है। भारतीय जनता पार्टी अपनी मांगों को ठंडे बस्‍ते में डालने जा रही है। ऐसा इसलिए हो रहा है क्‍योंकि बीजेपी दिल्‍ली चुनावों के बाद जम्‍मू कश्‍मीर में रिस्‍क लेने की हिम्‍मत नहीं जुटा पा रही है। ऐसे में समझौता नीति, सबसे उत्‍तम नीति। हालांकि, दिल्‍ली चुनावों से पहले भाजपा अपनी मांगों पर अडिंग थी। मीडिया के अनुसार, मुख्‍यमंत्री बीजेपी का, आर्म्ड फोर्सेज स्पेशल पावर एक्ट नहीं हटेगा, धारा 370 हटाना इत्‍यादि बीजेपी की मुख्‍य मांगें थीं।

अब बात महाराष्‍ट्र की। जहां सरकार भारतीय जनता पार्टी की है। मगर, दिलचस्‍प बात तो यह है कि दिल्‍ली विधान सभा चुनावों के बाद शिवसेना के तेवर काफी तीखे हुए हैं और शिव सेना निरंतर नरेंद्र मोदी पर हमला बोल रही है। माना जाता है कि शिव सेना एलके अडवाणी की पक्षधर रही है। आपको बता देते हैं कि महाराष्‍ट्र में बीजेपी ने सरकार अल्‍पमत में बनाई है, जो वो दिल्‍ली में कर सकती थी, लेकिन अहं के कारण नहीं किया। एक अन्‍य बात, जब दिल्‍ली विधान सभा की शानदार जीत के बाद अरविंद केजरीवाल रामलीला मैदान में शपथ ग्रहण कर रहे थे, तो नरेंद्र मोदी महाराष्‍ट्र के दौरे पर थे, जहां पर उन्‍होंने एनसीपी प्रमुख शरद पावर के साथ भोज भी किया।

एनसीपी, जो महाराष्‍ट्र विधान सभा चुनावों में नरेंद्र मोदी के लिए नेचुरल करप्‍ट पार्टी थी, अब नेचुरल कंपनीयन पार्टी बन गई है, क्‍योंकि शिव सेना के पीछे हटते ही, सहारा लेने के लिए एनसीपी की जरूरत पड़ सकती है। याद रहे कि महाराष्‍ट्र में कांग्रेस की सरकार यदि करप्‍ट थी, तो उसकी सहयोगी पार्टी एनसीपी पूर्ण इमानदार तो कभी नहीं हो सकती। इसलिए शरद पावर से मिलना नरेंद्र मोदी की उदारता नहीं, बल्‍कि मजबूरी है। नरेंद्र मोदी अच्‍छी तरह जानते हैं कि राजनीति में न तो कोई सगा होता है और न बेगाना। मजबूरी में सब अपने होते हैं, अच्‍छे दिनों में सब बेगाने।

चलो बिहार, अबकी बार। दिल्‍ली विधान सभा चुनावों से पहले बिहार में राजनीतिक संकट उभरकर सामने आया। इसको लोकतंत्र का संहार कह सकते हैं क्‍योंकि एक साजिश के तहत मुख्‍यमंत्री को हाइजैक कर उसकी पूरी पार्टी को ध्‍वस्‍त करना लोकतंत्र में शोभा नहीं देता। बिहार के मुख्‍यमंत्री जीतन राम मांझी ने अपनी ही पार्टी के खिलाफ मोर्चा खोला तो आलम कुछ ऐसा बना कि बिहार में विपक्ष अर्थात बीजेपी पक्ष अर्थात जीतन राम मांझी को बचाने के लिए समर्थन देने की बात कहने लगा। हालांकि, पक्ष वाली पार्टी अर्थात जेडीयू अपने मुख्‍यमंत्री को बरखास्‍त के लिए निवेदन कर चुकी थी।

हालांकि, दिल्‍ली विधान सभा चुनाव के नतीजों के बाद तस्‍वीर बदल चुकी है। बीजेपी के बड़े नेता कहने लगे हैं, वो मांझी को समर्थन नहीं देंगे। और 20 फरवरी के दिन मांझी की अग्‍निपरीक्षा है। उधर, मांझी भी सुर बदलते हुए कहते हैं कि यदि बहुमत साबित न कर पाया तो पद से इस्‍तीफा दे दूंगा। यदि बहुमत साबित न कर पाए तो हालत किरण बेदी जैसी होगी, न समाज सेवी बची, न बीजेपी की सदस्‍य बन पाई। पिछले दिनों बीजेपी ने दिल्‍ली हार को लेकर बैठक बुलाई, मगर, किरण बेदी को नहीं बुलाया गया, क्‍योंकि वे बीजेपी की पदाधिकारी नहीं है। जेडीयू का आरोप है कि मांझी का रिमोट बीजेपी के हाथ में है। इसमें दो राय होनी भी नहीं चाहिए, क्‍योंकि जब जेडीयू अपने विधायकों के साथ बैठक में व्‍यस्‍त थी तो मांझी अपने समर्थकों के साथ दिल्‍ली में नरेंद्र मोदी से मुलाकात कर रहे थे।

बीजेपी ने पत्‍ता को बहुत बेहतरीन खेला था, मगर, नीतीश कुमार की तरह मोहरे के रूप में जीतन राम मांझी को चुनकर बीजेपी ने गलती कर दी है। अब बीजेपी को भी भीतर ही भीतर इस बात का डर लग रहा है कि कहीं किरण बेदी की तरह जीतन मांझी के रूप में खेला गया पत्‍ता उलटा न पड़ जाए। इसलिए बीजेपी अब इस खेल से बाहर निकलने का प्रयास कर रही है। यदि बीजेपी अब जीतन राम मांझी से पल्‍लू झटकेगी तो जीतन राम मांझी बीजेपी पर कमिशन देने का आरोप लगा सकते हैं, जो पूरी की पूरी गेम को नीतीश के पाले में पहुंचा देंगे। सफगोई के शौकीन हैं, आखिर हमारे जीतन राम मांझी।

इतना ही नहीं, अब बीजेपी पंजाब को लेकर भी संजीदा होगी, क्‍योंकि दिल्‍ली की जीत के बाद आम आदमी पार्टी भले ही एक साल तक कोई चुनाव न लड़ने की बात कह रही हो, मगर, उसके सांसद भगवंत मान एवं आम आदमी पार्टी कार्यकर्ताओं की नजर पंजाब विधान सभा चुनावों पर टिक चुकी है।

अंत में.....
साहेब क्रिकेट पर ट्वीट कर रहे हैं। क्रिकेट खेलने के लिए टीम विदेश गई, तो उसके लिए पड़ोसी राष्‍ट्र को फोन कर बधाई दे रहे हैं। मगर, सार्क समिट में अहं किसी बात का था। जब आमने सामने थे तो नजर मिलाना भी गुनाह समझ लिया। हमने प्रधानमंत्री चुनना है, चौकीदार नहीं, जो पड़ोसी राष्‍ट्र को फोन कर बताए कि उनकी टीम बाहर खेलने के लिए गई है। क्रिकेट के अलावा हमारे पर भी बहुत काम हैं, और उनके पास भी। संबंध मजबूत खुशी के मौके पर संवेदनाएं प्रकट करने से नहीं, बल्‍कि दुख की घड़ी में साथ खड़ने से मजबूत होते हैं।

साहेब का फोन गया, उसके कुछ घंटों बाद मस्‍जिद के बाहर धमाका हुआ, इसमें बहुत सारी जिंदगियां चली गई, क्‍या अफसोस प्रकट करने के लिए फोन किया। नहीं, ना, क्‍योंकि उसको कवरेज कहां मिलता है।

Thursday, February 12, 2015

सदमे में 'पीएम'

दिल्ली विधान सभा चुनावों में शानदार प्रदर्शन न कर पाने का सदमा बिल्कुल नहीं लगा, लेकिन रोजकोट में एक मंदिर बनने की ख़बर सुनकर पीएम मोदी जी का मन दुख से भर गया, क्योंकि इस मंदिर का संबंध उनसे है। उन्होंने ट्विट कर दुखद प्रकट किया एवं कहा, इंसानों का मंदिर बनाने की भारत में संस्कृति नहीं है।

मैं सहमत हूं, मगर, एक सवाल पूछना चाहता हूं कि महात्मा गांधी का मंदिर, जो गांधीनगर में आप ने करोड़ों रुपये खर्च कर बनाया है, उस पर भी कुछ कहना चाहेंगे। इसके अलावा जो करोड़ों रुपये खर्च कर सरदार पटेल की मूर्ति का निर्माण करने की सोच रहे हैं, उस पर भी कुछ प्रकाश डालेंगे।

मुझे पता है कि आप सदमे में हैं, सदमे का कारण भी सब जानते हैं। किरण बेदी के आंसू, संसद पटल पर आपके आंसू, पूरा भारत समझता है एवं जानता है। अब सुर्खियां बटोरने का समय नहीं, प्रिय प्रधानमंत्री जी, अब कार्य करने का समय है।

बिहार में हो रहा लोकतंत्र का चीर हरण सब देख रहे हैं। पहली बार देख रहा हूं कि राज्यपाल एक बहुमत हासिल पार्टी को नजरअंदाज कर एक विधायक को महत्व दे रहा है। जब जेडीयू मांझी को निकाल चुकी है और अब उनकी एक विधायक की हैसियत है तो भाजपा उसको समर्थन किस आधार पर देगी।

लोकतंत्र का चीर हरण करना रोकिए, सुर्खियां सदमे तो चलते रहेंगे। मंदिर आपके सूट, विदेशी यात्रा खर्च,  चुनाव प्रचार से महंगा न होगा।

अंत में...
यह मंदिर 2006 से बना हुआ था। इसमें अभी तस्वीर की जगह प्रतिमा स्थापित की जानी थी। आप से ज्यादा मैं हैरत में हूं, कि इतने साल बाद आपको सदमा लगा।

Monday, February 9, 2015

अरुण जेटली के नाम खुला पत्र

नमस्‍कार, अरुण जेटली जी। आप हमारे देश के वित्‍त मंत्री हैं। आप एक अच्‍छे नेता भी हैं। आप कई दशकों से राजनीति में हैं। यकीनन, आप देश के प्रधानमंत्री बनने के हकदार थे। लेकिन, आपका नसीब काम नहीं कर सका, और नसीबवाले नरेंद्र मोदी जी प्रधानमंत्री बन गए। चलो, काम कोई छोटा बड़ा नहीं होता, किसी महान व्‍यक्‍ति ने कहा है। जो आपके हिस्‍से आया, उसको पूर्ण जिम्‍मेदारी से निभाएं।

मैं आपको पत्र बजट के संबंध में नहीं लिख रहा। मैं आप से किसी प्रकार की सुविधा या छूट देने की मांग करने वाला नहीं हूं क्‍योंकि नसीब वाले प्रधानमंत्री पहले ही कह चुके हैं, देश को कड़वी दवा के लिए तैयार हो जाना चाहिए। हमारा क्‍या है, जो वादे पूरे होंगे, उनको लेकर खुशी मनाएंगे, जो बाकी रहेंगे, उनको राजनीतिक जुमला समझकर भूल जाएंगे। हां, अच्‍छे दिन आने वाले हैं, राजनीतिक जुमला बनकर न रह जाए, इसकी दुआ करें।

हां, मैं आपको पत्र क्‍यों लिख रहा हूं ? मैंने पिछले दिनों आपकी एक प्रेस वार्ता देखी। मुझे समझ नहीं आया कि उस प्रेस वार्ता को बुलाने का मकसद क्‍या था ? जी हां, दिल्‍ली चुनाव से एक दिन पहले। हां, वो वाली, जिसमें आप ने आम आदमी पार्टी को अराजकतावादी कहा। यह बात तो दिल्‍ली चुनावों से पूर्व एक रैली में देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी भी कह चुके थे, फिर आपको विशेष प्रेस वार्ता बुलाकर कहने की जरूरत समझ नहीं आई। हालांकि, आपका उतरा हुआ चेहरा मन में चल रहे अंतर्द्वंद्व को व्‍यक्‍त कर रहा था। यकीनन, आप ने वो प्रेस वार्ता किसी दबाव में बुलाई।

चलो, जो भी हो, लेकिन मैं आपको याद दिलाना चाहता हूं, जेपी आंदोलन। भ्रष्‍टाचार के खिलाफ आपका युवा नेतृत्‍व। कुछ याद आया। यदि याद आया तो पूछना चाहता हूं कि आज वो भ्रष्‍टाचार के खिलाफ खौलने वाला खून ठंड क्‍यों पड़ गया ? आज आपकी डगर पर कुछ युवा चल रहे हैं, और आपको उनमें अराजकतावाद दिखाई कैसे पड़ गया ? आप ने बाबा रामदेव की तुलना भी जेपी से कर डाली थी, क्‍योंकि बाबा रामदेव ने काले धन के खिलाफ सरकार विरोधी लहर पैदा की, हालांकि, उनके कुर्ते सलवार पर आज भी चुटकले बनते हैं। बाबा रामदेव में आपको अराजकता नजर नहीं आई। इंदिरा गांधी के खिलाफ चलाए अभियानों में भारतीय जनता पार्टी के नेताओं की भूमिका में आपको अराजकतावाद नजर नहीं आया।

मैं समझता हूं, आपकी मजबूरी। आप अमृतसर से हारे हुए उम्‍मीदवार हैं और हारे हुए व्‍यक्‍ति की स्‍थिति को समझना अधिक कठिन नहीं है। उस हार ने आपको कमजोर कर दिया। अब नसीब वाले की कृपा से मंत्रीमंडल में हैं। अब उनके बने हुए रास्‍ते पर आपको चलना पड़ेगा। आपका मन माने या न माने। आज इंडियन एक्‍सप्रेस समाचार पत्र में प्रकाशित हुए कुछ विदेशी बैंक खाता धारकों के नाम पर आप ने कहा, कार्रवाई के लिए सबूत चाहिए। मैं आपकी बात से सहमत हूं, लेकिन, मैं आपको कुछ दिन पीछे लेकर जाना चाहता हूं। जब अवाम नामक एक जिन्‍न बोतल से बाहर निकला, और उसने आम आदमी पार्टी पर फर्जी चंदा लेने के आरोप जड़ दिए। और आप ने मीडिया से बातचीत करते हुए आम आदमी पार्टी पर निशाना साध दिया। हालांकि, आप का व्‍यवहार उस तरह का था, जिस तरह ग्रामीण संस्‍कारी महिला को सन्‍नी लियोने कहे, बहनजी आपका पल्‍लू सरक रहा है। आप ने अरविंद केजरीवाल से पूछ डाला, यदि वो आईआरएस अधिकारी होते तो क्‍या ? मैं हैरत में पड़ गया। मुझे लगा, जैसे जज पूछ रहा हो, चोर से यदि तुम जज होते तो क्‍या फैसला सुनाते ? आज आप उसी तरह के मामले में कार्रवाई के लिए सबूत मांग रहे हैं, उस दिन तो आप ने आंख झपकते मीडिया में आम आदमी पर हमला बोल दिया था। आज अम्‍बानी परिवार का नाम सबसे ऊपर था, तो आप कैसे बोलते ? हां, मैं समझ सकता हूं।

माननीय वित्‍त मंत्री जी आप ने वर्ष 2013 में यूपीए 2 को अध्‍यादेश लाने पर खूब खरी खोटी सुनाई थी। उन दिनों पूरा देश सुन रहा था। आप ने किस तरह पानी पी पी कर अध्‍यादेश लाने पर यूपीए 2 को कोसा था। मगर, आप के मुंह से एक शब्‍द तक नहीं निकला, जब आपकी सरकार ने सत्‍ता संभालते ही धड़ाधड़ एक के बाद एक अध्‍यादेश पारित कर दिए। हालांकि, गुप्‍त सूत्रों से ख़बर थी कि कुछ मंत्री नरेंद्र मोदी के इस कदम से खुश नहीं हैं। हो सकता है, उनमें आपका नाम शामिल हो या न भी हो। मगर, आप ने खुलकर कुछ नहीं कहा।

हो सकता है कि कुछ साल बीतने के बाद आपकी भी किताब बाजार में आए। उसमें कुछ धमाकेदार खुलासे हों। मीडिया टीआरपी बटोर लेगा। प्रकाशक पैसे कमा लेगा, लेकिन मेरी नजर में उस समय सनसनीखेज खुलासे करती किताब केवल समोसे रखकर खाने के काम आ सकती है, इससे अधिक कुछ नहीं। क्‍योंकि सांप के निकल जाने के बाद लीक पीटने का कोई फायदा नहीं होता। सचिन तेंदुलकर ने चैप्‍पल के खिलाफ कुछ खुलासे किए, मगर, उन खुलासों से क्‍या होने वाला है ? मनमोहन सिंह के खिलाफ बहुत कुछ लिखा गया ? इससे क्‍या फर्क पड़ता है ? हम अतीत को कभी बदल नहीं सकते, मगर, सुनहरा भविष्‍य जरूर गढ़ सकते हैं।

अंत में इतना कहूंगा, घुट घुट कर सोहरत की जिन्‍दगी जीने से बेहतर है, स्‍वतंत्र फकीर की जिन्‍दगी।

जय हिंद

Thursday, February 5, 2015

मैं नरेंद्र मोदी का विरोधी नहीं हूं, लेकिन...

मैं नरेंद्र मोदी का विरोधी नहीं हूं, लेकिन उनके पैदा किए जा रहे अति आशावाद का विरोधी हूं। शायद, मुझे इस तरह के स्‍पष्‍टीकरण की जरूरत भी नहीं थी। लेकिन बात शुरू करने के लिए स्‍पष्‍टीकरण अधिक बेहतर चुनाव लगा। हां, मैं नरेंद्र मोदी के अतिआशवाद का विरोधी हूं। और हमारे बुजुर्ग भी कहते हैं, अति नुकसानदेह होती है, वो फिर किसी भी मामले में क्‍यों न हो।

अति आशावाद, अति निराशावाद को जन्‍म देता है। कुछ समय पहले तक बॉलीवुड में फिल्‍में हिट या फ्लॉप होती थी। मगर, फ्लॉप फिल्‍मों के लिए एक नया शब्‍द बाजार में आया, सुपर फ्लॉप। इस शब्‍द का जन्‍म अति आशावाद के कारण हुआ। फिल्‍मों का प्रचार बड़े स्‍तर पर किया जाने लगा। फिल्‍म के बड़े स्‍तर पर होते प्रचार के कारण लोगों के भीतर अच्‍छी फिल्‍म होने का आशावाद पैदा होता है। लेकिन, फिल्‍म दूसरे ही दिन सिनेमा हाल की खिड़की पर दम तोड़ देती है। इस मामले में संजय लीला भंसाली की सांवरिया, रामगोपाल वर्मा की आग और यशराज बैनर्स की टश्‍न, धूम 3 सबसे बड़े उदाहरण हैं।

चुनावी रैलियों में जो नरेंद्र मोदी ने बड़े बड़े सीना ठोककर दावे किए थे, अब वो तेजी के साथ फुस हो रहे हैं। पिछले आठ महीनों में नरेंद्र मोदी की अगुवाई सरकार ने ऐसा कोई कार्य नहीं किया, जो उनके दावों का समर्थन करता हो। अब धीरे धीरे आशावाद निराशावाद में बदल रहा है।

सबसे बड़ी हैरानीजनक बात तो यह है कि लोक सभा चुनावों में जबरदस्‍त प्रदर्शन करने वाली भारतीय जनता पार्टी को दिल्‍ली में संघर्ष करना पड़ रहा है। दिल्‍ली विधान सभा चुनावों में भारतीय जनता पार्टी की बौखलाहट के बहुत सारे उदाहरण देखने को मिले। मगर, सबसे बड़ी और दिलचस्‍प बात नरेंद्र मोदी ने अपनी अंतिम रैली में कही, ''बाजारू सर्वे।''

नरेंद्र मोदी भूल गए, जब लोक सभा चुनावों में भारतीय जनता पार्टी 272 प्‍लस का लक्ष्‍य लेकर चल रही थी तो इस मीडिया ने उनके पक्ष में बहुत सारे सर्वे दिखाए थे, और इन्‍हीं सर्वों की वजह से ही भारतीय जनता पार्टी अपने निर्धारित लक्ष्‍य तक पहुंची। मगर, आज नरेंद्र मोदी उन्‍हीं सर्वों पर उंगली उठा रहे हैं।

इससे भी हैरानीजनक बात तो यह है कि नरेंद्र मोदी ने अपनी अंतिम रैली में लोगों को चुनावी सर्वों पर विश्‍वास न करने की अपील की और उसके कुछ घंटों पश्‍चात कुछ नए चुनावी सर्वे सामने आए, जो भारतीय जनता पार्टी को जीतते हुए दिखा रहे थे। जिनको नरेंद्र मोदी के विरोधियों ने दूधारू सर्वों का नाम दिया। इस तरह नरेंद्र मोदी की अपील उनके अन्‍य प्रयोगों ( किरण बेदी, विज्ञापन धमाका, अवाम का खुलासा) की तरह उन पर भारी पड़ती नजर आ रही है।

एक अन्‍य बात धीरे धीरे नरेंद्र मोदी अपनी विश्‍वसनीयता खोते जा रहे हैं क्‍योंकि पिछले आठ महीनों में उनके यू टर्न अरविंद केजरीवाल को भी पीछे छोड़ रहे हैं। नरेंद्र मोदी निरंतर अपने विरोधियों को बोलने का मौका दे रहे हैं। इसमें दो राय नहीं है कि दिल्‍ली में भारतीय जनता पार्टी की कम होती लोकप्रियता के लिए नरेंद्र मोदी जिम्‍मेदार हैं।

आग में घी का काम उनके करीबी एवं भारतीय जनता पार्टी के प्रमुख अमित शाह ने यह कह कर डाल दिया कि हर भारतीय के हिस्‍से 15-15 लाख रुपए वाली बात केवल राजनीतिक जुमला था। इस तरह भारतीय जनता पार्टी के नेता नरेंद्र मोदी की कितनी बातों को राजनीतिक जुमला कहकर बचाव करते रहेंगे। आजकल न्‍यूज चैनलों पर भारतीय जनता पार्टी के प्रवक्‍ता उतने आक्रामक एवं उत्‍साह भरपूर नजर नहीं आते, जितना लोक सभा चुनावों से पहले आते थे क्‍योंकि उनकी पार्टी को सत्‍ता में आए लगभग तीन तिमाहियां गुजर चुकी हैं। अभी तक उनके पास कुछ ऐसा नहीं है, जो उनका बचाव कर सके।

पैट्रोलियम उत्‍पादों के दाम गिर रहे हैं, मगर, सामने कच्‍चे तेल के भाव भी गिर रहे हैं। इसका श्रेय भी नरेंद्र मोदी लेने से नहीं चूके, उन्‍होंने स्‍वयं को नसीब वाला कह डाला। मगर, सवाल तो यह है कि भारत में पैट्रोलियम उत्‍पादों के उतने भाव गिरे, जितने गिरने चाहिए थे। ऐसे बहुत सारे सवाल हैं, जिनका जवाब भारतीय जनता पार्टी के पास नहीं है।

अंत में
भारतीय जनता पार्टी दिल्‍ली विधान सभा चुनावों में अपनी हार को नरेंद्र मोदी के दामन से अलग कर रही है। हालांकि, अख़बार, रेडियो एवं चैनल तो बोल रहे हैं कि चलो चलें मोदी के साथ। इसका एक अन्‍य कारण भी है क्‍योंकि यदि इसको नरेंद्र मोदी से जोड़ दिया जाए, तो अन्‍य राज्‍यों में, जहां चुनाव होने वाले हैं, वहां भारतीय जनता पार्टी की बढ़ती लोकप्रियता को बड़ा झटका लग सकता है।

Friday, January 30, 2015

आम आदमी पार्टी से सवाल पूछने का हक किसे और क्यों ?

भारतीय जनता पार्टी की ओर से शुक्रवार को एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में आम आदमी पार्टी के संयोजक अरविंद केजरीवाल के लिए 5 सवालों की दूसरी किश्त पेश की। इस किश्‍त को केंद्रीय वाणिज्य मंत्री निर्मला सीतारमन ने पेश किया। सबसे दिलचस्‍प बात तो यह है कि भाजपा 5 फरवरी तक हर रोज अरविंद केजरीवाल से 5 नए सवाल पूछेगी। लेकिन, सवाल तो यह है कि आखिर भारतीय जनता पार्टी किस हक से सवाल पूछ रही है ? क्‍या भारतीय जनता पार्टी को सवाल पूछने का हक है ? सबसे हैरानीजनक बात तो यह है कि इसकी दूसरी किश्‍त केंद्रीय मंत्री द्वारा जारी की गई है।  

यह तरीका भी सराहनीय नहीं है। यह केवल सुर्खियों में बने रहने का ढंग है। लोगों का ध्‍यान भटकाने का तरीका है। एक राष्ट्रीय पार्टी जन आंदोलन की कोख से पिछले साल जन्मीं पार्टी से कितने बचकाने सवाल पूछ रही है। बचकानेपन तो मीडिया भी कर रहा है, जो बीजेपी के बेतुके बयानों को महत्व दे रहा है।

बीजेपी का यह कदम सराहनीय कम मद्दा अधिक लगता है, विशेषकर उस समय जब आम आदमी पार्टी के कार्यकर्ता गली गली कूचे कूचे नुक्कड़ नुक्कड़ वोट मांग रहे हैं, जनता से सीधा संवाद कर रहे हैं। आम आदमी पार्टी को जनादेश भारतीय जनता पार्टी या कांग्रेस ने नहीं दिया, बल्‍कि जनता ने दिया है, तो सवाल पूछने का हक भी जनता को है, और आम आदमी पार्टी के कार्यकर्ता जनता के बीच घूम रहे हैं।

एक अन्य सवाल, जब अरविंद केजरीवाल ने भारतीय जनता पार्टी के सामने खुली बहस का विकल्‍प पहले से ही रख दिया है तो बीजेपी सुरक्षित कोने में खड़ी होकर क्यों खेल रही है ? क्या भारतीय जनता पार्टी के पास मुद्दे नहीं ? क्या भारतीय जनता पार्टी के पास आम आदमी पार्टी की चुनौती का जवाब नहीं ? भारतीय जनता पार्टी इतने बचकाने सवाल पूछ रही है, जिनका जनता से दूर दूर तक सरोकार नहीं है।

क्या बच्चों की कसम खाकर पलटना राष्ट्रीय गुनाह है ? यदि गुनाह है तो पिछले साढ़े छह दशक के दौरान जो गुनाह राजनेताओं ने किए हैं, उनका जवाब तो पहले बीजेपी एवं कांग्रेस आम आदमी पार्टी के सामने ना सही, लेकिन जनता के सामने तो रखे। इसका तो सीधा सीधा मतलब तो यह हुआ कि आम आदमी पार्टी नेता अरविंद केजरीवाल की जुबां लोहे पर लकीर, और नेताओं की जुबां पानी पर, और पानी पर खींची लकीर पर सवाल उठाना उचित नहीं है।

मैं यह नहीं कहता भारतीय जनता पार्टी या कांग्रेस पार्टी को अरविंद केजरीवाल से सवाल नहीं करने चाहिए। मैं कहता हूं कि दोनों पार्टियों को मिलकर आम आदमी पार्टी को घेरना चाहिए। मगर, इतने बचकाने सवालों से नहीं। दोनों पार्टियां ठोस मुद्दों पर बात करें। यदि अरविंद केजरीवाल की सामान्‍य बातों पर ही सवाल पूछने हैं, तो कांग्रेस, बीजेपी अपने नेता के चुनावी बयानों का री टेलीकास्ट करे। अपने गिरेबां में पहले झांके। इससे पहले दिल्‍ली भारतीय जनता पार्टी एवं कांग्रेस दोनों के पास रही है। अरविंद केजरीवाल को तो केवल 49 दिन के लिए दिल्‍ली मिली और उसके लिए अरविंद केजरीवाल को लोक सभा चुनावों में दोनों पार्टियां बहुत कुछ पूछ चुकी हैं। जो अभी पूछ रही हैं, वो सोशल मीडिया पर बैठे किसी पार्टी के भक्‍तों के लिए तो ठीक है, लेकिन राष्‍ट्रीय स्‍तर के नेताओं के लिए वो बचकाने सवालों से अधिक कुछ नहीं है।

एक और बात आम आदमी पार्टी से जवाब मांगने का हक केवल और केवल जनता का है। सबसे बड़ी बात तो यह है कि आज कल दिल्‍ली में सबसे अधिक भीड़ अरविंद केजरीवाल की रैलियों में हो रही है। भारतीय जनता पार्टी की किरण बेदी भी भीड़ जुटाने में चूक रही हैं। कांग्रेस का हाल तो जग जाहिर है। आज जो कांग्रेस की स्‍थिति है, पिछले दिल्‍ली विधान सभा चुनावों में वो आम आदमी पार्टी की थी, केवल मीडिया की नजर में। आम आदमी पार्टी को मिलने जन समर्थन ने बड़े बड़े दिग्‍गजों को सोचने पर मजबूर कर दिया।

यदि अरविंद केजरीवाल भगोड़ा है। यदि अरविंद केजरीवाल पलटीमार है। तो भारतीय जनता पार्टी को घबराने की जरूरत नहीं थी। यदि अरविंद केजरीवाल दिल्‍ली का भरोसा खो चुका था, तो भारतीय जनता पार्टी को किरण बेदी क्‍यों ? यदि जनता को अरविंद केजरीवाल एंड पार्टी पर विश्वास होगा तो वो आम आदमी को वोट करेगी यदि नहीं होगा तो नहीं करेगी।

मगर, बीजेपी किस अधिकार से सवाल कर रही है ? क्या मोदी सरकार ने सौ दिन में काला धन वापस लाने के वादे को पूरा कर दिया ? क्या जम्मू कश्मीर में बाप बेटी या बाप बेटे की पार्टी के साथ मिलकर मोदी की भाजपा सरकार नहीं बनाएगी ? क्या सुभाष चंद्र बोस से जुड़े दस्तावेज सार्वजनिक कर दिए गए हैं ? क्या नशा विरोधी मुहिम को शुरू करने से पहले पंजाब की मौजूदा सरकार से नाता तोड़ लिया गया है ? यह सवाल जनता से जुड़े हैं न कि पारिवारिक सदस्यों की कसम से। शायद यह ही कारण है कि भारतीय जनता पार्टी अरविंद केजरीवाल की सार्वजनिक बहस की चुनौती को नजरंअदाज करते हुए एक तरफ सवाल दागने पर जोर दे रही है।

अंत में...

दिल्ली जीतने के लिए 250 रैलियां, 120 सांसदों की डियूटी, 13 राज्यों के कार्यकर्ता और दर्जनों मंत्रियों की तैनाती और प्रधानमंत्री की 4 रैलियां। बीजेपी में बेचैनी और अरविंद केजरीवाल के जनाधार का सबूत हैं। अब अगर आम आदमी पार्टी हार भी गई तो अधिक परेशानी की बात नहीं होगी। बीजेपी की तैयारी को देखकर विश्व विजेता बनने निकले सिकन्दर की याद आ गई जो पोरस से जीत कर भी अंत हार गया और वापस लौट गया। भारत को फतह नहीं कर पाया।

Tuesday, January 27, 2015

जाते जाते ओबामा भावुक कर गए

अमेरिका के राष्‍ट्रपति बराक हुसैन ओबामा को मेरा नमस्‍कार। मुझे ख़बर मिली कि आज आप साउदी अरब को निकल चुके हैं। यदि आप रूकते भी तो मैं कौन सा आने वाला था क्‍योंकि उसके लिए भारतीय जनता पार्टी की सदस्‍यता लेनी पड़ती, हालांकि, यह केवल मिसेड कॉल से मिल जाती है। मगर, मिसेड कॉल वाली सदस्‍यता किसी काम की नहीं क्‍योंकि बीजेपी केवल जनाधार वाले या कांग्रेसी नेताओं को पैराशूट से उतारती है। मैं इन दोनों में शामिल नहीं हूं। आपको हंसी आ रही है। मैं चिंतित हो रहा था, कहीं आपको भी दिल्‍ली विधान सभा चुनावों की समाप्‍ति तक भारत में न रोक लिया जाए। आप से अधिक चिंता उन कुत्‍तों की थी, जो आपके सुरक्षा दस्‍तों के साथ आए थे, कहीं लव जिहाद में न पड़ जाएं क्‍योंकि मीडियाई ख़बरों में एक देसी का कुत्‍ता चल रहा था, और आपके विदेशी कुत्‍ते लापता थे। सुना था कि आपकी सुरक्षा व्‍यवस्‍था इतनी कड़ी है कि उसमें परिंदा भी पर नहीं मार सकता, चल छोड़ो, यह तो आम कुत्‍ता था, परिंदा थोड़ी ना।

अतिथि देवो भव: अर्थात "अतिथि भगवान होता है"। शायद, भारत से वापिस लौटते हुए आपको इस बात का एहसास हो गया था। इसलिए आपने अंत में जो 'धार्मिक आधार पर नहीं बंटना चाहिए देश' नसीहत दी, वो बड़ी सराहनीय थी। मगर मेरे मन में एक सवाल उठ रहा है कि यह बात आप नरेंद्र मोदी को अकेले में भी कह सकते थे। कहीं यह आइडिया भी उनका तो नहीं था, क्‍योंकि आजकल उनकी कोई सुनता ही नहीं। उनकी एक चेतावनी आती है तो सामने से विपरीत में तीन बयान आ जाते हैं। मानो, महाभारत चल रहा हो। आप एक शक्‍तिशाली तीर छोड़ेंगे तो सामने बचाव में तीन चार तीर एक साथ छोड़ दिए जाएंगे। यह खूबसूरत सुर्खियां बटोरने वाला युद्ध आपके आने और दिल्‍ली विधान सभा चुनाव की घोषणा से पहले बराबरी पर चल रहा था। हमारा मीडिया महाभारत के संजय की भूमिका निभा रहा था। हालांकि, संजय दूरदर्शन की तरह केवल सूचना प्रदान करता था। मगर, आधुनिक संजय मिर्च मसाला डालकर एक टीआरपी वाली चटाकेदार डिश परोसता है, ताकि कई दिनों तक सी सी की आवाज आती रहे।

अब आप तो अपना एयर फोर्स वन लेकर निकल लिए, अब हम ही जानते हैं, आपके रचे आभा मंडल से बाहर आने के लिए हमारे आधुनिक संजय को कितना समय लगेगा। लहसुन प्‍याज की तरह अब आपको हर सब्‍जी में परोसा जाएगा। आपको यकीन न हो तो ऑनलाइन आप हमारे आधुनिक संजयों का प्रसारण सुन एवं देख सकते हैं, क्‍योंकि आप धृतराष्‍ट्र की तरह अंधे थोड़ी न हैं। आपको हंसी आएगी। आपको हमने दिल्‍ली चुनावों में भी घसीट लिया। भारतीय जनता पार्टी की मुख्‍यमंत्री पद की उम्‍मीदवार किरण बेदी ने कहा, बराक ओबामा ऐसे न थोड़ी आते मील दूर से चलकर। जनाब देखते हैं, आप हमारे राजनेताओं को। आप भारत को गरीब देशों में गिन सकते हैं, मगर, राजनीति में इनका तोड़ नहीं है, सच में आपके पास। सोशल नेटवर्किंग वेबसाइट आपके वहां से चलती है, मगर, उस पर चर्चाएं हम करते हैं। यदि आप इंटरनेट पर होने वाली चौपाल चर्चा छोड़ दें, तो तुम्‍हारा मार्क जुकरबर्ग, वो फेसबुक वाला छोकरा, रोड़पति हो जाएगा, आगे से सिर्फ ''क'' निकल जाएगा। ''क'' का महत्‍व समझते हैं आप।

आप भी सोच रहे होंगे कहां दिल्‍ली के चुनाव, कहां मैं व्‍हाइट हाउस का निवासी। जनाबेहुसैन मोदी का बस नहीं चल रहा था, वरना आपका व्‍हाइट हाउस पर भी छीन लें। यदि ग्‍लोबल चुनाव हों और एक व्‍यक्‍ति को ग्‍लोबल का मुखिया नियुक्‍त करना हो तो आप क्‍या सोचते हैं ? कि हमारे प्रधानमंत्री, जो आपको बड़ी गर्मजोशी से मिले, आपको जीतने देंगे। मैं कहता हूं, भूल जाओ। वो आपके देश से छोड़ो, हर देश के साथ ऐसा रिश्‍ता निकालते कि उन देशों की पीढ़ियां भी सोचती रह जाती। माहौल ऐसा बनता कि आप भी अपना एक बहुकीमती वोट नरेंद्र मोदी को देकर कहते, हां, बंदे में दम तो है।

यदि दम न होता तो आप अपनी कड़ी सुरक्षा व्‍यवस्‍था के साथ यहां थोड़ा होते जनाब हुसैन। आपको पता है कि इतनी कड़ी सुरक्षा के लिए भारत को कितना रुपया खर्च करना पड़ता, यदि इतना रुपया खर्च होता तो विपक्ष पगला जाता, जनता तो हमारी भोली भाली है। इसलिए नरेंद्र मोदी ने एक योजना बनाई, आपको आमंत्रित किया। उनको पता था, आप अकेले तो आएंगे नहीं, आप अपना पूरा ताम झाम लाएंगे, जो लेकर भी आए। राजनीति में मोदी का जवाब नहीं, यह बात तो आपको भी समझ आ गई होगी। एक हजार करोड़ खर्च कर आप भारत आए, सुरक्षा इंतजाम का सारा खर्च मिला जुलाकर बात कर रहा हूं। अब सोचो, यहां आकर यदि आप खाली हाथ जाते तो अमेरिका को क्‍या मुंह दिखाते, अंत आप उसी तरह फंसे हुए थे, जिस तरह मैं पहली सूरत की खरीददारी के वक्‍त, मुझे लग रहा था सौदा अच्‍छा नहीं, मगर, तबीयत ख़राब थी, पैसा काफी खर्च हो चुका था, अब सौदे को स्‍वीकृति देने के सिवाय मेरे पास भी कुछ नहीं था। मोदी को कहते हैं, हूं पक्‍का अमदाबादी शूं, अब तो आप भी मान रहे होंगे।

वरना, जितने खुशमिजाज आप आए थे। उतने खुशमिजाज आप जाने के समय न थे। यदि आप अधिक खुश होते, तो आप धर्म वाली नसीहत, साफ सुथरी बिजली, भारत को अपने निवेशकों के लिए अच्‍छी कानून व्‍यवस्‍था बनानी चाहिए इत्‍यादि तो न कहते। आप इतने खुश होते कि कुछ दिन और भारत में गुजारने के बारे में सोचते, यकीनन मोदी ने कहा होगा, कुछ दिन तो और गुजारिए भारत में। आप ने कहा होगा, नहीं नहीं, बस बस। आपके मन में संदेह तो पैदा हुआ होगा, कहीं मोदी से आप से बदले में अमेरिका का व्‍हाइट हाउस न छीन ले। मोदी से आपका डरना प्राकृतिक भी है, क्‍योंकि केशुभाई पटेल, एलके आडवाणी भुलाए नहीं भूलते।

आपने एक ख़बर का जिक्र करते हुए कहा, अब मिशेल ओबामा के अलावा एक और फैशन आइकन आ गया। हम तो अब तक मोदी जी को विकास पुरुष के नाम से जानते थे, आपने फैशन आइकन कहकर उनका कद छोटा कर दिया क्‍योंकि फैशन आइकन लम्‍बी रेस के घोड़े नहीं होते। हमारे यहां बहुत फैशन आइकन आए और चल दिए, क्‍योंकि फैशन गतिशील है। कल को कोई फैशन आइकन आ गया तो मोदी की लूल हो जाएंगे। हमारे जहां कभी धोनी फैशन आइकन थे। तो कभी हनी सिंह यो यो फैशन आइकन बन जाता है। दिल चाहता है के बाद से गजनी तक आमिर ख़ान भी यूथ फैशन आइकन रहे।

मैं आपको याद दिलाना चाहता हूं, हमारे देश के लिए प्रधानमंत्री के रूप में विकास पुरुष को चुना है, हालांकि, यह दूसरी बात है कि वे व्‍यक्‍तिगत विकास पर ध्‍यान देते हैं। आप ने देखा, आप एक ही कोट सूट में घूमते रहे। हमारे प्रधानमंत्री ने कितने लिबास बदले। आखिर फोटो सेशन भी तो कुछ होता है कि नहीं। आपको हैरानी तो हुई होगी, जब आपने हमारे प्रधानमंत्री को लाखों रुपये की कीमत से तैयार सूट में देखा होगा, जिसपर लिखा था नरेंद्र दमोदर दास मोदी। आपको गुस्‍सा तो आया होगा कि मुख्‍यातिथि मैं हूं, और फूल कवरेज जनाब लेकर जा रहे हैं। आपको बुरा तो तब भी लगा होगा, जब नरेंद्र मोदी ने रूस से रिश्‍ते ख़राब न करने की बात आपको चुपके से कही होगी। गुस्‍सा तो मुझे भी आया था, जब आपने रूस के खिलाफ भारत की जमीं से जहर उगला था, जो आपकी पुरानी आदत है। जब आपने सईद हाफिज के सिर पर इनाम रखा तो घोषणा अपने व्‍हाइट हाउस से करने की बजाय भारत की राजधानी दिल्‍ली से की। बंदूक हमेशा आपकी रहती है, बस कंधा हमारा। आप अमेरिकी बहुत शातिर हैं। मगर, नरेंद्र मोदी को भी कम मत समझना क्‍योंकि वो 130 करोड़ भारत के नागरिकों को टिकाए हुए हैं।

वो जो बोलते हैं, वो करें न करें, लेकिन जो वो बोलते नहीं, वो हमेशा करते हैं, राउड़ी राठौड़ की तरह। इसलिए अधिकतर चर्चा में रहते हैं। मैं आपको धमकी नहीं दे रहा। मैं तो केवल चेतावनी दे रहा हूं। थोड़ा सा संभलकर चलना क्‍योंकि जो दस साल पहले आप ने राजनीतिक जुआ खेला था, अब उस जुए में आपके सामने भारत का सबसे चालाक पत्‍तेबाज बैठा है।

हालांकि, आजकल उनको नाक के तले वाले हिस्‍से की अधिक फिक्र है। हां, दिल्‍ली की। तभी तो उन्‍होंने मन की बात में कहा, ''बेन्जामिन फ्रेंकलिन का जीवन चरित्र हमें यह प्रेरणा देता है कि व्यक्ति को जीवन को बदलने के लिए समझदारी पूर्वक कैसे प्रयास करना चाहिए। मुझे यह बात प्रेरणा देती है कि झुग्गी झोपड़ी में रहने वाला गरीब भी मेरी चिन्ता करता है। मैं अपना जीवन ऐसे लोगों की सेवा में लगा दूंगा।''। अभी कुछ दिन पहले अवैध कालोनियों को वैध किया। सुना है कि यह दिल्‍ली की तीस सीटों को प्रभावित करती हैं। अब देखना तो यह है कि आपकी तरह अंतिम समय फेंके इन पत्‍तों का असर दिल्‍ली पर देखने को मिलता है कि नहीं।

वैसे आप भी कम शातिर थोड़ी न हैं। हमको भी पता चल जाता है कि आप अमेरिका का कचरा भारत में बेचने निकले हैं। आपको पता है, आपके जाने के बाद एनडीटीवी पर वरिष्ठ पत्रकार सिद्धार्थ वरदराजन कहते हैं, 'अमेरिका में न्यूक्लियर एनर्जी का बड़े स्तर पर इस्तेमाल होता है, लेकिन पिछले कुछ वक्त से इसका विस्तार थम सा गया है। वहां कई सूबों में न्यूक्लियर एनर्जी के प्लांट लगाने की कोशिश हो रही है, लेकिन स्थानीय विरोध और रेडियोधर्मी कचरा प्रबंधन जैसे कई मुद्दे आड़े आ रहे हैं। इसलिए पिछले 30-35 सालों से वहां बड़ी कंपनियों के रियेक्टर नहीं बिक रहे।'

तुम चाहते हो। चीन पाकिस्‍तान के साथ चला जाए। इंडिया मीलों दूर वाशिंगटन के साथ जुड़ जाए, उसका पुराना कचरा खरीदने के लिए, रूस को तुम हमसे दूर करना चाहते हो, जिसका साहित्‍य गुलामी के दिनों में हमारा प्रेरक बना। आप बाजार की भाषा बोलते हैं। आपके संवाद बाजार की स्‍थितियों को देखते हुए लोगों की भावनाओं को ध्‍यान में रखते हुए लिखे जाते हैं। यदि आप शाह रुख ख़ान के इतने बड़े फैन थे, तो आपके एयरपोर्ट पर दो बार इस ख़ान को तलाशी के लिए न रोका जाता, केवल नाम की समानता के चलते। टोपी पहनाने के लिए आप लोगों ने पीआर एजेंसियां खोज रखी हैं। बात अभी भी देख दिखाई तक पहुंची है। लड़के को लड़की पसंद आएगी या नहीं, यह तो आने वाले समय में पता चलेगा। वैसे एक अन्‍य बात आपको बता दूं, आप ने व्यापार बढ़ाने के लिए 3 अरब डालर के लोन देने की घोषणा की, जबकि चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने भारत में अगले पांच साल में 20 अरब डॉलर और जापान ने 35 अरब डॉलर के पूंजी निवेश की घोषणा की थी।

जय हिंद

Wednesday, January 21, 2015

राजनाथ सिंह - यह कैसा विरोधाभास है ?

'हमारा मीडिया भ्रमित है। वह कहता है कि अमेरिकी वेधशाला बताते हैं सूर्य ग्रहण और चंद्रग्रहण किस तारीख को लगेगा... मैं कहता हूं मत देखो वेधशाला की तरफ, पड़ोस में कोई भी पंडित जी होंगे। वह पंचांग खोलेंगे और 100 साल पहले से 100 साल बाद का ग्रहण बता देंगे।'

यह शब्द केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह के हैं। उन्होंने लखनऊ विश्वविद्यालय के दीक्षांत समारोह के दौरान कहे। यकीनन, हमारे पंडितों के पास बहुत सारा ज्ञान है।

मगर, राजनाथ श्री यहां तक मुझे याद है। हमारे किस पंडित ने आज तक चंद्रमा पर किसी व्यक्ति को नहीं भेजा और न ही आज तक किस पंडित ने मंगल ग्रह पर जाकर आसन जमाया। आपकी उंगलियों मे पहने रत्न बताते हैं कि आप ज्योतिष विद्या में विश्वास करते हैं। जो करना बुरी बात नहीं है। वैदिक ज्योतिष सदियों से विश्वसनीय है।

मगर, आप के दाहिने हाथ पर सुनहरे रंग की एक घड़ी हमेशा विराजमान रहती है। इस घड़ी सूईयां समय बिताती हैं और घड़ी व्यक्ति का समय बताती है। मैंने कभी घड़ी नहीं बांधी। मेरे घर में बहुत वर्षों तक टाइम पीस भी नहीं हुआ करता था। मगर, मेरी माता सूर्य के ढलते परछाये के साथ समय का अंदाजा लगा लेती थी। मेरे पिता रात को खेतों में पानी लगाते समय तारों को देखकर समय समझ लेते थे। मगर, यह केवल अनुमान होता था। यह पक्की पक्की या सटीक जानकारी नहीं होती थी।

आज आपके हाथ में बांधी हुई घड़ी सटीक समय देती है। आपके बगल में खड़े हुए व्यक्ति की घड़ी से एक दो सेकंड के अंतर से चल रही हो सकती है। मगर, एक दो संकेड का अंतर अधिक मायने नहीं रखता है। मगर, अब मैं शहर में नौकरी करता हूं। मेरे कार्यालय में बायो मैटिक हाजिरी सिस्टम है। मुझे उसके हिसाब से दौड़ना पड़ता है। मेरे पास समय नहीं कि मैं सूर्य के उगने से समय की गणना कर पाउं।

और सबसे दिलचस्प बात तो कहना चाहूंगा कि आज पंडित भी टेक्नो दीवाने हो रहे हैं। आज कल वो भी जन्म कुंडली कंप्यूटर में फटाफट बनाने लगें हैं। हां, जिनके पास अभी तक सुविधा नहीं पहुंची, वो कागज काले कर रहे हों, मैं इस संदर्भ में अधिक कुछ नहीं कह सकता।

भारत में डिग्री आधारित शिक्षा प्रणाली को खत्म कर देते हैं क्योंकि हमारे ऋषियों मुनियों के पास कौन सी डिग्रियां थी। उनकी शिक्षा आज की शिक्षा से बेहतर थी। उनके अनुमान आज के विज्ञान से अधिक सटीक थे। यदि आप डिग्री व्यवस्था को खत्म कर दें तो स्मृति ईरानी को लेकर चल रहा विवाद भी खत्म हो जाएगा। उनकी तरह हम भी पंडित से जाकर पूछेंगे कि हमारे नसीब में प्रधानमंत्री बनना लिखा है या नहीं ?

सुनना है कि हिल्टर को किसी ने कहा था, तुम्हारे हाथों में सत्ता प्राप्ति की लकीर नहीं है अर्थात राज्य योग नहीं। और जिद्दी हिटलर ने चाकू से हाथ पर रक्त से लथ पथ लकीर खींच डाली थी। और लथ पथ धरती पर उसकी हुकूमत की दुनिया गवाह बन गई। आप भारत को किसी तरफ लेकर जाना चाहते हैं। राजनाथ सिंह स्पष्ट करें। 

एक तरफ प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी डिजिटल इंडिया देखना चाहता है और एक तरफ आप पुराने रीति रिवाजों में विश्वास करने वाला भारत देखना चाहते हैं। स्पष्ट करो। आप दीक्षांत समारोह में हैं। डिग्री बांट रहे हैं। आप युवा पीढ़ी को संदेश दे रहे हैं। यह किस तरह का विरोधाभास है कि हाथ में घड़ी है या तारों को देखकर समय देखने वाली दुनिया पर नजर खड़ी है। 

Saturday, January 10, 2015

'रामलीला' मैदान में 'मोदी लीला'

बाबा रामदेव का काले धन को लेकर अनशन हो या अन्ना हजारे का जन लोकपाल बिल लाने को लेकर शुरू किया गया आंदोलन। दोनों की याद आती है तो याद आता है दिल्ली का रामलीला मैदान। मैदान के नाम से जाहिर होता है कि यहां पर दीवाली से पूर्व रामलीला का आयोजन किया जाता है। यहां आयोजित होने वाली रामलीला में श्रीराम और रावण के बीच छद्म युद्ध होता है, क्योंकि रामलीला में सभी कलाकार एक दूसरे की जान पहचान के होते हैं। उनको पता होता है कि वो केवल कुछ दिनों के लिए किरदार अदा कर रहे हैं। अंत, उनको अपने असल जीवन में ढलना है।

मगर, यहां एक अन्य लीला भी होती है। वो राजनेताओं की होती है। इस लीला में रावण हमेशा विरोधी पार्टियां होती हैं। स्वयं को राम कौन नहीं कहना चाहेगा। राम जो ठहरे मर्यादा पुरुषोत्तम। यहां हर आदमी एक दूसरे से उत्तम होने की दौड़ में है। चुनावों के दिनों में नेता भी हाथी सी फीलिंग लेकर गलियों मोहल्‍लों से गुजरते हैं। आलोचना करने वालों को कुत्‍तों से अधिक समझते भी नहीं। इन दिनों हर कोई देश की विकास पैसेंजर को सुपर फास्ट बनाने के दावे करता है। बस! शर्त इतनी सी है कि इंजन उसके नाम का होना चाहिए। महिलाएं संदेही स्वभाव की होती है। भारतीय नेताओं को देखने के बाद यह तर्क झूठा सा मालूम पड़ता है क्योंकि जितना संदेह इनमें पाया जाता है, अन्य किसी प्राणी में नहीं। इनकी लीला ही निराली है।

लीला से याद आया। आज देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी रामलीला मैदान में थे। उनकी मेगा बजट रैली का आयोजन था। हालांकि, उनके होठों तले दबी हंसी बता रही थी कि उनकी स्‍थिति कुछ इस तरह की है, जैसे इंडिया टीम में खेलने वाला खिलाड़ी रणजी ट्राफी के लिए खेल रहा हो। रैली में दूर दराज से लोग आए होंगे। आख़िर देश के प्रधानमंत्री का लाइव भाषण कौन नहीं सुनना चाहेगा। मीडिया वाले भी अपने घरों से बड़े चौड़े होकर निकले होंगे। आख़िर एक महा रैली के साक्षी जो बनने वाले हैं। कुछ सालों बाद संस्‍मरण भी तो लिखने होंगे।

मगर, खोदा पहाड़ निकली चूहिया। जब मैंने प्रिय प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी की रैली के बारे में पढ़ा तो सोच में पड़ गया। प्रिय प्रधानमंत्री ने कहा, ''जो देश का मूड है, वही दिल्ली का भी मूड है।'' मैं भी गदगद हो उठा। मेरे अंदर खलबली सी मच गई। मैंने अपने आप से कहा, ''हे प्रिय, यदि आप इतने अंतर्यामी हैं तो प्रभु अपनी लीला का परिचय देते हुए इस रैली में विरोधियों पर हमला करने की जगह दिल्ली वासियों को अग्रिम शुक्रिया कह देते।''

मेरे प्रिय प्रधानमंत्री आप ने नवगठित पार्टी पर हमला बोलते हुए कहा, "जिन लोगों की मास्टरी धरना देने की है उनको वह काम करने दीजिए। हमारी मास्टरी सरकार चलाने में है इसलिए हमें यह काम सौंपिए।" मास्‍टरी से याद आया कि आप संघ परिवार से तालुक रखते हैं। और मैं जानना चाहूंगा कि उसके पास किस तरह मास्टरी है। हे प्रिय, जरा उसका इतिहास उठाकर बताएं। जरा नए भारत को बताएं कि जब भारत को आजादी मिल रही थी तो पुणे में कौन से ध्वज को लहराकर सलामी दी जा रही थी। जब देश में एक महिला दबंग नेता इंदिरा गांधी राज था तो आपकी पार्टी किस तरह की गतिविधियों का आयोजन कर रही थी। जरा खुलकर बताएंगे। आपको महात्मा गांधी सबसे प्रिय हैं। क्षमा करें! सत्याग्रह करना तो उन्होंने ही पूरे भारत को सिखाया है। आपका भाषण उसी तरह का मालूम पड़ता है, जैसे सनी लियोने कह रही हो, यदि अंग प्रदर्शन करना है तो पॉर्न दुनिया में चली जाएं। बॉलीवुड को मेरी जरूरत है क्‍योंकि मुझे अभिनय करना आता है।

प्रिय प्रधानमंत्री आपने कहा,'जिन लोगों ने दिल्ली का एक साल बर्बाद किया है। उनको सजा मिलनी चाहिए।' मैं आप से सहमत हूं। शत प्रतिशत सहमत हूं। किंतु, मैं इतना पूछता हूं कि आप दिल से बोल रहे हैं, या किसी पटकथा विशेषज्ञ के लिखे शब्दों को केवल आवाज दे रहे हैं। क्षमा करें, क्योंकि मैं आपको अब जम्मू कश्मीर की तरफ देखने को कहूंगा। जहां भाजपा एवं पीडीपी के कारण जनता का मतदान व्यर्थ जाने वाला है। मुझे पता है कि आप कुछ नहीं कहेंगे। आप बोलने वाले प्रधानमंत्री हैं। क्षमा करें, आप में संवाद क्षमता नहीं है। संवाद दो लोगों के बीच की वार्ता है। एक तरफ से दिया गया व्यक्तव्य संवाद नहीं कहलाता।

आप ने कहा, 'दिल्ली को मैं जनरेटर मुक्त बना दूंगा।' अर्थात 24 घंटे पूर्ण रूप से बिजली उपलब्ध करवाई जाएगी। आप देश के प्रधानमंत्री हैं। यकीनन, आप दिल्‍ली के मुख्‍यमंत्री तो बनेंगे नहीं। यदि आपके अधीनस्‍थ सरकार ऐसा करेगी तो मेरी इतनी सी जिज्ञासा है कि आप एक बार हरियाणा सरकार से जरूर पूछें कि वो अपने वादे 24 घंटे बिजली के अनुसार अब कितने घंटे बिजली हरियाणा के लोगों को उपलब्ध करवा रही है।

आप ने कहा, मेरी सरकार को सात महीने हो गए। भ्रष्टाचार का एक भी मामला सामने नहीं आया। लेकिन, आप ने यह नहीं बताया कि पिछले सात महीनों में आप की सरकार ने कितने अध्यादेश जारी किए। सच कहूं तो अध्यादेश राज आपकी सरकार में ही आया है। यकीन नहीं होता कि उस सरकार ने 15 दिन में सात अध्यादेश पारित कर दिए, जो संप्रग पर अध्यादेश राज लाने का आरोप लगा रही थी। पिछले सात महीनों में देश के आपको अधिक समय विदेश यात्रा पर देखा है। इसके अलावा मीडिया में केवल धर्म परिवर्तन, घर वापसी, बेटी बचाओ बहू लाओ, गीता का राष्‍ट्रीयकरण, स्‍कूलों में संस्‍कृत, चार बच्‍चे पैदा करो, सूर्य नमस्‍कार इत्‍यादि ही आया है।

वैसे दिल्‍ली में 2022 तक झोपड़ियों की संख्‍या बढ़कर कितनी हो सकती है ? क्‍योंकि मोदी जी आपकी घोषणा के बाद अब बेघर लोगों का नारा होगा दिल्‍ली चलो झुग्‍गी बनाओ। पक्‍की तो मोदी जी कर देंगे। हां, पर अहमदाबाद वाले पूछ रहे हैं कि उनकी झुग्‍गियो में कब तक बिनानी सीमेंट लग जाएगा। सदियों के लिए।   
अंत में
एक मफलर वाले को हराने के लिए दिल्ली की भाजपा ईकाई को देश के प्रधानमंत्री सहित अन्य राज्यों के मुख्यमंत्रियों के जमावड़े की जरूरत पड़ रही है। बस इतना कहूंगा कि अरविंद केजरीवाल के पास गंवाने के लिए कुछ नहीं है और पाने के लिए छोड़ी हुई दिल्ली की कुर्सी है। यदि आप हार गए तो...... चल छोड़ो जाने दो। आप नहीं समझेंगे। आप प्रधानमंत्री हैं।

Thursday, January 1, 2015

एबीपी न्‍यूज, पोल और धोखा

कुछ दिन पहले देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी एक विदेशी पत्रिका टाइम के ऑनलाइन रीडर्स सर्वे पोल में जीतकर अंत हार गए। पत्रिका ने नरेंद्र मोदी को जीतने बावजूद अंतिम दौड़ से बाहर कर दिया। हालांकि, इस विदेशी पत्रिका प्रबंधन का कहना था, अंतिम निर्णय जूरी का होता है। सवाल उठा, जो उठना भी चाहिए। यदि अंतिम फैसला जूरी का होता है तो ऑनलाइन रीडर्स सर्वे पोल करवाने का औचित्‍य क्‍या ? टाइम पत्रिका के पास जवाब नहीं होगा, केवल तर्क होंगे।

पत्रिका के नक्‍शेकदम पर चलते हुए आज देश के हिन्‍दी समाचार चैनल ABP न्यूज ने पाठकों की राय को दरकिनार कर देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को साल 2014 का व्यक्ति विशेष चुन लिया। दरअसल, ABP न्यूज ने अपनी वेबसाइट ABP live पर साल 2014 के व्यक्ति विशेष का पोल करवाया। इस पोल में अरविंद केजरीवाल को 52.63 फीसदी मत मिले, जबकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को 34.12 फीसदी। इस पोल में दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को बुरी तरह पछाड़ दिया।

मगर, ABP न्यूज ने, ''दर्शकों की राय में अरविंद केजरीवाल व्यक्ति विशेष हैं, लेकिन देश को पिछले 30 साल में पहली बार 2014 में पूर्ण बहुमत की सरकार नरेंद्र मोदी ने दी है। ऐसे में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ABP न्यूज के 2014 के व्यक्ति विशेष हैं।'' का तर्क देते हुए अरविंद केजरीवाल को साल 2014 का व्यक्ति विशेष नहीं चुना।

ग्रामीण क्षेत्रों में एक आम कहावत है कि जिसकी खाएं बाजरी, उसकी भरें हाजिरी। नरेंद्र मोदी की सरकार है, अब उसकी जय जयकार नहीं होगी तो किसकी होगी। लोग कहते हैं कि अकबर के साथ बीरबल भी निकल गए। मगर, आज जब इलेक्‍ट्रोनिक मीडिया को देखता हूं तो लगता है कि अकबर अकेले ही निकले होंगे। बीरबल तो आज भी जिंदा हैं।

बारह साल तक गुजरात के पूर्व मुख्‍यमंत्री नरेंद्र मोदी को निशाना बनाने वाला मीडिया आजकल अमूल कंपनी से बटर उधार लेकर खूब लगा रहा है। हालांकि, नरेंद्र मोदी मीडिया को भाव नहीं दे रहे हैं। टाइम पत्रिका के बाद ABP न्यूज ने भी लोगों के भरोसे को तोड़ा है। ABP न्यूज के सर्वे पोल में नरेंद्र मोदी के दीवानों का न आने का कारण टाइम पत्रिका का धोखा हो सकता है। जब आपको जनता की राय के साथ चलना नहीं है तो क्‍यों इस तरह के पोल सर्वे करवा जाते हैं।

एबीपी न्‍यूज की एक अन्‍य समस्‍या हो सकती है कि कहीं अरविंद केजरीवाल को विजेता घोषित कर देने से नरेंद्र मोदी के चाहने वाले उस पर पक्षपाती होने का आरोप न लगा दें। यदि आप बाजारवाद से इतने डरे हुए हैं, तो आपको अपनी दुकान के बाहर लिखकर लगाना चाहिए, बाजारवाद के दौर में निष्‍पक्षता न मांगें। आप से अच्‍छे तो दुकानदार हैं, जो दुकान के बाहर लिखकर लगाते हैं कि फैशन के दौर में गारंटी न मांगें। 


Wednesday, December 31, 2014

कुछ यूं हमने 2014 साल बिता दिया

पुराने साल की तरह अब धोनी भी टेस्ट क्रिकेट से निकल लिए। नीतिश कुमार तो सीएम की कुर्सी से कब के निकल लिए, मगर अरविंद केजरीवाल की तरह फिर कतार में हैं। यूटर्न में नरेंद्र मोदी सरकार ने अरविंद केजरीवाल सरकार को पछाड़ दिया। मनमोहन सरकार को सैनिक सिर काटने के मामले में मोदी सरकार ने क्लीनचिट देकर मनमोहन का रिपोर्ट कार्ड सुधार दिया। ऋतिक रोशन वैवाहिक जीवन में चूक गए, लेकिन आधार कार्ड ने अपना आधार बना लिया। विद्या एवं रानी ने भी शिल्पा की तरह सैकेंड हैंड हसबंड के साथ अपना घर बसा लिया।

महाराष्ट्र, हरियाणा में कब्जा करने के बाद झारखंड में बीजेपी ने पहला गैर आदिवासी मुख्यमंत्री बना दिया, हालांकि, जम्मू कश्मीर में जनादेश का बिखराव ने पेच फंसा दिया। वर्ष 2013 में अरुण जेटली ने जिन दिनों कांग्रेस के अध्यादेश की पुरजोर आलोचना की थी। अपनी सरकार आते ही सात दिन में छह अध्यादेश लाकर साबित कर दिया कि परिवर्तन समय का नियम है। संसद बेचारी अब हो हल्ले के लिए रह गई। प्रधानमंत्री की शपथ लेने के बाद नरेंद्र मोदी ने विदेश मंत्री का कार्यभार खूब संभाला। हालांकि, वर्ष के अंत में रेलवे के निजीकरण को सिरे नकार दिया। बात बात पर ट्विट करने वाले प्रधानमंत्री की धर्म परिवर्तन पर चुप्पी ने मनमोहन सिंह को पछाड़ दिया।

राहुल गांधी को अभी भी उम्मीद है कि कांग्रेस जल्द देश के केंद्र में होगी, भले ही कीनिया टीम की तरह हर मैच हार दिया। हिंदूओं की घर वापसी के साथ साथ जनता परिवार की घर वापसी हो गई। जहां, भारत ने मंगलयान पर पहुंचकर विश्व को हैरत में डाल दिया। वहीं, अटल बिहारी वाजपेयी भारत रत्न ले गए। बड़ी अजीब बात है कि शाहरुख ख़ान दीवाली पर ही हैप्पी न्यू ईयर कह गए।

साल के अंत में पीके आए आमिर ख़ान ने सोए हुए लोगों को जगा दिया। कुछ सिनेमा घरों में तोड़ फोड़ ने खर्च बढ़ा दिया। मोदी सरकार ने भी छह महीनों वालों के बदले 60 साल वालों से मांगो हिसाब कहकर टरका दिया। नेताजी से जुड़े दस्तावेज सार्वजनिक नहीं होंगे, राजनाथ सिंह ने कहकर जनता का दिल दुखा दिया। इस साल ने फिर से नेताजी का भारत रत्न अटका दिया। टाइम पत्रिका से चूके भारत देश के सेलिब्रिटी प्रधानमंत्री को सनी लियोने की खूबसूरती ने हरा दिया। हमने बस यूं ही पूरा साल बिता दिया।

Saturday, December 27, 2014

मोदी शीत लहर, कोहरे के दिन और कांग्रेस चिंतन



कोहरे के दिनों में नारियल तेल बोतल से बाहर आना बंद कर देता है। नसों में रक्त भी जमा जमा सा लगता है। हाथों को मसलने के सिवाये कुछ दूसरा सूझता भी नहीं है। मगर, ऐसे कोहरे के दिनों में सबसे पुरानी पार्टी के दिमागी कलपुर्जे हरकत करने लगे हैं। सुनने में आया है कि देश की सबसे पुरानी पार्टी अब जनता से जानना चाहेगी कि कहीं उसकी हिंदू विरोधी छवि तो नहीं बन गई।

कांग्रेसी नेताओं ने अपने राष्ट्रीय उपाध्यक्ष राहुल गांधी की सोच को नमन तो किया होगा। नमन तो बनता है, क्योंकि निरंतर रसतल में जा रही कांग्रेस को आत्ममंथन की बड़ी जरूरत है, और आत्ममंथन के लिए तांबू गाढ़ने इत्यादि की परंपरा रही है। ऐसे आदेश पारित हो सकता था, मगर ऐसा नहीं हुआ। और गलती से आत्ममंथन के लिए चुनाव स्थल में दिल्ली या कश्मीर घाटी तय हो जाती तो क्या होता ? चलो। कोहरे के दिनों में कुछ तो सूझ रहा है। वरना, इस मौसम में हाथ को हाथ ही सूझता है या रजाई इत्यादि।

मगर, हैरानी तो इस बात की है कि कांग्रेस को धर्म से आगे कुछ सूझता नहीं। कांग्रेस की इस समझ ने उसको रसतल में उतार दिया। उतना भाजपा ने हिंदू समुदाय को विश्वास नहीं दिलाया, जितना कांग्रेस ने अपने भाषणों में लोगों को विश्वास दिलाया कि भारतीय जनता पार्टी के बिना हिंदू समुदाय का दूसरा कोई भला नहीं कर पाएगा। जबकि भारतीय जनता पार्टी ने अपने हिंदुत्व वाले मास्क को उतारकर चुनाव लड़ने का पूरा प्रयत्न किया। अंत, भाजपा सफल भी हुई।

भारतीय जनता पार्टी ने नरेंद्र मोदी की उस छवि का इस्तेमाल किया, जिसका क्रिएशन स्वयं नरेंद्र मोदी ने बारह साल में किया था। नरेंद्र मोदी ने अपने आलोचक परंपरागत मीडिया से दूरी करते हुए नए उभरते सोशल मीडिया को अपना हथियार बनाया, जो युवा पीढ़ी से संवाद का सबसे बड़ा माध्यम है। लोकप्रियता का रॉकेट लगने से नरेंद्र मोदी का कद इतना ऊंचा हो गया कि देश की दूसरी सबसे बड़ी पार्टी का कद छोटा लगने लगा।

इसको कांग्रेस समय रहते भांप नहीं पाई। यकीनन, नरेंद्र मोदी के प्रति भाजपा के कार्यकर्ताओं ने उसी तरह का जोश एवं उत्साह दिखाया, जो राहुल गांधी के राजनीतिक प्रवेश पर कांग्रेस के युवा कार्यकर्ताओं ने दिखाया था। मगर, राहुल गांधी अपने कार्यकर्ताओं का उत्साह बनाए रखने में असफल रहे। इसका मुख्य कारण है कि राहुल गांधी राजनीति में दिल से नहीं आए। उनको केवल विरासत संभालने के लिए राजनीति में उतारा गया है। जब जब उनको जिम्मेदारी लेने के लिए आगे किया गया, तब तब उन्होंने जिम्मेदारी उठाने से इंकार कर दिया। और, आप इतिहास के पन्ने पलटकर देख लें। जब जब भी किसी साम्राज्य का दायित्व किसी कमजोर शासक के पास गया है। उस साम्राज्य का विध्वंस हुआ है।

कांग्रेस को एक गैर गांधी परिवार नेता की जरूरत थी। उसको कांग्रेस ने कभी स्वीकार नहीं किया। इसका दूसरा कारण यह भी रहा है कि इसके दावेदार बहुत निकल आते और कांग्रेस पार्टी की अखंडता खतरे में पड़ जाती, इसलिए कांग्रेस कभी सोनिया गांधी के प्रभामंडल से बाहर आने को तैयार नहीं हो पाई। आज जो राजनीतिक दल अन्य राज्यों में मजबूत स्थिति में हैं, वो कांग्रेस से निकले हुए नेताओं के हैं। जनता तो आज भी कांग्रेस नेताओं के साथ है, मगर अब कांग्रेस के चेहरे अलग अलग हो गए हैं।

और, ऐसी स्थिति में राष्ट्रीय स्तर पर भारतीय जनता पार्टी एक सुसंगठित संगठन के रूप में उभरकर सामने आई। भाजपा ने वो साहस किया जो कांग्रेस नहीं कर पाई। शायद, भाजपा के पास खोने के लिए कुछ नहीं था, अब सब कुछ दांव पर लगाने का समय था, जो भाजपा के नेतृत्व ने किया। नरेंद्र मोदी को अपना चेहरा बनाना भाजपा के लिए आसान न था, मगर भाजपा नेतृत्व ने साहस दिखाया। अपने कुछ नेताओं को दरकिनार किया, जो शायद समय की बड़ी जरूरत थी। और, नरेंद्र मोदी ने अपनी नई छवि का पूर्ण सहारा लिया। विकास के रथ पर सवार हो गए और सीधे दिल्ली की सत्ता तक पहुंच गए।

मोदी ने ऐसा माहौल खड़ा कर दिया कि अन्य राज्यों में भी राजनीतिक समीकरण बदल गए और कांग्रेस जैसी पार्टी को जनता से संवाद करने की सूझने लगी है। मगर, हैरानी है कि कांग्रेस उस मुद्दे पर लोगों से पूछने निकल रही है, जो उसकी हार का सबसे बड़ा कारक है। अब कांग्रेस को समझ आना चाहिए कि जनता को केवल धर्म के नाम पर ठगा नहीं जा सकता है।

कांग्रेस को भाजपा के प्रमुख अमित शाह की बात को उदारहृदय से स्वीकार करना चाहिए, जो राजनीतिक विश्लेषक लंबे समय से कह रहे हैं कि राहुल गांधी में नेतृत्व की क्षमता नहीं है। और, कांग्रेस का रिमोर्ट केवल सोनिया गांधी के हाथों मे है। कांग्रेस को गैर गांधी परिवार नेता पर विचार करना होगा, जो कांग्रेस को रसतल से बाहर निकालने के लिए समक्ष हो। सबसे अहम बात तो यह कि नया नेता कांग्रेस के प्रति जवाबदेह हो, नहीं कि गांधी परिवार के लिए।

वरना, जिस तरह अमित शाह के नेतृत्व में भाजपा देशव्यापी अभियान चला रही है। उसको देखते हुए लगता है कि जल्द ही कांग्रेस के कुछ बड़े नेता बीजेपी का दामन थाम सकते हैं। राजनीति अवसरवाद का दूसरा नाम बन चुकी है, इसलिए कांग्रेस को नेताओं को लेकर आश्वस्त होने से बचना चाहिए। कांग्रेस को धर्म से ऊपर उठकर देश के अन्य मुद्दों पर बात करनी चाहिए। साथ ही, एक अच्छे विपक्ष की भूमिका निभानी चाहिए।

Monday, December 22, 2014

शिव के मंदिर में भगवान मोदी की अराधना

'स्वार्थ' तेरा भी जवाब नहीं। सुनते ही स्वार्थ मेरे पर क्रोधित हो उठा। बोला, मेरा कसूर तो बताओ। तुम मानव से कुछ भी करवा सकते हैं, मैंने उच्च स्वर में कहा। इसमें मेरा कोई कसूर नहीं, मुझे परमात्मा ने ऐसा ही बनाया है, स्वार्थ ने कहा।

मैंने कहा, आज तुम्हारे कारण परमात्मा का जन्म हो रहा है। इस कारण तो मैं दुविधा में हूं। निर्माता का कार्य सृजन होता है। मगर, तुम तो निर्माता का सृजन कर रहे हो, जिसने तुम्हारा सृजन किया है। स्वार्थ ने हैरत भरे अंदाज में पूछा, तुम साफ साफ कहो ना। तुम कहना क्या चाहते हो ।

मैंने कहा, आज तुमने एक इंसान को भगवान शिव से बड़ा कर दिया। स्वार्थ ने कहा, तुम अब पहेली मत बुझो। पहेली के सारे कपड़े उतारकर सच से रूबरू करवाओ। मैंने कहा, तुमने उत्तर प्रदेश के कौशांबी जिले के भगवानपुर गांव का नाम तो सुना होगा। स्वार्थ ने कहा, भगवानपुर भी  होगा, बहुत सारे गांव हैं। मैंने कहा, इस गांव में शिव भगवान का एक प्राचीन मंदिर है। इसमें कौन सी नई बात है, भारत में हर मंदिर के बाहर प्राचीन ही लिखा होता है, स्वार्थ ने मेरी बात काटते हुए कहा। मैंने कहा, नहीं नहीं, सच में 300 साल पुराना मंदिर है। मगर अब यह शिवजी का नहीं रहा। स्वार्थ ने कहा, नहीं रहा, मतलब। मैंने कहा, पिछले लोक सभा चुनावों में इस मंदिर को नया भगवान मिल गया, तुम्हारे कारण।

स्वार्थ कुर्सी से कूद उठा,  और बोला, मैं तो इस गांव के बारे में जानता भी नहीं, तो मेरे कारण इस गांव के मंदिर को भगवान किस तरह मिल गया। मैंने कहा, शांत रहो। तुम मानव के भीतर वास करते हो। और उस मानव ने तुम्हारे कारण इस मंदिर को नया भगवान दे दिया क्योंकि अब तुमको शिव पूरा नहीं कर पा रहे थे। स्वार्थ ने कहा, अच्छा तो नया भगवान कौन है ? मैंने कहा, सुनने में आया है कि नया भगवान श्री नरेंद्र मोदी हैं। स्वार्थ ने कहा, हैं!। मैंने कहा, हां, बिल्कुल, इस मंदिर में मोदी की तीन फुट की मूर्ति स्थापित की गई है। स्वार्थ ने सुनते ही कहा, ओह माय गॉड।

मैंने कहा, अरे आगे तो सुनो। स्वार्थ ने कहा, सुनने को बचा ही क्या है ? मैंने कहा, नहीं नहीं, अब गांव वाले मोदी के गुणगान में मिश्रा द्वारा रचित भजन को प्रतिदिन गुनगुनाते हैं। शिव के साथ मोदी भगवान की भी प्रार्थना और आरती भी होती है । हर दिन सुबह और शाम में भगवान शिव के साथ मोदी की आरती लगाई जाती है। 200 शब्दों में लिखी आरती की शुरुआत होती है- 'जय मोदी राजा, तेरे नाम का देश में डंका बाजा।'

स्वार्थ तो सिर पर पैर रख सरपट दौड़ लगाते हुए निकल लिया, और मैं बुड़बुड़ाता रहेगा नमो नमो।

Monday, December 15, 2014

ममता बनर्जी के नाम एक खुला पत्र

पश्चिमी बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को मेरा नमस्कार! आप अपनी सरकार के परिवहन मंत्री मदन मित्रा की गिरफ्तारी के बाद एक घायल शेरनी की तरह बर्ताव कर रही हैं। हालांकि, राजनीतिक आक्रामकता 'कानूनी लड़ाई' का तोड़ कभी नहीं हो सकती। देश का कानून सबूत मांगता है, भावनाएं इसके लिए किसी काम की नहीं हैं। आपको इस तरह की आक्रामकता से बचने की जरूरत है एवं कानूनी कार्यवाही का सम्मान करते हुए राज्य की प्रगति पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए। यदि आप इसी तरह सड़कों पर उतर कर कानूनी कार्यवाही को प्रभावित करने की कोशिश करते हैं, तो आप स्वयं की जुझारू महिला नेता वाली छवि को धूमिल करते हैं।

एक मुख्यमंत्री होने के नाते ममता बनर्जी को संयम नहीं खोना चाहिए, बल्कि नरेंद्र मोदी की गुजरात सरकार को ध्यान में रखना चाहिए, जिस सरकार की तत्कालीन महिला एवं बाल विकास मंत्री माया कोडनानी को जेल की यात्रा तक करनी पड़ी।

जब आप अचानक उग्र भाव में आकर कहती हैं, ''यदि किसी केंद्रीय मंत्री को पश्‍चिमी बंगाल में गिरफ्तार कर लिया, तो आप क्‍या करेंगे ?'। उस समय  आप लोकशाही एवं नौकरशाही को जोड़ने का प्रयास करते हुए वशीकरण का संकेत देती हैं। जो लोकतंत्रिक देश के लिए सबसे बड़ा ख़तरा है। सत्‍ता के बल पर नौकरशाही का इस्‍तेमाल करना, लोकशाही वाले देश में कलंक से अधिक कुछ नहीं। इससे तो राजनेता वर्ग को बचने की जरूरत है। मगर, लानत है कि पूरा राजनीतिक सिस्‍टम इस की चपेट में है।

आप राजनीति में बरसों से हैं। आपने अपने राजनीतिक करियर की शुरूआत एक छात्र नेता के रूप में की। आपको अच्छी तरह पता है कि राजनीतिक पार्टियां किस तरह से एक दूसरे को दबाने का प्रयास करती हैं। इसमें संदेह नहीं कि एक मजबूत इमारत को गिराने के लिए उसके मजबूत स्तम्भों को हिलाया जाता है, ताकि इमारत जमीन पर गिरकर दम तोड़ दे।

आपको एक बात याद रखनी होगी कि कानूनी कार्यवाही अपनी जगह और राजनीतिक युद्घ अपनी जगह है। एक आम कहावत है कि प्रेम और युद्घ में सब कुछ जायज होता है। इसलिए, आपको धैर्य रखना होगा। भारतीय कानून का सम्मान करना होगा। कानूनी लड़ाई लड़ने के लिए कानूनी तरीकों से लड़ना जरूरी रहता है।

यदि आपके मंत्री इस मामले से स्पष्ट छवि के साथ बाहर निकलते हैं तो आपकी पार्टी का आधार मजबूत होगा, यदि ऐसा नहीं होता तो जनता के साथ इंसाफ होगा एवं आप जनता का प्रतिनिधित्व करती हैं एवं जनता के साथ खड़े रहना आपका पहला दायित्व है।
हालांकि, समझ में आता है कि मदन मित्रा के साथ आपका बरसों पुराना नाता है एवं मदन मित्रा त्रिमूल कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं में से एक हैं। छात्र राजनीति में आप एक दूसरे के प्रतिद्वंद्वी भी रहे और समय ने पश्चिमी बंगाल के दो नेताओं को राजनीति के एक मंच पर लाकर खड़ा कर दिया।

रिश्ते कितने ही करीबी क्यों न हों, रिश्ते किसी भी कानूनी कार्यवाही को प्रभावित करने का अधिकार नहीं देते हैं। आप अपने स्तर पर कानूनी कार्यवाही में सहयोग करती हैं, ताकि देश की जनता को इंसाफ मिल सके एवं यदि आपके नेता साफ सुथरे हैं तो उनको क्लिनचिट मिल सके।

ख़बर मिली है कि त्रिमूल कांग्रेस के पूर्व सांसद सुचारू रंजन हलदर ने बीजेपी का दामन थमा लिया है। आपको सबसे पहले अपने पार्टी बिखराव को रोकना होगा। हो सकता है कि कानूनी कार्यवाही में मदन मित्रा जीत जाएं, एवं जमीनी लड़ाई में आपकी पार्टी बुरी तरह हार जाए।

इंस्टेंट का जमाना है

देश ने जनादेश देकर जादूगर नहीं, प्रधानमंत्री को चुना है। यह बात में खुले मन से स्वीकार करता हूं। मगर, एक प्रधान मंत्री से जादूगर सी अपेक्षाएं किस तरह पनपी, यह भी अपने आप में एक सवाल है। चुनावों के समय रैलियों में हो रहे तबाड़ तोड़ लाजवाब शब्दों से रंगे भाषण भारतीय जनता में नयी ऊर्जा का संचार कर रहे थे। भाषणों में इस्तेमाल हो रहे जुमले अमिताभ बच्चन की पुरानी फिल्मों के संवादों की तरह लोगों के हृदयों को छू रहे थे, जिनको कुछ पेशेवर संवाद लेखकों ने लिखा था। भाषण में प्रस्तुत किए जा रहे गलत तथ्य भी सत्य मालूम पड़ रहे थे।

भारतीय राजनीति के पटल पर एक नायक जनता को अपने संवादों से आकर्षित कर रहा था। अब लालू प्रसाद यादव के गुदगुदाने वाले जुमले मजा न दे रहे थे। अब जनता एक बार फिर एंग्री यंगमैन को पसंद करने लगी थी, जो सीधे सीधे विरोधी पार्टियों को ललकार रहा था। चुनावों ने अचंभित कर देने वाले नतीजे दिए, यह उसी तरह के नतीजे थे, जैसे चुटकले रजनीकांत को लेकर बाजार में प्रचलित हैं।

रजनीकांत को बड़े पर्दे पर आप शौचालय में जाते हुए न देखेंगे, क्योंकि उसके लिए निर्देशक को गुदगुद या चक्रवर्ती तूफान का सृजन करना होगा अथवा रजनीकांत का अस्तित्व खो जाएगा। रजनीकांत की छवि को अति काल्पनिक चीजों से इतना जोड़ दिया गया है कि अब उसको साधारण कल्पना में देखना बेईमानी होगा क्योंकि साधारण चीजें तो तुषार कपूर भी कर लेता है। अब रजनीकांत अगर क्रिकेट के मैदान में खड़ा शॉट मारे तो गेंद मंगल गृह पर होनी चाहिए, अन्यथा छक्का तो बाउंडरी के पार युवराज सिंह भी लगा सकता है।

प्रचार कुछ भी कर सकता है। आपको किसी भी छवि में बांध देता है। कुछ इस तरह का देश के मौजूदा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ हुआ है। मीडिया प्रचार ने जनता के मन में इस तरह की छवि को मजबूत कर दिया कि नरेंद्र मोदी के हाथ रखने से लौह भी सोने में बदल जाएगा। अमेरिका उसके सामने नत्मस्तक हो जाएगा। पाकिस्तान तो किसी भी कानून को लागू करने से पहले नरेंद्र मोदी की सही मांगेगा।

जब आपका इतना बड़ा कदम बना दिया जाए, तो आपको उसके अनुरूप भी आगे बढ़ना पड़ता है, आप अपनी तुलना साधारण लोगों से नहीं कर सकते। टेलीविजन विज्ञापनों के बाद बच्चे भी पांच मिनट में बनने वाली मैगी चाहते हैं, उनको भूख मिटाने के लिए दस बीस मिनट बैठकर खाने के लिए इंतजार करना मुश्किल है। सेल्फी भी हाथों हाथ फेसबुक पर आपकी उपस्थिति संबंधित लोगों को बताती है। इस तेजी से बदलते समय में अब आप अपनी रफ्तार कम नहीं रख सकते।

अब मुम्बई या अन्य भीड़ भाड़ वाले क्षेत्रों में दूसरों की उम्मीद से कम स्पीड पर गाड़ी नहीं दौड़ा सकते, क्योंकि वहां भीड़ एक दूसरे पर जल्द चलने का दबाव बनाती है। अगर इंस्टेंट का लोचा न होता तो शायद बुलेट ट्रेन की भारत को अभिलाषा न होती, शायद लोग पैदल धीमी गति से अपने कार्यस्थलों की तरफ बढ़ रहे होते।

चुनावों से पहले भाजपा इतनी तेजी से हमले बोल रही थी, तो जनता को लगता यह सुपर फास्ट ट्रेन सबसे बेहतर है। कांग्रेस जैसी पैसेंजर गाड़ी में सफर करना मुश्किल है। उसी तरह, जिस तरह आज वाट्सएप एवं फेसबुक पर मोबाइल के जरिए उपस्थिति दर्ज करवाने के लिए टू जी का इस्तेमाल करना। नई सरकार है नई जनता है। अब आप बातों से लोगों का पेट नहीं भर सकते। आपको नतीजे दिखाने होंगे, अन्यथा जनता मोबाइल पोर्टबिलिटी की अवधारणा से अवगत हो चुकी है। विज्ञापन देखने के बाद एक बार तो सर्फ एक्सल खरीद सकती है, मगर टाइड सी सफेदी देने पर टाइड को खरीदना ही बेहतर समझती है। आप बुलेट ट्रेन हैं, इसलिए पैसेंजर ट्रेन का मजा जनता को आनंद न देगा। इंस्टेंट का जमाना है। अब गुजरात में भी जनता इंस्टेंट खमण ढोकला बाजार से लाना पसंद करने लगी है। उसको भी माथा पच्ची एवं घंटों इंतजार करना पसंद नहीं आ रहा है। हालांकि इंस्टेंट में मेहनत वाला मजा नहीं होता, मगर इंस्टेंट की लत लग चुकी है। 

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