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Sunday, February 15, 2015

न 'मोदी लहर' थी, न 'केजरीवाल लहर' है

लोक सभा चुनावों में नरेंद्र मोदी की अगुवाई में भारतीय जनता पार्टी ने शानदार प्रदर्शन किया तो मोदी लहर शब्‍द को जन्‍म दिया गया। ठीक नौ महीनों के बाद जब दिल्‍ली विधान सभा चुनावों में अरविंद केजरीवाल के नेतृत्‍व में आम आदमी पार्टी को रिकॉर्ड तोड़ बहुमत मिला तो मोदी लहर पर विराम लगा दिया गया।

हालांकि, यदि इसके बाद बीजेपी किसी क्षेत्र में शानदार प्रदर्शन करती है तो मोदी लहर में जान आ जाएगी। यह केवल शब्‍दावली के जरिये ख़बरों को मसालेदार बनाने की युक्‍त होती है। निर्देशक रितेश बत्रा की 'द लंचबॉक्‍स' नामक शानदार फिल्‍म में शेख हर बात से कहने से पहले, अम्‍मी कहती है, का इस्‍तेमाल करता है। उसकी बात पर साजन फर्नांडिस कहता है, तू तो अनाथ है ना, तो शेख कहता है, 'अम्‍मी कहती है' लगाने से बात में वजन आ जाता है।

बस, हर किसी को बात में वजन लाने की सूझती है। 'शब्‍द' जितना वजनदार होगा, स्टोरी या बात उतनी वजन दार होगी। तुम अपनी ओर से 'कुछ' कहो और बाद में, उसी 'कुछ' को तुम महात्‍मा गांधी या मार्टिन लूथर किंग के नाम से जोड़कर कहो। तुम महसूस करोगे कि बात में वजन आ रहा है।

शब्‍दों में वजन काम करता है। मोदी लहर भी इसी बीमारी की उपज है। इसको हम रचनात्‍मकता का नाम दे सकते हैं। जब कोई इस लहर को रोकेगा, तो उसका कद लहर वाले से यकीनन बड़ा हो जाएगा। जब आदमी बड़ा है तो कवरेज भी बड़ी होनी चाहिए। सिकंदर को रोकने वाला पोरस छोटा कैसे हो सकता है ? भले ही, पोरस ने सिकंदर पर जीत हासिल न की हो, लेकिन सिकंदर को रोकना भी कम नहीं हो सकता।

अगर, दिल्‍ली में 'मोदी लहर' की हवा निकली है, तो चिंता का विषय है। मगर, चिंता केवल बीजेपी के लिए नहीं, बल्‍कि तमाम राजनीतिक दलों के लिए। मोदी लहर को दरकिनार कर दो। अगर, आप कहते हैं, नहीं नहीं मोदी लहर तो थी, तो मैं कहता हूं, लहर अगर थी तो सत्‍ता विरोधी। जिस पर सवार होकर नरेंद्र मोदी दिल्‍ली सिंहासन तक पहुंचे। अगर हवाएं उस तरफ हों, जिस तरफ आपकी नौका को किनारा चाहिए, तो आपको अपने हुनर पर गुमान नहीं करना चाहिए बल्‍कि परिस्‍थितियों का शुक्रगुजार होना चाहिए कि वे इस समय आपके पक्ष में हैं।

'मोदी लहर' ने वर्ष 2014 में जन्‍म लिया, मगर, दिल्‍ली की जनता ने आम आदमी पार्टी के जरिये कांग्रेस के चारे खाने वर्ष 2013 में चित कर दिए थे। जो सीधे सीधे संकेत हैं कि लहर सत्‍ता विरोधी थी। कांग्रेस के भ्रष्‍टाचार से लोग तंग आ चुके थे। देश के पास विकल्‍प के तौर पर बीजेपी के अलावा दूसरा कोई था भी नहीं। बाकी सभी नेता क्षेत्रीय पार्टियों से आते हैं, जो या तो जनता परिवार से टूटकर बनी हैं, या कांग्रेस से।

अगर, मोदी लहर होती तो इसका असर उड़ीसा, पश्‍चिमी बंगाल, तमिलनाडू में जरूर दिखाई पड़ता। वहीं, नवोदित आम आदमी पार्टी अकाली दल बीजेपी के गढ़ पंजाब से चार सांसद लाने में कामयाब न होती। हालांकि, अन्‍य राज्‍यों में परिस्‍थितियां पूर्ण रूप से भारतीय जनता पार्टी के पक्ष में थी। फिलहाल, आम आदमी पार्टी पर विश्‍वास करना मुश्‍किल था, क्‍योंकि लोग नए थे, रातोंरात उम्‍मीदवार मिले थे। बीजेपी के पीछे तमाम आध्‍यात्‍मिक, धार्मिक संस्‍थान, आरएसएस समेत अन्‍य हिंदू संगठन थे।

अगर, लोक सभा चुनावों के बाद के चुनावों पर नजर मारे तो देखेंगे कि बीजेपी ने महाराष्‍ट्र चुनाव जीता, मगर, सरकार अल्‍पमत में है यदि शिव सेना विरोध पर उतर आए, तो बीजेपी को एनसीपी का सहारा लेना होगा, जिसको नरेंद्र मोदी चुनावों के दिनों में नेचुरल करप्‍ट पार्टी या चाचे भतीजे की पार्टी कहते थे।

हरियाणा में सफलता का मुख्‍य कारण डेरे का समर्थन, वाड्रा डीएलएफ जमीन घोटाले का हरियाणा से जुड़े होना, हुड्डा सरकार का दस वर्षीय कार्यकाल, गोपाल कांडा का मामला, कांग्रेस के अंदर दरार, केंद्र में कांग्रेस का सफाया, भ्रष्‍टाचार की छवि हैं। मगर, जम्‍मू कश्‍मीर में बिखराव के नतीजे मिले, जिसके कारण वहां सरकार नहीं बन पाई। झारखंड को बदलाव की जरूरत थी एवं बाहरी दलों से आए नेताओं को टिकट देना अच्‍छा साबित हुआ।

देश बदलाव के मुहाने पर खड़ा है। लोगों के बीच अब राजनीति को लेकर चर्चा होने लगी है। कल तक जनता किसी मुद्दे पर अधिक माथा मच्‍ची नहीं करती थी। केंद्र में भारतीय जनता पार्टी की सरकार देने के बाद दिल्‍ली की जनता ने नई पार्टी आम आदमी पार्टी को प्रचंड बहुमत देकर कहीं न कहीं अपनी समझ का परिचय दिया है। और लहर की धुन में रहने वाले नेताओं को सचेत किया है, 'लहर' वजन बढ़ाने के लिए अच्‍छा शब्‍द है, वरना जनादेश से बढ़कर कुछ नहीं है। लोक सभा में बीजेपी को बहुमत मिला क्‍योंकि क्षेत्रीय पार्टियों को अधिक सांसद देने का मतलब था, कांग्रेस की सरकार या खिचड़ी सरकार, जिससे देश को नुकसान होता।

अब न मोदी लहर काम करती है, न केजरीवाल लहर। केवल मुद्दे काम करते हैं, यदि आप मुद्दों की डिलिवरी देने में सफल रहते हैं, तो आपको बहुमत मिल सकता है। जो अन्‍य दलों ने लोक सभा चुनावों में गलती की थी, उसी तरह की गलती बीजेपी ने दिल्‍ली विधान सभा चुनावों में की। व्‍यक्‍तिगत हमले, मुद्दों से हटकर भाषणबाजी।

Sunday, February 8, 2015

अरविंद केजरीवाल के नाम खुला बधाई पत्र

नमस्‍कार,
अरविंद केजरीवाल,
संयोजक, आम आदमी पार्टी,
नई दिल्‍ली।

शानदार प्रदर्शन के लिए बधाई हो। एग्‍जिट पोल के आधार पर तो आप बधाई के हकदार है हीं। यदि एग्‍जिट पोल चूक भी जाएं, तो भी आप बधाई के हकदार हैं क्‍योंकि आप ने अपने जांबाज स्‍वयंसेवक के साथ जी जान लगाकर चुनावी युद्ध लड़ा है। कभी कभी खेल इतना रोचक हो जाता है कि उसमें हार जीत से अधिक खिलाड़ियों का व्‍यवहार और जज्‍बा महत्‍व रखने लगता है। मुझे क्रिकेट देखने का अधिक शौक नहीं, मगर, क्रिकेट के मैदान पर वसीम अकरम और अजय जाडेजा का जज्‍बा व व्‍यवहार देखना पसंद था। मैच हारे या जीते, वो मुस्‍कराते हुए नजर आते थे। अब आप जीत रहे हैं। आपकी बहुमत वाली सरकार दिल्‍ली में बनती नजर आ रही है। मैं आम आदमी पार्टी का समर्थक हूं। शायद इससे बेहतर यह कहना होगा कि मैं आम लोगों का समर्थक हूं, जो कुछ बदलाव लाना चाहते हैं। मैं आपकी पार्टी का समर्थन भी इसी सोच के साथ किया।

सबसे दिलचस्‍प बात तो यह है कि विकास और बदलाव के दावे करने वाले दो शख्‍स दिल्‍ली में होंगे। एक छोटी दिल्‍ली देखेगा, तो दूसरा बड़ी दिल्‍ली अर्थात क्रमश: आधा अधूरा राज्‍य एवं संपूर्ण राष्‍ट्र। दिल्‍ली को आम आदमी पार्टी की गंगोत्री कहूंगा क्‍योंकि इसका उदय दिल्‍ली से हुआ है। यदि आम आदमी पार्टी अपने वादे पूरे करने में सफल होती है तो गंगोत्री गंगा का रूप धारण कर लेगी। मगर, ध्‍यान रखने वाली बात यह है कि गंगा में बहुत सारे गंदे नाले भी आकर गिरने लगते हैं। यदि गंगा को साफ रखना है तो गंदे नालों को इसमें गिरने से रोकना होगा।

मुझे खुशी है कि आम आदमी पार्टी ने नरेंद्र मोदी की उस रणनीति के तहत विरोधियों का सामना किया, जो नरेंद्र मोदी ने लोक सभा चुनावों के दौरान अपनाई थी। लोक सभा चुनावों में जब नरेंद्र मोदी पर विरोधी निजी हमले कर रहे थे तो नरेंद्र मोदी स्‍वयं विकास के मुद्दे पर आगे बढ़ रहे थे। जिस तरह नरेंद्र मोदी ने प्रियंका वाड्रा के शब्‍द 'नीच राजनीति' को 'नीच जाति की राजनीति' से जोड़कर पिछड़ी जाति से होने का परिचय दिया। उसी तरह 'उपद्रवी गोत्र' की आड़ में अरविंद केजरीवाल जी आप भी अपना 'गोत्र अग्रवाल' बताने से चूके नहीं। जब बीजेपी आप पर निजी हमले बोल रही थी तो आप दिल्‍ली की जनता से मुद्दों की बात कर रहे थे।

जिस तरह नरेंद्र मोदी ने देश के तमाम राजनीतिक दलों को स्‍वयं के खिलाफ बताकर स्‍वयं के कद को ऊंचा किया, उस तरह आप ने बीजेपी एवं केंद्र सरकार को एक साथ दिखाकर स्‍वयं के कद को ऊंचा किया। आप ने केंद्र सरकार बनाम अरविंद केजरीवाल कर पूरा मामला अपनी तरफ खींच लिया। जब बीजेपी आप पर कीचड़ उछालने का प्रयास कर रही थी तो आप नरेंद्र मोदी की तरह चतुराई से काम लेते हुए बीजेपी सरकार को चुनौती देते हुए दिखे। आप ने कहा, ''सरकार आपकी है, जांच करवा लो, जेल में डाल दो।'' जब कांग्रेस नरेंद्र मोदी के खिलाफ बोलती थी तो नरेंद्र मोदी का जवाब भी इस तरह का होता था।

अब एग्‍जिट पोल कह रहे हैं कि नरेंद्र मोदी की तरह आप भी विजयी होने जा रहे हैं। दिल्‍ली की जनता आपको बहुमत देने जा रही है। मेरा तो इतना निवेदन है कि आप अपना घोषणा पत्र अब अपने सामने रखें। और उसके हिसाब से जल्‍द से जल्‍द रणनीति बनाएं। जब अतिआशावाद जन्‍म लेता है, तो उतावलापन भी तेजी के साथ पनपने लगता है। अब सवाल आपकी तरफ भी उछलेंगे। आप केवल 'जुमला था' कहकर नहीं बच सकते क्‍योंकि आप से जवाब विरोधी पार्टियां नहीं, बल्‍कि मेरे जैसे युवा भी मांगेंगे, जो गुजरात या देश के अन्‍य किसी राज्‍य से बैठकर आपको पुरजोर समर्थन कर रहे थे।

मुझे उम्‍मीद है कि अरविंद केजरीवाल दिल्‍ली को एक अच्‍छी सरकार मुहैया करवाएंगे क्‍योंकि आपकी पृष्‍ठभूमि राजनीति से संबंध नहीं रखती है। सबसे अधिक महत्‍वपूर्ण बात जो मैं अंत में लिखने जा रहा हूं। वो यह है कि आप राजनीति को समझ चुके हैं। आप ने उस समझ के आधार पर एक बड़े प्रवक्‍ता को मात दे दी। मगर, अब आप शब्‍दों पर जरूर संयम बरतें। बात वो कहें, जो आप को भविष्‍य में भी उचित लगे, वो नहीं, जिस पर यूटर्न लेना पड़े।

हालांकि, आपका घोषणा पत्र भी एक राजनीतिक पार्टी सा था, क्‍योंकि उसमें वादों को पूरा करने की निश्‍चित समय सीमा नहीं थी। 'पांच साल केजरीवाल' से समझ आ रहा था कि आप पांच साल चाहते हैं। अब जनता ने आपको पांच साल भी दे दिए, यदि मैं एग्‍जिट पोल को सही मान लूं।

अंत में, फिर से बधाई देते हुए कहना चाहूंगा कि आम आदमी पार्टी के स्‍वयंसेवकों को खेल दिखा रहे मदारी की तरह नजरिया रखनी चाहिए, जो दे उसका भी भला, जो न दे उसका भी भला। आजकल एक नया ट्रेंड चला है, यदि आप के पक्ष में लिखूं तो आपका समर्थक, विरोध में लिखूं, तो पूछ लिया जाता है, जनाब कितने पैसे मिले हैं। करीब करीब यह हाल सभी पार्टी समर्थकों का है, लेकिन आम आदमी पार्टी से अलग तरह के व्‍यवहार की उम्‍मीद रखते हैं क्‍योंकि इस पार्टी में राजनीतिक लोगों की भीड़ नहीं है। बस अच्‍छी एवं स्‍वच्‍छ राजनीति का परिचय दें।

जय हिंद

Friday, January 30, 2015

आम आदमी पार्टी से सवाल पूछने का हक किसे और क्यों ?

भारतीय जनता पार्टी की ओर से शुक्रवार को एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में आम आदमी पार्टी के संयोजक अरविंद केजरीवाल के लिए 5 सवालों की दूसरी किश्त पेश की। इस किश्‍त को केंद्रीय वाणिज्य मंत्री निर्मला सीतारमन ने पेश किया। सबसे दिलचस्‍प बात तो यह है कि भाजपा 5 फरवरी तक हर रोज अरविंद केजरीवाल से 5 नए सवाल पूछेगी। लेकिन, सवाल तो यह है कि आखिर भारतीय जनता पार्टी किस हक से सवाल पूछ रही है ? क्‍या भारतीय जनता पार्टी को सवाल पूछने का हक है ? सबसे हैरानीजनक बात तो यह है कि इसकी दूसरी किश्‍त केंद्रीय मंत्री द्वारा जारी की गई है।  

यह तरीका भी सराहनीय नहीं है। यह केवल सुर्खियों में बने रहने का ढंग है। लोगों का ध्‍यान भटकाने का तरीका है। एक राष्ट्रीय पार्टी जन आंदोलन की कोख से पिछले साल जन्मीं पार्टी से कितने बचकाने सवाल पूछ रही है। बचकानेपन तो मीडिया भी कर रहा है, जो बीजेपी के बेतुके बयानों को महत्व दे रहा है।

बीजेपी का यह कदम सराहनीय कम मद्दा अधिक लगता है, विशेषकर उस समय जब आम आदमी पार्टी के कार्यकर्ता गली गली कूचे कूचे नुक्कड़ नुक्कड़ वोट मांग रहे हैं, जनता से सीधा संवाद कर रहे हैं। आम आदमी पार्टी को जनादेश भारतीय जनता पार्टी या कांग्रेस ने नहीं दिया, बल्‍कि जनता ने दिया है, तो सवाल पूछने का हक भी जनता को है, और आम आदमी पार्टी के कार्यकर्ता जनता के बीच घूम रहे हैं।

एक अन्य सवाल, जब अरविंद केजरीवाल ने भारतीय जनता पार्टी के सामने खुली बहस का विकल्‍प पहले से ही रख दिया है तो बीजेपी सुरक्षित कोने में खड़ी होकर क्यों खेल रही है ? क्या भारतीय जनता पार्टी के पास मुद्दे नहीं ? क्या भारतीय जनता पार्टी के पास आम आदमी पार्टी की चुनौती का जवाब नहीं ? भारतीय जनता पार्टी इतने बचकाने सवाल पूछ रही है, जिनका जनता से दूर दूर तक सरोकार नहीं है।

क्या बच्चों की कसम खाकर पलटना राष्ट्रीय गुनाह है ? यदि गुनाह है तो पिछले साढ़े छह दशक के दौरान जो गुनाह राजनेताओं ने किए हैं, उनका जवाब तो पहले बीजेपी एवं कांग्रेस आम आदमी पार्टी के सामने ना सही, लेकिन जनता के सामने तो रखे। इसका तो सीधा सीधा मतलब तो यह हुआ कि आम आदमी पार्टी नेता अरविंद केजरीवाल की जुबां लोहे पर लकीर, और नेताओं की जुबां पानी पर, और पानी पर खींची लकीर पर सवाल उठाना उचित नहीं है।

मैं यह नहीं कहता भारतीय जनता पार्टी या कांग्रेस पार्टी को अरविंद केजरीवाल से सवाल नहीं करने चाहिए। मैं कहता हूं कि दोनों पार्टियों को मिलकर आम आदमी पार्टी को घेरना चाहिए। मगर, इतने बचकाने सवालों से नहीं। दोनों पार्टियां ठोस मुद्दों पर बात करें। यदि अरविंद केजरीवाल की सामान्‍य बातों पर ही सवाल पूछने हैं, तो कांग्रेस, बीजेपी अपने नेता के चुनावी बयानों का री टेलीकास्ट करे। अपने गिरेबां में पहले झांके। इससे पहले दिल्‍ली भारतीय जनता पार्टी एवं कांग्रेस दोनों के पास रही है। अरविंद केजरीवाल को तो केवल 49 दिन के लिए दिल्‍ली मिली और उसके लिए अरविंद केजरीवाल को लोक सभा चुनावों में दोनों पार्टियां बहुत कुछ पूछ चुकी हैं। जो अभी पूछ रही हैं, वो सोशल मीडिया पर बैठे किसी पार्टी के भक्‍तों के लिए तो ठीक है, लेकिन राष्‍ट्रीय स्‍तर के नेताओं के लिए वो बचकाने सवालों से अधिक कुछ नहीं है।

एक और बात आम आदमी पार्टी से जवाब मांगने का हक केवल और केवल जनता का है। सबसे बड़ी बात तो यह है कि आज कल दिल्‍ली में सबसे अधिक भीड़ अरविंद केजरीवाल की रैलियों में हो रही है। भारतीय जनता पार्टी की किरण बेदी भी भीड़ जुटाने में चूक रही हैं। कांग्रेस का हाल तो जग जाहिर है। आज जो कांग्रेस की स्‍थिति है, पिछले दिल्‍ली विधान सभा चुनावों में वो आम आदमी पार्टी की थी, केवल मीडिया की नजर में। आम आदमी पार्टी को मिलने जन समर्थन ने बड़े बड़े दिग्‍गजों को सोचने पर मजबूर कर दिया।

यदि अरविंद केजरीवाल भगोड़ा है। यदि अरविंद केजरीवाल पलटीमार है। तो भारतीय जनता पार्टी को घबराने की जरूरत नहीं थी। यदि अरविंद केजरीवाल दिल्‍ली का भरोसा खो चुका था, तो भारतीय जनता पार्टी को किरण बेदी क्‍यों ? यदि जनता को अरविंद केजरीवाल एंड पार्टी पर विश्वास होगा तो वो आम आदमी को वोट करेगी यदि नहीं होगा तो नहीं करेगी।

मगर, बीजेपी किस अधिकार से सवाल कर रही है ? क्या मोदी सरकार ने सौ दिन में काला धन वापस लाने के वादे को पूरा कर दिया ? क्या जम्मू कश्मीर में बाप बेटी या बाप बेटे की पार्टी के साथ मिलकर मोदी की भाजपा सरकार नहीं बनाएगी ? क्या सुभाष चंद्र बोस से जुड़े दस्तावेज सार्वजनिक कर दिए गए हैं ? क्या नशा विरोधी मुहिम को शुरू करने से पहले पंजाब की मौजूदा सरकार से नाता तोड़ लिया गया है ? यह सवाल जनता से जुड़े हैं न कि पारिवारिक सदस्यों की कसम से। शायद यह ही कारण है कि भारतीय जनता पार्टी अरविंद केजरीवाल की सार्वजनिक बहस की चुनौती को नजरंअदाज करते हुए एक तरफ सवाल दागने पर जोर दे रही है।

अंत में...

दिल्ली जीतने के लिए 250 रैलियां, 120 सांसदों की डियूटी, 13 राज्यों के कार्यकर्ता और दर्जनों मंत्रियों की तैनाती और प्रधानमंत्री की 4 रैलियां। बीजेपी में बेचैनी और अरविंद केजरीवाल के जनाधार का सबूत हैं। अब अगर आम आदमी पार्टी हार भी गई तो अधिक परेशानी की बात नहीं होगी। बीजेपी की तैयारी को देखकर विश्व विजेता बनने निकले सिकन्दर की याद आ गई जो पोरस से जीत कर भी अंत हार गया और वापस लौट गया। भारत को फतह नहीं कर पाया।

Wednesday, January 21, 2015

अन्‍ना हजारे ! अभी भी है कोई जो तुझे बुला रहा है।

नमस्‍कार 

अन्‍ना हजारे जी।
 
देश में भ्रष्‍टाचार के खिलाफ एवं जन लोकपाल बिल के लिए आंदोलन चलाने वाले अन्‍ना हजारे ने आज राजनीतिक गंदगी से दूर रहने की बात कही है। अन्‍ना श्री, हां मुझे याद है, अन्‍ना हजारे ने अपने सहयोगी अरविंद केजरीवाल के साथ जाने से उस समय भी इंकार कर दिया था, जब आपके सहयोगी सहित अन्‍य आंदोलनकारियों ने राजनीति में घुसकर राजनीति को स्‍वच्‍छ बनाने का संकल्‍प लेते हुए आम आदमी पार्टी बनाने की घोषणा की थी।

हालांकि, कुछ समय बाद ही भ्रष्‍टाचार विरोधी आंदोलन के अगुआ अन्‍ना हजारे यानी आप पश्‍चिमी बंगाल की मुख्‍यमंत्री ममता बैनर्जी के साथ खड़े हो गए। अन्‍ना हजारे का ममता बनर्जी के साथ खड़ा होना सबको चौंका गया। हां, मुझे भी। चौंकाता भी क्‍यों न ? यदि आपको राजनीति में जाना था या उसका समर्थन करना था तो अरविंद केजरीवाल समेत अन्‍य सहयोगियों का समर्थन क्‍यों नहीं किया ?

अन्‍ना हजारे यानी आप ने राजनीतिक गतिविधियों में दिलचस्‍पी रखने वालों को सबसे बड़ा झटका उस समय दिया, जब आप ने ममता बैनर्जी की अगुवाई वाली पार्टी टीएमसी द्वारा दिल्‍ली में आयोजित एक महारैली में अचानक शिरकत करने से मना कर दिया। इस रैली का आयोजन आपके नाम पर किया गया था। इस रैली में आपका शामिल होना बेहद जरूरी था। मगर, आप आए नहीं। विवाद भी हुआ। समय के साथ विवाद लोग भूल भी गए होंगे। सबकी याददाशत मेरे जैसी तो है नहीं। 

उसके बाद अब अन्‍ना हजारे यानी आप उस समय चर्चा में आए, जब आपकी टीम सदस्‍य किरण बेदी ने वीके सिंह की तरह भाजपा को दिल्ली विधान सभा चुनावों से पूर्व ज्‍वॉइन कर लिया और भाजपा ने टिकट देने के साथ साथ उनको मुख्‍यमंत्री प्रत्‍याशी घोषित कर दिया। अन्‍ना हजारे यानी आप से प्रतिक्रिया मांगी गई तो आपने कहा, 'भाजपा को ज्‍वॉइन करने से पहले किरण बेदी ने मुझसे विचार विमर्श नहीं किया। सच तो यह है कि उन्‍होंने मुझे पिछले एक साल से कॉल तक भी नहीं किया।'

अब अन्‍ना हजारे यानी आपका नया बयान आया कि मैं राजनीतिक गंदगी से बचना चाहता हूं। तो मैं अन्‍ना हजारे यानी आप से पूछना चाहता हूं कि आप राजनीति को गंदा कह एक लोकतंत्र की शक्‍ति को गाली क्‍यों दे रहे हैं। यदि आप चाहें तो गंदी राजनीति करने वालों से गुरेज कर सकते हैं। आप राजनीति को गंदी कहकर लोकतंत्र की तौहीन कर रहे हैं। जिस तरह हर शहर में अच्‍छे बुरे लोग होते हैं, उसी तरह राजनीति में भी अच्‍छे बुरे लोग होते हैं।

आपको मलाल हो सकता है कि आपके हिस्‍से कुछ नहीं आया क्‍योंकि बाबा रामदेव की निकल पड़ी। वीके सिंह को भाजपा ने टिकट देकर सांसद बनाते हुए मंत्री पद तक दे दिया। किरण बेदी कुछ दिनों बाद सीएम बन सकती हैं या विधायक बन सकती हैं। आपके सहयोगी अरविंद केजरीवाल ने स्‍वयं का अलग रास्‍ता चुनकर दिल्‍ली के पूर्व सीएम की मोहर लगवा ली और एक बार फिर से दिल्‍ली के सिंहासन की तरफ बढ़ा रहे हैं। अरविंद पहले की तरह आज भी मैदान में डटे हुए हैं, हालांकि कुछ लोगों का मानना है कि अरविंद चूक जाएगा और यह उसका अंतिम युद्ध होगा। मैं कहता हूं, जो भी हो, लेकिन अरविंद एक जननेता की तरह मैदान में टिका हुआ है। उसने स्‍वयं का रास्‍ता चुना। अरविंद ने किसी राजनीतिक पार्टी की छात्र छाया में राजनीतिक करियर नहीं बनाया। हो सकता है कि उसका रास्‍ता सही हो या गलत हो। जो भी हो, लेकिन अरविंद उस व्‍यवस्‍था को बदलने के लिए प्रयासरत हैं, जिसको आप राजनीतिक गंदगी कह रहे हैं।

मैं फिर दोहरा रहा हूं। गौर से सुनिए। आप नाक पर रूमाल रखकर कोसते हुए निकल रहे हैं। मगर, अरविंद गंदगी के ढेर को हटाने का प्रयासरत रहे हैं। यह प्रयास काफी हद तक सफल होता नजर आ रहा है क्‍योंकि भारत की दूसरी सबसे बड़ी पार्टी को अरविंद के सामने गैर राजनीतिक चेहरा उतारना पड़ रहा है। अरविंद की हार हो या जीत, उससे अधिक महत्‍वपू्र्ण बात तो यह है कि वो लड़ रहे हैं, एक बड़ी पुरानी जर्जर हो चुकी व्‍यवस्‍था के खिलाफ। आप महात्‍मा गांधी को अपना प्रेरणा स्रोत मानते हैं तो नेहरू और सरदार पटेल का साथ देना आपका धर्म होना चाहिए। यदि महात्‍मा गांधी भी राजनीतिक गंदगी से बचने का प्रयास करते तो देश को लोकतंत्रिक सरकार न मिलती।

किसी महान व्‍यक्‍ति ने कहा है कि आपकी मंजिल एक होनी चाहिए। भले ही, उसके लिए रास्‍ते हजार हों। एक चींटी भी पत्‍थर के इधर उधर घूम कर अपनी खड तक पहुंच जाती है। अन्‍ना हजारे अब भी कुछ नहीं बिगड़ा। एक बार अरविंद केजरीवाल अन्‍ना आंदोलन में जुड़ा था। अब एक बार आप केजरीवाल आंदोलन में जुड़ जाओ। सुबह का भूला शाम को घर लौटे, उसको भूला नहीं कहते। अब उम्र हो चली है। ढलती शाम किसी अच्‍छे आशियाने में गुजर दो। कुछ लोग आए थे, आपका आंदोलन चुराने और चुराकर निकल दिए। अभी भी कोई है, जो लड़ रहा है। अभी भी है कोई जो थप्‍पड़ खा रहा है। अभी भी है कोई जो अंडे खा रहा है। अभी भी है कोई जो तुझे बुला रहा है। 

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