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Sunday, February 8, 2015

अरविंद केजरीवाल के नाम खुला बधाई पत्र

नमस्‍कार,
अरविंद केजरीवाल,
संयोजक, आम आदमी पार्टी,
नई दिल्‍ली।

शानदार प्रदर्शन के लिए बधाई हो। एग्‍जिट पोल के आधार पर तो आप बधाई के हकदार है हीं। यदि एग्‍जिट पोल चूक भी जाएं, तो भी आप बधाई के हकदार हैं क्‍योंकि आप ने अपने जांबाज स्‍वयंसेवक के साथ जी जान लगाकर चुनावी युद्ध लड़ा है। कभी कभी खेल इतना रोचक हो जाता है कि उसमें हार जीत से अधिक खिलाड़ियों का व्‍यवहार और जज्‍बा महत्‍व रखने लगता है। मुझे क्रिकेट देखने का अधिक शौक नहीं, मगर, क्रिकेट के मैदान पर वसीम अकरम और अजय जाडेजा का जज्‍बा व व्‍यवहार देखना पसंद था। मैच हारे या जीते, वो मुस्‍कराते हुए नजर आते थे। अब आप जीत रहे हैं। आपकी बहुमत वाली सरकार दिल्‍ली में बनती नजर आ रही है। मैं आम आदमी पार्टी का समर्थक हूं। शायद इससे बेहतर यह कहना होगा कि मैं आम लोगों का समर्थक हूं, जो कुछ बदलाव लाना चाहते हैं। मैं आपकी पार्टी का समर्थन भी इसी सोच के साथ किया।

सबसे दिलचस्‍प बात तो यह है कि विकास और बदलाव के दावे करने वाले दो शख्‍स दिल्‍ली में होंगे। एक छोटी दिल्‍ली देखेगा, तो दूसरा बड़ी दिल्‍ली अर्थात क्रमश: आधा अधूरा राज्‍य एवं संपूर्ण राष्‍ट्र। दिल्‍ली को आम आदमी पार्टी की गंगोत्री कहूंगा क्‍योंकि इसका उदय दिल्‍ली से हुआ है। यदि आम आदमी पार्टी अपने वादे पूरे करने में सफल होती है तो गंगोत्री गंगा का रूप धारण कर लेगी। मगर, ध्‍यान रखने वाली बात यह है कि गंगा में बहुत सारे गंदे नाले भी आकर गिरने लगते हैं। यदि गंगा को साफ रखना है तो गंदे नालों को इसमें गिरने से रोकना होगा।

मुझे खुशी है कि आम आदमी पार्टी ने नरेंद्र मोदी की उस रणनीति के तहत विरोधियों का सामना किया, जो नरेंद्र मोदी ने लोक सभा चुनावों के दौरान अपनाई थी। लोक सभा चुनावों में जब नरेंद्र मोदी पर विरोधी निजी हमले कर रहे थे तो नरेंद्र मोदी स्‍वयं विकास के मुद्दे पर आगे बढ़ रहे थे। जिस तरह नरेंद्र मोदी ने प्रियंका वाड्रा के शब्‍द 'नीच राजनीति' को 'नीच जाति की राजनीति' से जोड़कर पिछड़ी जाति से होने का परिचय दिया। उसी तरह 'उपद्रवी गोत्र' की आड़ में अरविंद केजरीवाल जी आप भी अपना 'गोत्र अग्रवाल' बताने से चूके नहीं। जब बीजेपी आप पर निजी हमले बोल रही थी तो आप दिल्‍ली की जनता से मुद्दों की बात कर रहे थे।

जिस तरह नरेंद्र मोदी ने देश के तमाम राजनीतिक दलों को स्‍वयं के खिलाफ बताकर स्‍वयं के कद को ऊंचा किया, उस तरह आप ने बीजेपी एवं केंद्र सरकार को एक साथ दिखाकर स्‍वयं के कद को ऊंचा किया। आप ने केंद्र सरकार बनाम अरविंद केजरीवाल कर पूरा मामला अपनी तरफ खींच लिया। जब बीजेपी आप पर कीचड़ उछालने का प्रयास कर रही थी तो आप नरेंद्र मोदी की तरह चतुराई से काम लेते हुए बीजेपी सरकार को चुनौती देते हुए दिखे। आप ने कहा, ''सरकार आपकी है, जांच करवा लो, जेल में डाल दो।'' जब कांग्रेस नरेंद्र मोदी के खिलाफ बोलती थी तो नरेंद्र मोदी का जवाब भी इस तरह का होता था।

अब एग्‍जिट पोल कह रहे हैं कि नरेंद्र मोदी की तरह आप भी विजयी होने जा रहे हैं। दिल्‍ली की जनता आपको बहुमत देने जा रही है। मेरा तो इतना निवेदन है कि आप अपना घोषणा पत्र अब अपने सामने रखें। और उसके हिसाब से जल्‍द से जल्‍द रणनीति बनाएं। जब अतिआशावाद जन्‍म लेता है, तो उतावलापन भी तेजी के साथ पनपने लगता है। अब सवाल आपकी तरफ भी उछलेंगे। आप केवल 'जुमला था' कहकर नहीं बच सकते क्‍योंकि आप से जवाब विरोधी पार्टियां नहीं, बल्‍कि मेरे जैसे युवा भी मांगेंगे, जो गुजरात या देश के अन्‍य किसी राज्‍य से बैठकर आपको पुरजोर समर्थन कर रहे थे।

मुझे उम्‍मीद है कि अरविंद केजरीवाल दिल्‍ली को एक अच्‍छी सरकार मुहैया करवाएंगे क्‍योंकि आपकी पृष्‍ठभूमि राजनीति से संबंध नहीं रखती है। सबसे अधिक महत्‍वपूर्ण बात जो मैं अंत में लिखने जा रहा हूं। वो यह है कि आप राजनीति को समझ चुके हैं। आप ने उस समझ के आधार पर एक बड़े प्रवक्‍ता को मात दे दी। मगर, अब आप शब्‍दों पर जरूर संयम बरतें। बात वो कहें, जो आप को भविष्‍य में भी उचित लगे, वो नहीं, जिस पर यूटर्न लेना पड़े।

हालांकि, आपका घोषणा पत्र भी एक राजनीतिक पार्टी सा था, क्‍योंकि उसमें वादों को पूरा करने की निश्‍चित समय सीमा नहीं थी। 'पांच साल केजरीवाल' से समझ आ रहा था कि आप पांच साल चाहते हैं। अब जनता ने आपको पांच साल भी दे दिए, यदि मैं एग्‍जिट पोल को सही मान लूं।

अंत में, फिर से बधाई देते हुए कहना चाहूंगा कि आम आदमी पार्टी के स्‍वयंसेवकों को खेल दिखा रहे मदारी की तरह नजरिया रखनी चाहिए, जो दे उसका भी भला, जो न दे उसका भी भला। आजकल एक नया ट्रेंड चला है, यदि आप के पक्ष में लिखूं तो आपका समर्थक, विरोध में लिखूं, तो पूछ लिया जाता है, जनाब कितने पैसे मिले हैं। करीब करीब यह हाल सभी पार्टी समर्थकों का है, लेकिन आम आदमी पार्टी से अलग तरह के व्‍यवहार की उम्‍मीद रखते हैं क्‍योंकि इस पार्टी में राजनीतिक लोगों की भीड़ नहीं है। बस अच्‍छी एवं स्‍वच्‍छ राजनीति का परिचय दें।

जय हिंद

Thursday, February 5, 2015

मैं नरेंद्र मोदी का विरोधी नहीं हूं, लेकिन...

मैं नरेंद्र मोदी का विरोधी नहीं हूं, लेकिन उनके पैदा किए जा रहे अति आशावाद का विरोधी हूं। शायद, मुझे इस तरह के स्‍पष्‍टीकरण की जरूरत भी नहीं थी। लेकिन बात शुरू करने के लिए स्‍पष्‍टीकरण अधिक बेहतर चुनाव लगा। हां, मैं नरेंद्र मोदी के अतिआशवाद का विरोधी हूं। और हमारे बुजुर्ग भी कहते हैं, अति नुकसानदेह होती है, वो फिर किसी भी मामले में क्‍यों न हो।

अति आशावाद, अति निराशावाद को जन्‍म देता है। कुछ समय पहले तक बॉलीवुड में फिल्‍में हिट या फ्लॉप होती थी। मगर, फ्लॉप फिल्‍मों के लिए एक नया शब्‍द बाजार में आया, सुपर फ्लॉप। इस शब्‍द का जन्‍म अति आशावाद के कारण हुआ। फिल्‍मों का प्रचार बड़े स्‍तर पर किया जाने लगा। फिल्‍म के बड़े स्‍तर पर होते प्रचार के कारण लोगों के भीतर अच्‍छी फिल्‍म होने का आशावाद पैदा होता है। लेकिन, फिल्‍म दूसरे ही दिन सिनेमा हाल की खिड़की पर दम तोड़ देती है। इस मामले में संजय लीला भंसाली की सांवरिया, रामगोपाल वर्मा की आग और यशराज बैनर्स की टश्‍न, धूम 3 सबसे बड़े उदाहरण हैं।

चुनावी रैलियों में जो नरेंद्र मोदी ने बड़े बड़े सीना ठोककर दावे किए थे, अब वो तेजी के साथ फुस हो रहे हैं। पिछले आठ महीनों में नरेंद्र मोदी की अगुवाई सरकार ने ऐसा कोई कार्य नहीं किया, जो उनके दावों का समर्थन करता हो। अब धीरे धीरे आशावाद निराशावाद में बदल रहा है।

सबसे बड़ी हैरानीजनक बात तो यह है कि लोक सभा चुनावों में जबरदस्‍त प्रदर्शन करने वाली भारतीय जनता पार्टी को दिल्‍ली में संघर्ष करना पड़ रहा है। दिल्‍ली विधान सभा चुनावों में भारतीय जनता पार्टी की बौखलाहट के बहुत सारे उदाहरण देखने को मिले। मगर, सबसे बड़ी और दिलचस्‍प बात नरेंद्र मोदी ने अपनी अंतिम रैली में कही, ''बाजारू सर्वे।''

नरेंद्र मोदी भूल गए, जब लोक सभा चुनावों में भारतीय जनता पार्टी 272 प्‍लस का लक्ष्‍य लेकर चल रही थी तो इस मीडिया ने उनके पक्ष में बहुत सारे सर्वे दिखाए थे, और इन्‍हीं सर्वों की वजह से ही भारतीय जनता पार्टी अपने निर्धारित लक्ष्‍य तक पहुंची। मगर, आज नरेंद्र मोदी उन्‍हीं सर्वों पर उंगली उठा रहे हैं।

इससे भी हैरानीजनक बात तो यह है कि नरेंद्र मोदी ने अपनी अंतिम रैली में लोगों को चुनावी सर्वों पर विश्‍वास न करने की अपील की और उसके कुछ घंटों पश्‍चात कुछ नए चुनावी सर्वे सामने आए, जो भारतीय जनता पार्टी को जीतते हुए दिखा रहे थे। जिनको नरेंद्र मोदी के विरोधियों ने दूधारू सर्वों का नाम दिया। इस तरह नरेंद्र मोदी की अपील उनके अन्‍य प्रयोगों ( किरण बेदी, विज्ञापन धमाका, अवाम का खुलासा) की तरह उन पर भारी पड़ती नजर आ रही है।

एक अन्‍य बात धीरे धीरे नरेंद्र मोदी अपनी विश्‍वसनीयता खोते जा रहे हैं क्‍योंकि पिछले आठ महीनों में उनके यू टर्न अरविंद केजरीवाल को भी पीछे छोड़ रहे हैं। नरेंद्र मोदी निरंतर अपने विरोधियों को बोलने का मौका दे रहे हैं। इसमें दो राय नहीं है कि दिल्‍ली में भारतीय जनता पार्टी की कम होती लोकप्रियता के लिए नरेंद्र मोदी जिम्‍मेदार हैं।

आग में घी का काम उनके करीबी एवं भारतीय जनता पार्टी के प्रमुख अमित शाह ने यह कह कर डाल दिया कि हर भारतीय के हिस्‍से 15-15 लाख रुपए वाली बात केवल राजनीतिक जुमला था। इस तरह भारतीय जनता पार्टी के नेता नरेंद्र मोदी की कितनी बातों को राजनीतिक जुमला कहकर बचाव करते रहेंगे। आजकल न्‍यूज चैनलों पर भारतीय जनता पार्टी के प्रवक्‍ता उतने आक्रामक एवं उत्‍साह भरपूर नजर नहीं आते, जितना लोक सभा चुनावों से पहले आते थे क्‍योंकि उनकी पार्टी को सत्‍ता में आए लगभग तीन तिमाहियां गुजर चुकी हैं। अभी तक उनके पास कुछ ऐसा नहीं है, जो उनका बचाव कर सके।

पैट्रोलियम उत्‍पादों के दाम गिर रहे हैं, मगर, सामने कच्‍चे तेल के भाव भी गिर रहे हैं। इसका श्रेय भी नरेंद्र मोदी लेने से नहीं चूके, उन्‍होंने स्‍वयं को नसीब वाला कह डाला। मगर, सवाल तो यह है कि भारत में पैट्रोलियम उत्‍पादों के उतने भाव गिरे, जितने गिरने चाहिए थे। ऐसे बहुत सारे सवाल हैं, जिनका जवाब भारतीय जनता पार्टी के पास नहीं है।

अंत में
भारतीय जनता पार्टी दिल्‍ली विधान सभा चुनावों में अपनी हार को नरेंद्र मोदी के दामन से अलग कर रही है। हालांकि, अख़बार, रेडियो एवं चैनल तो बोल रहे हैं कि चलो चलें मोदी के साथ। इसका एक अन्‍य कारण भी है क्‍योंकि यदि इसको नरेंद्र मोदी से जोड़ दिया जाए, तो अन्‍य राज्‍यों में, जहां चुनाव होने वाले हैं, वहां भारतीय जनता पार्टी की बढ़ती लोकप्रियता को बड़ा झटका लग सकता है।

Friday, January 30, 2015

आम आदमी पार्टी से सवाल पूछने का हक किसे और क्यों ?

भारतीय जनता पार्टी की ओर से शुक्रवार को एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में आम आदमी पार्टी के संयोजक अरविंद केजरीवाल के लिए 5 सवालों की दूसरी किश्त पेश की। इस किश्‍त को केंद्रीय वाणिज्य मंत्री निर्मला सीतारमन ने पेश किया। सबसे दिलचस्‍प बात तो यह है कि भाजपा 5 फरवरी तक हर रोज अरविंद केजरीवाल से 5 नए सवाल पूछेगी। लेकिन, सवाल तो यह है कि आखिर भारतीय जनता पार्टी किस हक से सवाल पूछ रही है ? क्‍या भारतीय जनता पार्टी को सवाल पूछने का हक है ? सबसे हैरानीजनक बात तो यह है कि इसकी दूसरी किश्‍त केंद्रीय मंत्री द्वारा जारी की गई है।  

यह तरीका भी सराहनीय नहीं है। यह केवल सुर्खियों में बने रहने का ढंग है। लोगों का ध्‍यान भटकाने का तरीका है। एक राष्ट्रीय पार्टी जन आंदोलन की कोख से पिछले साल जन्मीं पार्टी से कितने बचकाने सवाल पूछ रही है। बचकानेपन तो मीडिया भी कर रहा है, जो बीजेपी के बेतुके बयानों को महत्व दे रहा है।

बीजेपी का यह कदम सराहनीय कम मद्दा अधिक लगता है, विशेषकर उस समय जब आम आदमी पार्टी के कार्यकर्ता गली गली कूचे कूचे नुक्कड़ नुक्कड़ वोट मांग रहे हैं, जनता से सीधा संवाद कर रहे हैं। आम आदमी पार्टी को जनादेश भारतीय जनता पार्टी या कांग्रेस ने नहीं दिया, बल्‍कि जनता ने दिया है, तो सवाल पूछने का हक भी जनता को है, और आम आदमी पार्टी के कार्यकर्ता जनता के बीच घूम रहे हैं।

एक अन्य सवाल, जब अरविंद केजरीवाल ने भारतीय जनता पार्टी के सामने खुली बहस का विकल्‍प पहले से ही रख दिया है तो बीजेपी सुरक्षित कोने में खड़ी होकर क्यों खेल रही है ? क्या भारतीय जनता पार्टी के पास मुद्दे नहीं ? क्या भारतीय जनता पार्टी के पास आम आदमी पार्टी की चुनौती का जवाब नहीं ? भारतीय जनता पार्टी इतने बचकाने सवाल पूछ रही है, जिनका जनता से दूर दूर तक सरोकार नहीं है।

क्या बच्चों की कसम खाकर पलटना राष्ट्रीय गुनाह है ? यदि गुनाह है तो पिछले साढ़े छह दशक के दौरान जो गुनाह राजनेताओं ने किए हैं, उनका जवाब तो पहले बीजेपी एवं कांग्रेस आम आदमी पार्टी के सामने ना सही, लेकिन जनता के सामने तो रखे। इसका तो सीधा सीधा मतलब तो यह हुआ कि आम आदमी पार्टी नेता अरविंद केजरीवाल की जुबां लोहे पर लकीर, और नेताओं की जुबां पानी पर, और पानी पर खींची लकीर पर सवाल उठाना उचित नहीं है।

मैं यह नहीं कहता भारतीय जनता पार्टी या कांग्रेस पार्टी को अरविंद केजरीवाल से सवाल नहीं करने चाहिए। मैं कहता हूं कि दोनों पार्टियों को मिलकर आम आदमी पार्टी को घेरना चाहिए। मगर, इतने बचकाने सवालों से नहीं। दोनों पार्टियां ठोस मुद्दों पर बात करें। यदि अरविंद केजरीवाल की सामान्‍य बातों पर ही सवाल पूछने हैं, तो कांग्रेस, बीजेपी अपने नेता के चुनावी बयानों का री टेलीकास्ट करे। अपने गिरेबां में पहले झांके। इससे पहले दिल्‍ली भारतीय जनता पार्टी एवं कांग्रेस दोनों के पास रही है। अरविंद केजरीवाल को तो केवल 49 दिन के लिए दिल्‍ली मिली और उसके लिए अरविंद केजरीवाल को लोक सभा चुनावों में दोनों पार्टियां बहुत कुछ पूछ चुकी हैं। जो अभी पूछ रही हैं, वो सोशल मीडिया पर बैठे किसी पार्टी के भक्‍तों के लिए तो ठीक है, लेकिन राष्‍ट्रीय स्‍तर के नेताओं के लिए वो बचकाने सवालों से अधिक कुछ नहीं है।

एक और बात आम आदमी पार्टी से जवाब मांगने का हक केवल और केवल जनता का है। सबसे बड़ी बात तो यह है कि आज कल दिल्‍ली में सबसे अधिक भीड़ अरविंद केजरीवाल की रैलियों में हो रही है। भारतीय जनता पार्टी की किरण बेदी भी भीड़ जुटाने में चूक रही हैं। कांग्रेस का हाल तो जग जाहिर है। आज जो कांग्रेस की स्‍थिति है, पिछले दिल्‍ली विधान सभा चुनावों में वो आम आदमी पार्टी की थी, केवल मीडिया की नजर में। आम आदमी पार्टी को मिलने जन समर्थन ने बड़े बड़े दिग्‍गजों को सोचने पर मजबूर कर दिया।

यदि अरविंद केजरीवाल भगोड़ा है। यदि अरविंद केजरीवाल पलटीमार है। तो भारतीय जनता पार्टी को घबराने की जरूरत नहीं थी। यदि अरविंद केजरीवाल दिल्‍ली का भरोसा खो चुका था, तो भारतीय जनता पार्टी को किरण बेदी क्‍यों ? यदि जनता को अरविंद केजरीवाल एंड पार्टी पर विश्वास होगा तो वो आम आदमी को वोट करेगी यदि नहीं होगा तो नहीं करेगी।

मगर, बीजेपी किस अधिकार से सवाल कर रही है ? क्या मोदी सरकार ने सौ दिन में काला धन वापस लाने के वादे को पूरा कर दिया ? क्या जम्मू कश्मीर में बाप बेटी या बाप बेटे की पार्टी के साथ मिलकर मोदी की भाजपा सरकार नहीं बनाएगी ? क्या सुभाष चंद्र बोस से जुड़े दस्तावेज सार्वजनिक कर दिए गए हैं ? क्या नशा विरोधी मुहिम को शुरू करने से पहले पंजाब की मौजूदा सरकार से नाता तोड़ लिया गया है ? यह सवाल जनता से जुड़े हैं न कि पारिवारिक सदस्यों की कसम से। शायद यह ही कारण है कि भारतीय जनता पार्टी अरविंद केजरीवाल की सार्वजनिक बहस की चुनौती को नजरंअदाज करते हुए एक तरफ सवाल दागने पर जोर दे रही है।

अंत में...

दिल्ली जीतने के लिए 250 रैलियां, 120 सांसदों की डियूटी, 13 राज्यों के कार्यकर्ता और दर्जनों मंत्रियों की तैनाती और प्रधानमंत्री की 4 रैलियां। बीजेपी में बेचैनी और अरविंद केजरीवाल के जनाधार का सबूत हैं। अब अगर आम आदमी पार्टी हार भी गई तो अधिक परेशानी की बात नहीं होगी। बीजेपी की तैयारी को देखकर विश्व विजेता बनने निकले सिकन्दर की याद आ गई जो पोरस से जीत कर भी अंत हार गया और वापस लौट गया। भारत को फतह नहीं कर पाया।

Wednesday, January 21, 2015

अन्‍ना हजारे ! अभी भी है कोई जो तुझे बुला रहा है।

नमस्‍कार 

अन्‍ना हजारे जी।
 
देश में भ्रष्‍टाचार के खिलाफ एवं जन लोकपाल बिल के लिए आंदोलन चलाने वाले अन्‍ना हजारे ने आज राजनीतिक गंदगी से दूर रहने की बात कही है। अन्‍ना श्री, हां मुझे याद है, अन्‍ना हजारे ने अपने सहयोगी अरविंद केजरीवाल के साथ जाने से उस समय भी इंकार कर दिया था, जब आपके सहयोगी सहित अन्‍य आंदोलनकारियों ने राजनीति में घुसकर राजनीति को स्‍वच्‍छ बनाने का संकल्‍प लेते हुए आम आदमी पार्टी बनाने की घोषणा की थी।

हालांकि, कुछ समय बाद ही भ्रष्‍टाचार विरोधी आंदोलन के अगुआ अन्‍ना हजारे यानी आप पश्‍चिमी बंगाल की मुख्‍यमंत्री ममता बैनर्जी के साथ खड़े हो गए। अन्‍ना हजारे का ममता बनर्जी के साथ खड़ा होना सबको चौंका गया। हां, मुझे भी। चौंकाता भी क्‍यों न ? यदि आपको राजनीति में जाना था या उसका समर्थन करना था तो अरविंद केजरीवाल समेत अन्‍य सहयोगियों का समर्थन क्‍यों नहीं किया ?

अन्‍ना हजारे यानी आप ने राजनीतिक गतिविधियों में दिलचस्‍पी रखने वालों को सबसे बड़ा झटका उस समय दिया, जब आप ने ममता बैनर्जी की अगुवाई वाली पार्टी टीएमसी द्वारा दिल्‍ली में आयोजित एक महारैली में अचानक शिरकत करने से मना कर दिया। इस रैली का आयोजन आपके नाम पर किया गया था। इस रैली में आपका शामिल होना बेहद जरूरी था। मगर, आप आए नहीं। विवाद भी हुआ। समय के साथ विवाद लोग भूल भी गए होंगे। सबकी याददाशत मेरे जैसी तो है नहीं। 

उसके बाद अब अन्‍ना हजारे यानी आप उस समय चर्चा में आए, जब आपकी टीम सदस्‍य किरण बेदी ने वीके सिंह की तरह भाजपा को दिल्ली विधान सभा चुनावों से पूर्व ज्‍वॉइन कर लिया और भाजपा ने टिकट देने के साथ साथ उनको मुख्‍यमंत्री प्रत्‍याशी घोषित कर दिया। अन्‍ना हजारे यानी आप से प्रतिक्रिया मांगी गई तो आपने कहा, 'भाजपा को ज्‍वॉइन करने से पहले किरण बेदी ने मुझसे विचार विमर्श नहीं किया। सच तो यह है कि उन्‍होंने मुझे पिछले एक साल से कॉल तक भी नहीं किया।'

अब अन्‍ना हजारे यानी आपका नया बयान आया कि मैं राजनीतिक गंदगी से बचना चाहता हूं। तो मैं अन्‍ना हजारे यानी आप से पूछना चाहता हूं कि आप राजनीति को गंदा कह एक लोकतंत्र की शक्‍ति को गाली क्‍यों दे रहे हैं। यदि आप चाहें तो गंदी राजनीति करने वालों से गुरेज कर सकते हैं। आप राजनीति को गंदी कहकर लोकतंत्र की तौहीन कर रहे हैं। जिस तरह हर शहर में अच्‍छे बुरे लोग होते हैं, उसी तरह राजनीति में भी अच्‍छे बुरे लोग होते हैं।

आपको मलाल हो सकता है कि आपके हिस्‍से कुछ नहीं आया क्‍योंकि बाबा रामदेव की निकल पड़ी। वीके सिंह को भाजपा ने टिकट देकर सांसद बनाते हुए मंत्री पद तक दे दिया। किरण बेदी कुछ दिनों बाद सीएम बन सकती हैं या विधायक बन सकती हैं। आपके सहयोगी अरविंद केजरीवाल ने स्‍वयं का अलग रास्‍ता चुनकर दिल्‍ली के पूर्व सीएम की मोहर लगवा ली और एक बार फिर से दिल्‍ली के सिंहासन की तरफ बढ़ा रहे हैं। अरविंद पहले की तरह आज भी मैदान में डटे हुए हैं, हालांकि कुछ लोगों का मानना है कि अरविंद चूक जाएगा और यह उसका अंतिम युद्ध होगा। मैं कहता हूं, जो भी हो, लेकिन अरविंद एक जननेता की तरह मैदान में टिका हुआ है। उसने स्‍वयं का रास्‍ता चुना। अरविंद ने किसी राजनीतिक पार्टी की छात्र छाया में राजनीतिक करियर नहीं बनाया। हो सकता है कि उसका रास्‍ता सही हो या गलत हो। जो भी हो, लेकिन अरविंद उस व्‍यवस्‍था को बदलने के लिए प्रयासरत हैं, जिसको आप राजनीतिक गंदगी कह रहे हैं।

मैं फिर दोहरा रहा हूं। गौर से सुनिए। आप नाक पर रूमाल रखकर कोसते हुए निकल रहे हैं। मगर, अरविंद गंदगी के ढेर को हटाने का प्रयासरत रहे हैं। यह प्रयास काफी हद तक सफल होता नजर आ रहा है क्‍योंकि भारत की दूसरी सबसे बड़ी पार्टी को अरविंद के सामने गैर राजनीतिक चेहरा उतारना पड़ रहा है। अरविंद की हार हो या जीत, उससे अधिक महत्‍वपू्र्ण बात तो यह है कि वो लड़ रहे हैं, एक बड़ी पुरानी जर्जर हो चुकी व्‍यवस्‍था के खिलाफ। आप महात्‍मा गांधी को अपना प्रेरणा स्रोत मानते हैं तो नेहरू और सरदार पटेल का साथ देना आपका धर्म होना चाहिए। यदि महात्‍मा गांधी भी राजनीतिक गंदगी से बचने का प्रयास करते तो देश को लोकतंत्रिक सरकार न मिलती।

किसी महान व्‍यक्‍ति ने कहा है कि आपकी मंजिल एक होनी चाहिए। भले ही, उसके लिए रास्‍ते हजार हों। एक चींटी भी पत्‍थर के इधर उधर घूम कर अपनी खड तक पहुंच जाती है। अन्‍ना हजारे अब भी कुछ नहीं बिगड़ा। एक बार अरविंद केजरीवाल अन्‍ना आंदोलन में जुड़ा था। अब एक बार आप केजरीवाल आंदोलन में जुड़ जाओ। सुबह का भूला शाम को घर लौटे, उसको भूला नहीं कहते। अब उम्र हो चली है। ढलती शाम किसी अच्‍छे आशियाने में गुजर दो। कुछ लोग आए थे, आपका आंदोलन चुराने और चुराकर निकल दिए। अभी भी कोई है, जो लड़ रहा है। अभी भी है कोई जो थप्‍पड़ खा रहा है। अभी भी है कोई जो अंडे खा रहा है। अभी भी है कोई जो तुझे बुला रहा है। 

Saturday, January 10, 2015

'रामलीला' मैदान में 'मोदी लीला'

बाबा रामदेव का काले धन को लेकर अनशन हो या अन्ना हजारे का जन लोकपाल बिल लाने को लेकर शुरू किया गया आंदोलन। दोनों की याद आती है तो याद आता है दिल्ली का रामलीला मैदान। मैदान के नाम से जाहिर होता है कि यहां पर दीवाली से पूर्व रामलीला का आयोजन किया जाता है। यहां आयोजित होने वाली रामलीला में श्रीराम और रावण के बीच छद्म युद्ध होता है, क्योंकि रामलीला में सभी कलाकार एक दूसरे की जान पहचान के होते हैं। उनको पता होता है कि वो केवल कुछ दिनों के लिए किरदार अदा कर रहे हैं। अंत, उनको अपने असल जीवन में ढलना है।

मगर, यहां एक अन्य लीला भी होती है। वो राजनेताओं की होती है। इस लीला में रावण हमेशा विरोधी पार्टियां होती हैं। स्वयं को राम कौन नहीं कहना चाहेगा। राम जो ठहरे मर्यादा पुरुषोत्तम। यहां हर आदमी एक दूसरे से उत्तम होने की दौड़ में है। चुनावों के दिनों में नेता भी हाथी सी फीलिंग लेकर गलियों मोहल्‍लों से गुजरते हैं। आलोचना करने वालों को कुत्‍तों से अधिक समझते भी नहीं। इन दिनों हर कोई देश की विकास पैसेंजर को सुपर फास्ट बनाने के दावे करता है। बस! शर्त इतनी सी है कि इंजन उसके नाम का होना चाहिए। महिलाएं संदेही स्वभाव की होती है। भारतीय नेताओं को देखने के बाद यह तर्क झूठा सा मालूम पड़ता है क्योंकि जितना संदेह इनमें पाया जाता है, अन्य किसी प्राणी में नहीं। इनकी लीला ही निराली है।

लीला से याद आया। आज देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी रामलीला मैदान में थे। उनकी मेगा बजट रैली का आयोजन था। हालांकि, उनके होठों तले दबी हंसी बता रही थी कि उनकी स्‍थिति कुछ इस तरह की है, जैसे इंडिया टीम में खेलने वाला खिलाड़ी रणजी ट्राफी के लिए खेल रहा हो। रैली में दूर दराज से लोग आए होंगे। आख़िर देश के प्रधानमंत्री का लाइव भाषण कौन नहीं सुनना चाहेगा। मीडिया वाले भी अपने घरों से बड़े चौड़े होकर निकले होंगे। आख़िर एक महा रैली के साक्षी जो बनने वाले हैं। कुछ सालों बाद संस्‍मरण भी तो लिखने होंगे।

मगर, खोदा पहाड़ निकली चूहिया। जब मैंने प्रिय प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी की रैली के बारे में पढ़ा तो सोच में पड़ गया। प्रिय प्रधानमंत्री ने कहा, ''जो देश का मूड है, वही दिल्ली का भी मूड है।'' मैं भी गदगद हो उठा। मेरे अंदर खलबली सी मच गई। मैंने अपने आप से कहा, ''हे प्रिय, यदि आप इतने अंतर्यामी हैं तो प्रभु अपनी लीला का परिचय देते हुए इस रैली में विरोधियों पर हमला करने की जगह दिल्ली वासियों को अग्रिम शुक्रिया कह देते।''

मेरे प्रिय प्रधानमंत्री आप ने नवगठित पार्टी पर हमला बोलते हुए कहा, "जिन लोगों की मास्टरी धरना देने की है उनको वह काम करने दीजिए। हमारी मास्टरी सरकार चलाने में है इसलिए हमें यह काम सौंपिए।" मास्‍टरी से याद आया कि आप संघ परिवार से तालुक रखते हैं। और मैं जानना चाहूंगा कि उसके पास किस तरह मास्टरी है। हे प्रिय, जरा उसका इतिहास उठाकर बताएं। जरा नए भारत को बताएं कि जब भारत को आजादी मिल रही थी तो पुणे में कौन से ध्वज को लहराकर सलामी दी जा रही थी। जब देश में एक महिला दबंग नेता इंदिरा गांधी राज था तो आपकी पार्टी किस तरह की गतिविधियों का आयोजन कर रही थी। जरा खुलकर बताएंगे। आपको महात्मा गांधी सबसे प्रिय हैं। क्षमा करें! सत्याग्रह करना तो उन्होंने ही पूरे भारत को सिखाया है। आपका भाषण उसी तरह का मालूम पड़ता है, जैसे सनी लियोने कह रही हो, यदि अंग प्रदर्शन करना है तो पॉर्न दुनिया में चली जाएं। बॉलीवुड को मेरी जरूरत है क्‍योंकि मुझे अभिनय करना आता है।

प्रिय प्रधानमंत्री आपने कहा,'जिन लोगों ने दिल्ली का एक साल बर्बाद किया है। उनको सजा मिलनी चाहिए।' मैं आप से सहमत हूं। शत प्रतिशत सहमत हूं। किंतु, मैं इतना पूछता हूं कि आप दिल से बोल रहे हैं, या किसी पटकथा विशेषज्ञ के लिखे शब्दों को केवल आवाज दे रहे हैं। क्षमा करें, क्योंकि मैं आपको अब जम्मू कश्मीर की तरफ देखने को कहूंगा। जहां भाजपा एवं पीडीपी के कारण जनता का मतदान व्यर्थ जाने वाला है। मुझे पता है कि आप कुछ नहीं कहेंगे। आप बोलने वाले प्रधानमंत्री हैं। क्षमा करें, आप में संवाद क्षमता नहीं है। संवाद दो लोगों के बीच की वार्ता है। एक तरफ से दिया गया व्यक्तव्य संवाद नहीं कहलाता।

आप ने कहा, 'दिल्ली को मैं जनरेटर मुक्त बना दूंगा।' अर्थात 24 घंटे पूर्ण रूप से बिजली उपलब्ध करवाई जाएगी। आप देश के प्रधानमंत्री हैं। यकीनन, आप दिल्‍ली के मुख्‍यमंत्री तो बनेंगे नहीं। यदि आपके अधीनस्‍थ सरकार ऐसा करेगी तो मेरी इतनी सी जिज्ञासा है कि आप एक बार हरियाणा सरकार से जरूर पूछें कि वो अपने वादे 24 घंटे बिजली के अनुसार अब कितने घंटे बिजली हरियाणा के लोगों को उपलब्ध करवा रही है।

आप ने कहा, मेरी सरकार को सात महीने हो गए। भ्रष्टाचार का एक भी मामला सामने नहीं आया। लेकिन, आप ने यह नहीं बताया कि पिछले सात महीनों में आप की सरकार ने कितने अध्यादेश जारी किए। सच कहूं तो अध्यादेश राज आपकी सरकार में ही आया है। यकीन नहीं होता कि उस सरकार ने 15 दिन में सात अध्यादेश पारित कर दिए, जो संप्रग पर अध्यादेश राज लाने का आरोप लगा रही थी। पिछले सात महीनों में देश के आपको अधिक समय विदेश यात्रा पर देखा है। इसके अलावा मीडिया में केवल धर्म परिवर्तन, घर वापसी, बेटी बचाओ बहू लाओ, गीता का राष्‍ट्रीयकरण, स्‍कूलों में संस्‍कृत, चार बच्‍चे पैदा करो, सूर्य नमस्‍कार इत्‍यादि ही आया है।

वैसे दिल्‍ली में 2022 तक झोपड़ियों की संख्‍या बढ़कर कितनी हो सकती है ? क्‍योंकि मोदी जी आपकी घोषणा के बाद अब बेघर लोगों का नारा होगा दिल्‍ली चलो झुग्‍गी बनाओ। पक्‍की तो मोदी जी कर देंगे। हां, पर अहमदाबाद वाले पूछ रहे हैं कि उनकी झुग्‍गियो में कब तक बिनानी सीमेंट लग जाएगा। सदियों के लिए।   
अंत में
एक मफलर वाले को हराने के लिए दिल्ली की भाजपा ईकाई को देश के प्रधानमंत्री सहित अन्य राज्यों के मुख्यमंत्रियों के जमावड़े की जरूरत पड़ रही है। बस इतना कहूंगा कि अरविंद केजरीवाल के पास गंवाने के लिए कुछ नहीं है और पाने के लिए छोड़ी हुई दिल्ली की कुर्सी है। यदि आप हार गए तो...... चल छोड़ो जाने दो। आप नहीं समझेंगे। आप प्रधानमंत्री हैं।

Thursday, January 1, 2015

एबीपी न्‍यूज, पोल और धोखा

कुछ दिन पहले देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी एक विदेशी पत्रिका टाइम के ऑनलाइन रीडर्स सर्वे पोल में जीतकर अंत हार गए। पत्रिका ने नरेंद्र मोदी को जीतने बावजूद अंतिम दौड़ से बाहर कर दिया। हालांकि, इस विदेशी पत्रिका प्रबंधन का कहना था, अंतिम निर्णय जूरी का होता है। सवाल उठा, जो उठना भी चाहिए। यदि अंतिम फैसला जूरी का होता है तो ऑनलाइन रीडर्स सर्वे पोल करवाने का औचित्‍य क्‍या ? टाइम पत्रिका के पास जवाब नहीं होगा, केवल तर्क होंगे।

पत्रिका के नक्‍शेकदम पर चलते हुए आज देश के हिन्‍दी समाचार चैनल ABP न्यूज ने पाठकों की राय को दरकिनार कर देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को साल 2014 का व्यक्ति विशेष चुन लिया। दरअसल, ABP न्यूज ने अपनी वेबसाइट ABP live पर साल 2014 के व्यक्ति विशेष का पोल करवाया। इस पोल में अरविंद केजरीवाल को 52.63 फीसदी मत मिले, जबकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को 34.12 फीसदी। इस पोल में दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को बुरी तरह पछाड़ दिया।

मगर, ABP न्यूज ने, ''दर्शकों की राय में अरविंद केजरीवाल व्यक्ति विशेष हैं, लेकिन देश को पिछले 30 साल में पहली बार 2014 में पूर्ण बहुमत की सरकार नरेंद्र मोदी ने दी है। ऐसे में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ABP न्यूज के 2014 के व्यक्ति विशेष हैं।'' का तर्क देते हुए अरविंद केजरीवाल को साल 2014 का व्यक्ति विशेष नहीं चुना।

ग्रामीण क्षेत्रों में एक आम कहावत है कि जिसकी खाएं बाजरी, उसकी भरें हाजिरी। नरेंद्र मोदी की सरकार है, अब उसकी जय जयकार नहीं होगी तो किसकी होगी। लोग कहते हैं कि अकबर के साथ बीरबल भी निकल गए। मगर, आज जब इलेक्‍ट्रोनिक मीडिया को देखता हूं तो लगता है कि अकबर अकेले ही निकले होंगे। बीरबल तो आज भी जिंदा हैं।

बारह साल तक गुजरात के पूर्व मुख्‍यमंत्री नरेंद्र मोदी को निशाना बनाने वाला मीडिया आजकल अमूल कंपनी से बटर उधार लेकर खूब लगा रहा है। हालांकि, नरेंद्र मोदी मीडिया को भाव नहीं दे रहे हैं। टाइम पत्रिका के बाद ABP न्यूज ने भी लोगों के भरोसे को तोड़ा है। ABP न्यूज के सर्वे पोल में नरेंद्र मोदी के दीवानों का न आने का कारण टाइम पत्रिका का धोखा हो सकता है। जब आपको जनता की राय के साथ चलना नहीं है तो क्‍यों इस तरह के पोल सर्वे करवा जाते हैं।

एबीपी न्‍यूज की एक अन्‍य समस्‍या हो सकती है कि कहीं अरविंद केजरीवाल को विजेता घोषित कर देने से नरेंद्र मोदी के चाहने वाले उस पर पक्षपाती होने का आरोप न लगा दें। यदि आप बाजारवाद से इतने डरे हुए हैं, तो आपको अपनी दुकान के बाहर लिखकर लगाना चाहिए, बाजारवाद के दौर में निष्‍पक्षता न मांगें। आप से अच्‍छे तो दुकानदार हैं, जो दुकान के बाहर लिखकर लगाते हैं कि फैशन के दौर में गारंटी न मांगें। 


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