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Thursday, February 26, 2015

'तू तड़ाक' और इलेक्ट्रोनिक मीडिया

बुधवार को कांग्रेस के 'जमीन वापसी आंदोलन' के दौरान मंच पर मौजूद अभिनेता एवं नेता राज बब्बर ने कहा, 'नरेंद्र मोदी किसानों की जमीन 4.5 करोड़ में उनका सूट खरीदने वाले लोगों को गिफ्ट करना चाहता है। मैं पूछना चाहता हूं नरेंद्र दामोदर दास मोदी से कि तू क्या जानता है। तू सिर्फ कॉरपोरेटरों से अपने सूट की बोली 4.5 करोड़ में लगवाना जानता है। यहां वे किसान बैठे हैं, जिनके बेटे सीमाओं पर तैनात हैं। मोदी तुझे क्या पता है?।'

राज बब्बर का बयान सुनकर मीडिया कांप गया। मीडिया को लगा, राज बब्बर ने अपनी सीमाएं पार कर दी। उसने तू शब्द का इस्तेमाल कर अभद्रता का परिचय दिया। चलो अच्छी बात है, मीडिया को शब्दों से ख़बर तो मिलने लगी। जब पत्रकारों की भीड़ बढ़ जाएगी, एवं ख़बरों का काल पड़ जाएगा, विशेषकर विवादित ख़बरों का, तो कुछ न कुछ तो लाना होगा। मीडिया भूल गया कि मौजूदा विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने एक शेर के जरिए तत्कालीन प्रधानमंत्री पर व्यंग्य करते हुए पूछा था-तू इधर, उधर की बात न कर, बता ये काफिला क्यों लूटा, मुझे रहगुजर की बात नहीं, तेरी रहबरी से सवाल है। तब तो मीडिया को तू शब्द सुनाई नहीं दिया।

यदि आप तू शब्द का अर्थ ढ़ूंढ़ने निकलेंगे तो आपको पता चलेगा कि सूफी फकीर की नजर में तू एवं यार एक हैं, अर्थात प्रभु, परमात्मा। आशिक की जुबां से निकला तू शब्द सम्मानजनक है। हिन्दी गीतों में तू का सर्वाधिक इस्तेमाल किया गया है, प्रेम भाव प्रकट करने के लिए। मेरी नजर में तू शब्द मैं के होने का संदेशा देता है, जो एक फर्क पैदा करता है, तू तभी होगा, यदि मैं का मौजूद बचा होगा। राज बब्बर ने तलख रवैये में सरकार से पूछा है, और उस सरकार से जिसका मुखिया 'मैं' शब्द का भरपूर इस्तेमाल करता है।

अंत में इतना कहूंगा.....
इलेक्ट्रोनिक मीडिया लेज चिप्स सा है। जिसकी पैकेजिंग लुभावनी है, जिसमें चिप्स कम और हवा अधिक होती है। असल में इलेक्ट्रोनिक मीडिया में पत्रकारिता उतनी ही बची है, जितनी लेज के पैकेज में चिप्स। सावधान! इंडिया।

Sunday, February 8, 2015

अरविंद केजरीवाल के नाम खुला बधाई पत्र

नमस्‍कार,
अरविंद केजरीवाल,
संयोजक, आम आदमी पार्टी,
नई दिल्‍ली।

शानदार प्रदर्शन के लिए बधाई हो। एग्‍जिट पोल के आधार पर तो आप बधाई के हकदार है हीं। यदि एग्‍जिट पोल चूक भी जाएं, तो भी आप बधाई के हकदार हैं क्‍योंकि आप ने अपने जांबाज स्‍वयंसेवक के साथ जी जान लगाकर चुनावी युद्ध लड़ा है। कभी कभी खेल इतना रोचक हो जाता है कि उसमें हार जीत से अधिक खिलाड़ियों का व्‍यवहार और जज्‍बा महत्‍व रखने लगता है। मुझे क्रिकेट देखने का अधिक शौक नहीं, मगर, क्रिकेट के मैदान पर वसीम अकरम और अजय जाडेजा का जज्‍बा व व्‍यवहार देखना पसंद था। मैच हारे या जीते, वो मुस्‍कराते हुए नजर आते थे। अब आप जीत रहे हैं। आपकी बहुमत वाली सरकार दिल्‍ली में बनती नजर आ रही है। मैं आम आदमी पार्टी का समर्थक हूं। शायद इससे बेहतर यह कहना होगा कि मैं आम लोगों का समर्थक हूं, जो कुछ बदलाव लाना चाहते हैं। मैं आपकी पार्टी का समर्थन भी इसी सोच के साथ किया।

सबसे दिलचस्‍प बात तो यह है कि विकास और बदलाव के दावे करने वाले दो शख्‍स दिल्‍ली में होंगे। एक छोटी दिल्‍ली देखेगा, तो दूसरा बड़ी दिल्‍ली अर्थात क्रमश: आधा अधूरा राज्‍य एवं संपूर्ण राष्‍ट्र। दिल्‍ली को आम आदमी पार्टी की गंगोत्री कहूंगा क्‍योंकि इसका उदय दिल्‍ली से हुआ है। यदि आम आदमी पार्टी अपने वादे पूरे करने में सफल होती है तो गंगोत्री गंगा का रूप धारण कर लेगी। मगर, ध्‍यान रखने वाली बात यह है कि गंगा में बहुत सारे गंदे नाले भी आकर गिरने लगते हैं। यदि गंगा को साफ रखना है तो गंदे नालों को इसमें गिरने से रोकना होगा।

मुझे खुशी है कि आम आदमी पार्टी ने नरेंद्र मोदी की उस रणनीति के तहत विरोधियों का सामना किया, जो नरेंद्र मोदी ने लोक सभा चुनावों के दौरान अपनाई थी। लोक सभा चुनावों में जब नरेंद्र मोदी पर विरोधी निजी हमले कर रहे थे तो नरेंद्र मोदी स्‍वयं विकास के मुद्दे पर आगे बढ़ रहे थे। जिस तरह नरेंद्र मोदी ने प्रियंका वाड्रा के शब्‍द 'नीच राजनीति' को 'नीच जाति की राजनीति' से जोड़कर पिछड़ी जाति से होने का परिचय दिया। उसी तरह 'उपद्रवी गोत्र' की आड़ में अरविंद केजरीवाल जी आप भी अपना 'गोत्र अग्रवाल' बताने से चूके नहीं। जब बीजेपी आप पर निजी हमले बोल रही थी तो आप दिल्‍ली की जनता से मुद्दों की बात कर रहे थे।

जिस तरह नरेंद्र मोदी ने देश के तमाम राजनीतिक दलों को स्‍वयं के खिलाफ बताकर स्‍वयं के कद को ऊंचा किया, उस तरह आप ने बीजेपी एवं केंद्र सरकार को एक साथ दिखाकर स्‍वयं के कद को ऊंचा किया। आप ने केंद्र सरकार बनाम अरविंद केजरीवाल कर पूरा मामला अपनी तरफ खींच लिया। जब बीजेपी आप पर कीचड़ उछालने का प्रयास कर रही थी तो आप नरेंद्र मोदी की तरह चतुराई से काम लेते हुए बीजेपी सरकार को चुनौती देते हुए दिखे। आप ने कहा, ''सरकार आपकी है, जांच करवा लो, जेल में डाल दो।'' जब कांग्रेस नरेंद्र मोदी के खिलाफ बोलती थी तो नरेंद्र मोदी का जवाब भी इस तरह का होता था।

अब एग्‍जिट पोल कह रहे हैं कि नरेंद्र मोदी की तरह आप भी विजयी होने जा रहे हैं। दिल्‍ली की जनता आपको बहुमत देने जा रही है। मेरा तो इतना निवेदन है कि आप अपना घोषणा पत्र अब अपने सामने रखें। और उसके हिसाब से जल्‍द से जल्‍द रणनीति बनाएं। जब अतिआशावाद जन्‍म लेता है, तो उतावलापन भी तेजी के साथ पनपने लगता है। अब सवाल आपकी तरफ भी उछलेंगे। आप केवल 'जुमला था' कहकर नहीं बच सकते क्‍योंकि आप से जवाब विरोधी पार्टियां नहीं, बल्‍कि मेरे जैसे युवा भी मांगेंगे, जो गुजरात या देश के अन्‍य किसी राज्‍य से बैठकर आपको पुरजोर समर्थन कर रहे थे।

मुझे उम्‍मीद है कि अरविंद केजरीवाल दिल्‍ली को एक अच्‍छी सरकार मुहैया करवाएंगे क्‍योंकि आपकी पृष्‍ठभूमि राजनीति से संबंध नहीं रखती है। सबसे अधिक महत्‍वपूर्ण बात जो मैं अंत में लिखने जा रहा हूं। वो यह है कि आप राजनीति को समझ चुके हैं। आप ने उस समझ के आधार पर एक बड़े प्रवक्‍ता को मात दे दी। मगर, अब आप शब्‍दों पर जरूर संयम बरतें। बात वो कहें, जो आप को भविष्‍य में भी उचित लगे, वो नहीं, जिस पर यूटर्न लेना पड़े।

हालांकि, आपका घोषणा पत्र भी एक राजनीतिक पार्टी सा था, क्‍योंकि उसमें वादों को पूरा करने की निश्‍चित समय सीमा नहीं थी। 'पांच साल केजरीवाल' से समझ आ रहा था कि आप पांच साल चाहते हैं। अब जनता ने आपको पांच साल भी दे दिए, यदि मैं एग्‍जिट पोल को सही मान लूं।

अंत में, फिर से बधाई देते हुए कहना चाहूंगा कि आम आदमी पार्टी के स्‍वयंसेवकों को खेल दिखा रहे मदारी की तरह नजरिया रखनी चाहिए, जो दे उसका भी भला, जो न दे उसका भी भला। आजकल एक नया ट्रेंड चला है, यदि आप के पक्ष में लिखूं तो आपका समर्थक, विरोध में लिखूं, तो पूछ लिया जाता है, जनाब कितने पैसे मिले हैं। करीब करीब यह हाल सभी पार्टी समर्थकों का है, लेकिन आम आदमी पार्टी से अलग तरह के व्‍यवहार की उम्‍मीद रखते हैं क्‍योंकि इस पार्टी में राजनीतिक लोगों की भीड़ नहीं है। बस अच्‍छी एवं स्‍वच्‍छ राजनीति का परिचय दें।

जय हिंद

Saturday, January 24, 2015

मीडिया, राजनीति और लोकतंत्र

भारतीय जनता पार्टी के प्रमुख अमित शाह ने पटना स्‍थित भारतीय जनता पार्टी के प्रादेशिक कार्यालय में एक सवाल का जवाब देते हुए कहा, ‘‘आजतक का एजेंडा है आप पार्टी को लांच करने और दिल्ली चुनाव में जिताने का.पीत पत्रकारिता का इससे बडा कोई उदाहरण नहीं हो सकता। अमित शाह की इस बात में सच्‍चाई हो सकती है। हो सकता है कि देश का नंबर वन हिन्‍दी न्‍यूज चैनल आज तक आम आदमी पार्टी को दिल्‍ली की सत्‍ता दिलाना चाहता हो।

ऐसा नहीं कि पहली बार किसी ने न्‍यूज चैनल पर अंगुली उठाई है। लोक सभा चुनाव के दौरान आम आदमी पार्टी के नेता अरविंद केजरीवाल ने भी बहुत सारे न्‍यूज चैनलों पर अंगुली उठाई थी। कुछ साल पहले भारतीय जनता पार्टी के वरिष्‍ठ नेता एलके आडवाणी ने भोपाल में आयोजित एक समारोह में मीडिया पर अंगुली उठाई थी। किसी ने कहा है कि धुंआं तभी उठता है, जब कहीं आग लगी हो।

इलेक्‍ट्रोनिक मीडिया किस तरह पक्षपाती हो रहा है। इसका अंदाजा भड़ास डॉट कॉम पर दयानंद पांडे के प्रकट विचारों से लगाया जा सकता है, जिसमें श्री पांडे लिखते हैं, ''इस बार दिल्ली विधानसभा चुनाव में टीवी चैनल खुल्लम खुल्ला अरविंद केजरीवाल की आप और नरेंद्र मोदी की भाजपा के बीच बंट गए हैं। एनडीटीवी पूरी ताकत से भाजपा की जड़ खोदने और नरेंद्र मोदी का विजय रथ रोकने में लग गया है। न्यूज 24 है ही कांग्रेसी। उसका कहना ही क्या! इंडिया टीवी तो है ही भगवा चैनल सो वह पूरी ताकत से भाजपा के नरेंद्र मोदी का विजय रथ आगे बढ़ा रहा है। ज़ी न्यूज, आईबीएन 7, एबीपी न्यूज वगैरह दिखा तो रहे हैं निष्पक्ष अपने को लेकिन मोदी के लिए अपनी प्रतिबद्धता दिखाने में एक दूसरे से आगे हुए जाते हैं। सो दिल्ली चुनाव की सही तस्वीर इन के सहारे जानना टेढ़ी खीर है। जाने दिल्ली की जनता क्या रुख अख्तियार करती है।''

दयानंद पांडे जो चित्र शब्‍दों से उकेर रहे हैं, वो लोक सभा चुनावों के दौरान भी मौजूद था। हालांकि, सत्‍ता विरोधी लहर होने के कारण लोग अधिक ध्‍यान नहीं दे रहे थे। इतना ही नहीं, हालिया आईबीएन 7 से पंकज श्रीवास्‍तव का जाना, आईबीएन 7 की निष्‍पक्ष पत्रकारिता पर सवालिया निशान लगाता है क्‍योंकि इस चैनल का मालिक रिलायंस ग्रुप है, जो पूरी तरह नरेंद्र मोदी से जुड़ा हुआ है, और इस चैनल के एडिटर उमेश उपाध्‍याय हैं, जो दिल्‍ली बीजेपी नेता सतीश उपाध्‍याय के भाई हैं। इसको देखते हुए चैनल के भीतर होने वाली निष्‍पक्ष पत्रकारिता साफ साफ नजर आती है।

पिछले दिनों आम आदमी पार्टी के नेता भगवंत मान ने ट्विटर पर एक तस्‍वीर जारी की, जो इंडिया टीवी से जुड़ी हुई थी, और इस तस्‍वीर में इंडिया टीवी के वाहन में बैठे कर्मचारी भाजपा का झंडा लेकर सड़क पर चल रहे थे। यदि द इंडियन एक्‍सप्रेस का समाचार सही है तो जल्‍द ही रजत शर्मा को पद्म विभूषण से सम्‍मानित किया जा सकता है। लोक सभा चुनावों के दौरान नरेंद्र मोदी की इंटरव्‍यू से पहले कमर वहीद नकवी का इंडिया टीवी को छोड़ना भी पक्षपाती पत्रकारिता को जग जाहिर करता है। हालांकि, इंडिया टीवी और आईबीएन 7 को लेकर अमित शाह कुछ नहीं बोलेंगे, क्‍योंकि यह चैनल उनके पक्षधर हैं। और उनकी पार्टी सत्‍ता में है।

राजनीति और मीडिया का परस्‍पर बनता संबंध जनमत के लिए घातक है। जनता न्‍यूज चैनलों पर विश्‍वास करती है। और हर किसी का अपना पसंदीदा एवं विश्‍वसनीय न्‍यूज चैनल होता है। हर ख़बर तब तक झूठी सी मालूम पड़ती है, जब तक व्‍यक्‍ति अपने पसंदीदा चैनल पर न देख ले। अगर विश्‍वसनीय मुखबिर ही गलत ख़बर देने लगेगा तो जनमत का हश्र तो हम कल्‍पना के जरिए सोच सकते हैं। झूठ को सच और सच को झूठ साबित करने में जुटे मीडिया हाउस लोकतंत्रिक देश को गर्त में ले जाएंगे क्‍योंकि लोकतंत्र का अस्‍तित्‍व विपक्ष के बिना जिंदा नहीं रह सकता, जिस तरह एक नदी दूसरे किनारे के बिना।

मीडिया और राजनीति को जोड़ने में पीआर एजेंसी नामक बिचौलिए सक्रिय हैं। इनकी सक्रियता लोकतंत्र के लिए सबसे बड़ा ख़तरा है। बिचौलिए जनता की नहीं, अपनी फिक्र करते हैं। पिछले लोक सभा चुनावों के दौरान भारतीय जनता पार्टी ने 714 करोड़ रुपए खर्च किए तो कांग्रेस ने 516 करोड़ रुपए खर्च किए। यदि दोनों का खर्च जोड़ दिया जाए तो कुल रकम 1230 करोड़ के करीब बनती है और भारत की आबादी केवल 125 करोड़ है। एक अनुमान अनुसार हर भारतीय के बैंक खाते में लगभग 12  रुपए आराम से आ सकते थे। हालांकि, ऐसा हुआ नहीं, यह पैसा केवल मुट्ठी भर लोगों के घरों में पहुंच गया। और भारतीयों के हिस्‍से विदेशों में पड़े काले धन की वापसी का सुंदर स्‍वप्‍न रह गया, जो शायद ही कभी पूरा हो। इस पैसे का बड़ा हिस्‍सा मीडिया हाउसों में पहुंचा। कुछ विदेशी पीआर एजेंसियां ले गई। पिछले चुनाव भारतीय राजनीतिक पार्टियों ने नहीं, बल्‍कि पीआर एजेंसियों ने लड़े थे। ऐसे में लोकतंत्र क्‍या दशा हो सकती है ? आप स्‍वयं सोच सकते हैं।

अंत में... 
मीडिया और राजनीति के बीच बढ़ती करीबी को रूकना होगा। वरना, मुट्ठी भर लोग अंग्रेजों की तरह देश के नागरिकों की जिन्‍दगियां खा जाएंगे। गरीब के हंसने और रोने पर भी टैक्‍स होगा। स्‍वप्‍न देखने की पाबंदी होगी। कुछ बिजनसमैन हमारा भविष्‍य लिखेंगे। रूस का साहित्‍य चोरी छुपे फिर से सक्रिय होगा। देश एक बार फिर किसी बड़ी क्रांति के लिए भीतर ही भीतर उबलेगा।

Wednesday, January 14, 2015

कटरीना, काटजू और मीडिया

कटरीना कैफ को राष्ट्रपति बनाने की सलाह देते हुए सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज और प्रेस परिषद् के पूर्व चेयरमैन जस्टिस मार्कंडेय काटजू ने जो हमारे राजनेताओं पर तंज कसा है। उसको समझने की जरूरत है।

हालांकि, मीडिया ने इसको केवल टीआरपी के लिए इस्तेमाल कर लिया क्योंकि उसको लगा कि काटजू ने बॉलीवुड अभिनेत्री कटरीना कैफ को देश का राष्ट्रपति बनाने की सलाह दी है।

आज का दिन कटरीना कैफ की खूबसूरत फोटोओं के क्लोज बनाए जाएंगे। एक तरफ काटजू का फोटो हो सकता है,जिसने कटरीना कैफ के खूबसूरत कहा। भले ही, मीडिया उसको कातिल अदाओं वाली कहकर पुकारता हो, क्या फर्क पड़ता है।

मीडिया की सोच ख़बर को इस तरह परोसेगी कि काटजू का व्यंग या तंज इसमें दबकर रह जाएगा। सच कहूं तो मीडिया ने मार्कंडेय काटजू के साथ विवादित शब्द जोड़ देना चाहिए क्योंकि मीडिया उसी अंश को उठाता है, जहां कुछ विवादित होने का संदेह उत्पन्न हो रहा हो।

हालांकि काटजू ने लिखा है, 'मैं चुनाव में हमेशा से ही सुंदर महिलाओं जैसे कि फिल्मी अभिनेत्रियों के चयन का समर्थन करता हूं। ऐसा इसलिए क्योंकि नेता हमेशा चांद दिलाने की बात करेंगे लेकिन कभी जनता के हित का काम नहीं करेंगे।'

आगे लिखते हैं 'चूंकि आपको किसी न किसी का चुनाव तो करना ही है तो क्यों नहीं कम से कम सुंदर चेहरे के लिए वोट दिया जाए। कम से कम मीडिया में उस सुंदर चेहरे को देख कर आपको क्षणिक खुशी तो होगी। नहीं तो आपको अंत में ऐसे तो कुछ भी हासिल नहीं होने वाला।'

काटजू ने अपने ब्लॉग की शुरूआत में लिखा है कि पिछले दिनों क्रोएशिया में एक सुंदर महिला राष्ट्रपति बनी हैं। आर्थिक रूप से बीमार क्रोएशिया जब मिस ग्रैबर किटरोविक को अपना राष्ट्रपति बना सकता है तो हम क्यों नहीं?

भारतीय नेताओं पर यह तंज खूब जमता है। कोरी बातों के अलावा अब तक हमको मिला ही क्या है ? चुनावों के दिनों में वादों की बौछार होती है। चुनावों के बाद जनता की किसी नेता को दरकार होती है।

जनता बेचारी सरकारी कार्यालयों के चक्कर काटती रहती है। हमारी फाइलें एक टेबल से दूसरे टेबल तक जाने के लिए गांधीछाप का इंतजार करती हैं। सरकारी कार्यालय का सेवादार भी अपने आपको देश के प्रधानमंत्री से कम नहीं समझता। उसके उच्च अधिकारियों के आगे साहिब शब्द तो अपने आप जुड़ जाता है।

यदि ऐसी परिस्थितियों में चेहरा भी खूबसूरत न हो तो मुश्किल अधिक हो जाती है। काम निकलवाने के लिए चक्कर काटने पड़ते हैं। बेढबे चेहरे देखने पड़ते हैं। हालांकि, हम समझ सकते हैं कि खूबसूरती के आधार पर हम उच्च पदों का बंटवारा नहीं कर सकते।

फिर भी यह एक तंज था। हमारी राजनीति पर। इसको उसी रूप में समझना चाहिए। हालांकि, समस्या यह है कि लोग अपनी समझ के अनुसार उसका अर्थ बना लेते हैं। मगर, जब मीडिया ​अर्थ निकालता है तो उसका प्रभाव दूर तलक जाता है। इस बात को समझना अति जरूरी है।
 
अंत में....
हां, यदि काटजू की जगह महिला होती तो शायद किसी अभिनेता का नाम लेती। वो अक्षय कुमार, सलमान खान, शाहरुख खान, आमिर खान, अजय देवगन, रणबीर कपूर हो सकता था। सुंदरता का पैमाना भी अपना अपना होता है।

Wednesday, December 24, 2014

गधे भी हिंदू मुस्‍लिम होते हैं !

ठंड के कारण हाथ पैर कांप रहे थे। घर के सारे खिड़कियां दरवाजे बंद थे, ताकि ठंड अंदर घुस न पाए। मैं टेलीविजन पर चैनलों वाली गिटरपिटर सुनने में मशगूल था। अचानक, घर के मुख्‍य द्वार से किसी चीज के टकराने की आवाज आई। मैंने टेलीविजन बंद करते हुए तपाक से दरवाजा खोला। मैं देखता हूं कि एक गधा हांप रहा है। मैंने सड़कों पर गधों को अलसियों की तरह धीमे धीमे चलते हुए देखा, मगर यह पहला गधा था, जो मैथारन में दौड़ रहे किसी व्‍यक्‍ति की तरह दौड़ते हुए मेरे घर के मुख्‍य द्वार से आ टकराया।

मैंने उसके साथ हमदर्दी जताई और घर के भीतर ले लाया। मेरे पैरों से जमीन निकल गई, जब मैंने उसको बोलते हुए सुना। गधा काफी समझदार मालूम पड़ रहा था। मैंने उससे पूछा कि आखिर तुम इतना हांप क्‍यों रहे हो ?, आखिर माजरा क्‍या है?

गधा बोला, छोड़ो जाने दो। शुक्रिया, जो आपने घर में पनाह दी। मैंने कहा, कुछ तो बताओ। गधे ने मेरा निवेदन स्‍वीकार करते हुए कहा -

'दिल्‍ली चलो' का नारा प्रत्‍येक छोटे बड़े व्‍यक्‍ति की जुबान पर था और एक तरह से मैं भी इस नारे से प्रभावित होकर दिल्‍ली जा रहा था। किंतु मुझे यह मालूम न था कि रास्‍ते में क्‍या विपत्‍ति आएगी ? रास्‍ते में एक स्‍थान पर मैंने देखा, एक मुसलमान बढ़ई शरअई दाढ़ी रखे हुए एक छोटी सी गठरी बगल में दबाए, एक छोटे से गांव से भागकर सड़क पर आ रहा था। मैंने सहानुभूति प्रकट करते हुए उसे अपनी पीठ पर सवार कर लिया और तेज कदमों से चलने लगा ताकि उस गांव के फसादी उसका पीछा न कर सकें। मैं बहुत आगे निकल गया और मन ही मन बहु प्रसन्‍न हुआ कि चलो, मेरे कारण एक निर्दोष की जान बच गई। इतने में क्‍या देखता हूं कि बहुत से फसादी रास्‍ता रोके खड़े हैं।

एक फसादी ने हमारी ओर देखकर कहा, देखा इस बदमाश मुसलमान को, न जाने किस बेचारे हिंदू का गधा चुराए लिए जा रहा है। मुसलमान बढ़ई ने अपनी जान बचाने के लिए बहुत कुछ कहा, मगर किसी ने एक न सुनी। उसे फसदियों ने मौत के घाट उतार दिया। मुझे एक फसादी ने बांध लिया और अपने घर की ओर ले चला।

जब हम आगे बढ़े तो रास्‍ते में मुसलमानों के कुछ गांव पड़ते थे। यहां पर कुछेक दूसरी ओर के फसादी आगे बढ़े। एक ने कहा, देखा, यह बेचारा गधा किसी मुसलमान का मालूम होता है, जिसे वह हिंदू फसादी घेरे लिए जा रहा है। उस बेचारे ने भी अपनी जान बचाने के लिए बहुत कुछ कहा, लेकिन किसी ने एक न सुनी और उसका सफाया हो गया। और मैं एक मौलवी साहब के हिस्‍से में आया। जो मुझे उसी रस्‍सी से पकड़कर अपनी मस्‍जिद की ओर ले चले। रास्‍ते में मैंने मौलवी साहब के आगे बहुत अनुनय विनय की।

मैं - हजरत, मुझे छोड़ दीजिए।
मौलवी - यह कैसे हो सकता है। तुम माले गनीमत हो।
मैं - हुजूर। माले गनीमत नहीं हूं। गनीमत यह है कि मैं एक गधा हूं, वरना अब तक मारा गया होता।
मौलवी - अच्‍छा, यह बताओ, तुम हिंदू हो या मुसलमान ? फिर हम फैसला करेंगे।
मैं- हुजूर न मैं हिंदू, न मुसलमान। मैं तो बस एक गधा हूं और गधे का कोई मजहब नहीं होता।
मौलवी - मेरे सवाल का ठीक ठीक जवाब दे।
मैं - ठीक ही तो कह रहा हूं। एक मुसलमान या हिंदू तो गधा हो सकता है, लेकिन एक गधा हिंदू या मुसलमान नहीं हो सकता।
मौलबी साहेब ने मुझे मस्‍जिद के बाहर एक खूंटे से बांध दिया और स्‍वयं भीतर चले गए। मैंने मौका गनीमत जाना और रस्‍सी तोड़कर वहां से निकल भागा। ऐसा भागा, ऐसा भागा कि मीलों तक पीछे मुड़कर नहीं देखा।

उपरोक्‍त व्‍यंग विश्‍व ख्‍याति प्राप्‍त कथाकार कृश्‍न चन्‍दर के हास्‍य व्‍यंग से भरपूर उपन्‍यास एक गधे की आत्‍मकथा से लिया गया है, जो हिन्‍द पॉकेट बुक्‍स द्वारा प्रकाशित किया गया है।

इस उपन्‍यास को केवल इसका शीर्षक देखकर मैंने काफी महीने पहले खरीदा था। मगर, कभी पढ़ने के लिए समय नहीं निकाल पाया। आज शाम को ऑफिस से घर आने पर अपनी अलमारी से इस उपन्‍यास को निकाला और पढ़ने लगा।

पढ़ते पढ़ते, मैं उपन्‍यास के इस खूबसूरत व्‍यंग पर पहुंचा, जो आज के समय में काफी प्रासंगिक मालूम पड़ता है। हिन्‍द पॉकेट बुक्‍स की उत्‍कृष्‍ट भेंट देशभर के सभी बुक स्‍टालों पर उपलब्‍ध है। हास्‍य व्‍यंग से भरपूर उपन्‍यास में कृश्‍न चन्‍दर ने समाज का एक अनूठा विश्‍लेषण किया है।

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Valentine Day अटल बिहार वाजपेयी अंधविश्‍वास अध्यात्म अन्‍ना हजारे अभिव्‍यक्‍ति अरविंद केजरीवाल अरुण जेटली अहमदाबाद आतंकवाद आप आबादी आम आदमी पार्टी आमिर खान आमिर ख़ान आरएसएस आर्ट ऑफ लीविंग आस्‍था इंटरनेट इंडिया इमोशनल अत्‍याचार इलेक्ट्रोनिक मीडिया इस्‍लाम ईसाई उबर कैब एआईबी रोस्‍ट एनडीटीवी इंडिया एबीपी न्‍यूज एमएसजी ओएक्‍सएल ओह माय गॉड कटरीना कैफ कंडोम करण जौहर कांग्रेस किरण बेदी किसान कृश्‍न चन्‍दर क्रिकेट गजेंद्र चौहान गधा गरीबी गोपाला गोपाला घर वापसी चार्ली हेब्‍दो चुनाव चेतन भगत जन लोकपाल बिल जन समस्या जनसंख्या जन्‍मदिवस जापान जीतन राम मांझी जेडीयू जैन ज्योतिष टीम इंडिया टेक्‍नीकल टेक्‍नोलॉजी टेलीविजन टैलिप्राम्प्टर डाक विभाग डिजिटल इंडिया डिजीटल लॉकर डेरा सच्चा सौदा डॉ. अब्दुल कलाम तालिबान तेज प्रताप यादव द​ सन दिल्‍ली विधान सभा दिल्‍ली विधान सभा चुनाव देव अफीमची दैनिक जागरण दैनिक भास्कर द्वारकी धर्म धर्म परिवर्तन धोखा नई दुनिया नत्थुराम गोडसे नमो मंदिर नया संस्‍करण नरेंद्र मोद नरेंद्र मोदी नववर्ष नीतीश कुमार नीलगाय नूतन वर्ष पंजाब केसरी पंजाब सरकार पद्म विभूषण पवन कल्‍याण पाकिस्तान पान की दुकान पीके पेशावर हमला पोल प्‍यार प्रतिमा प्रमाणु समझौता प्रशासन प्रेम फिल्‍म जगत बजट सत्र बजरंग दल बराक ओबामा बाबा रामदेव बाहुबली बिग बॉस बिहार बीजेपी बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ बॉलीवुड भगवान शिव भगवानपुर मंदिर भाजपा भारत भारतीय जनता पार्टी मनोरंजन ममता बनर्जी महात्मा गांधी महात्मा मंदिर महाराष्‍ट्र महेंद्र सिंह धोनी माता पिता मार्कंडेय काटजू मीडिया मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव मुसलमान मुस्लिम मोबाइल मोहन भागवत युवा पीढ़ी रविश कुमार राज बब्बर राजकुमार हिरानी राजनाथ सिंह राजनीति राजस्‍थान सरकार रामदेव राहुल गांधी रिश्‍ते रेप रेल बजट रेलवे मंत्री रोमन रोमन हिन्दी लघु कथा लीला सैमसन लोक वेदना लोकतंत्र वर्ष 2014 वर्ष 2015 वसुंधरा राजे वाहन विज्ञापन वित्‍त मंत्री विदेशी विराट कोहली विवाह विश्‍व वीआईपी कल्‍चर वैंकेटश वैलेंटाइन डे वॉट्सएप व्यंग शरद पावर शरद यादव शार्ली एब्‍दे शिवसेना शुभ अशुभ शेनाज ट्रेजरीवाला श्रीश्री श्रीश्री रविशंकर सकारात्‍मक रविवार संत गुरमीत राम रहीम सिंह सफलता समाजवाद समाजवादी पार्टी सरकार सरदार पटेल सलमान खान साक्षी महाराज सिख सिख समुदाय सुकन्‍या समृद्धि खाता सुंदरता सुरेश प्रभु सोनिया गांधी सोशल मीडिया स्वदेशी हास्‍य व्‍यंग हिंदी कोट्स हिंदु हिंदू हिंदू महासभा हिन्दी हिन्‍दू संगठन हेलमेट हैकर हॉलीवुड